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नज़्म
ये बात अजीब सुनाते हो वो दुनिया से बे-आस हुए
इक नाम सुना और ग़श खाया इक ज़िक्र पे आप उदास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाई
मैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सरापा रंग-ओ-बू है पैकर-ए-हुस्न-ओ-लताफ़त है
बहिश्त-ए-गोश होती हैं गुहर-अफ़्शानियाँ उस की
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अब तक असर में डूबी नाक़ूस की फ़ुग़ाँ है
फ़िरदौस-ए-गोश अब तक कैफ़िय्यत-ए-अज़ाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
क़ुर्ब-ए-चश्म-ओ-गोश से हम कौन सी उलझन को सुलझाते रहे!
कौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
नून मीम राशिद
नज़्म
वो जान कि जिस से जी ग़श हो सौ नाज़ से आ झनकारी हो
दिल देख 'नज़ीर' उस की छब को हर आन अदा पर वारी हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो सुन लेता है गोश-ए-दिल से अफ़्साना कनहैया का
वो हो जाता है सच्चे दिल से दीवाना कनहैया का
जूलियस नहीफ़ देहलवी
नज़्म
ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे
रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
फिर कफ़-आलूदा ज़बानें मदह ओ ज़म की कुमचियाँ
मेरे ज़ेहन ओ गोश के ज़ख़्मों पे बरसाने लगीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
धूप पड़ी, तो खुल गई आँखें, खुल गया सारा भेद
ग़श खाया, तो दौड़े आए मुंशी, पंडित, वेद
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
ख़िर्मन-ए-जौर जला दे वो शरारा हूँ मैं
मेरी फ़रियाद पे अहल-ए-दुवल अंगुश्त-ब-गोश