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नज़्म
जाग उठा है सारा 'आलम
जाग उठी है रात मिलन की
आओ ज़मीं की गोद में साजन
सेज सजी है आज दुल्हन की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जिन्हें आशिक़ों ने चाहा कि फ़लक से तोड़ लाएँ
किसी राह में बिछाएँ किसी सेज पर सजाएँ