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नज़्म
न हो नौमीद नौमीदी ज़वाल-ए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ है
उमीद-ए-मर्द-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़-दानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अपना कुछ ग़म नहीं है पर ये ख़याल आता है
मादर-ए-हिन्द पे कब से ये ज़वाल आता है
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
शाम को जब अपनी ग़म-गाहों से दुज़्दाना निकल आते हैं हम?
या ज़वाल-ए-उम्र का देव-ए-सुबुक-पा रू-ब-रू
नून मीम राशिद
नज़्म
क्या यही है इन शहंशाहों की अज़्मत का मआल
जिन की तदबीर-ए-जहाँबानी से डरता था ज़वाल
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुम ने देखा है मसर्रत का सफ़र ग़म का ज़वाल
तुम ने हँसती हुई आँखों से भी पूछे हैं सवाल
बालमोहन पांडेय
नज़्म
बच्चों की बात छोड़िए बेगम का है ये हाल
ग़ुस्से में यूँ समझिए कि हर शय पे है ज़वाल