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नज़्म
अरे जब उगती हूँ तो क्या जोबन होता है मुझ पर
नई नई घास पर सूरज की किरनें पड़ती हैं तो
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
तफ़रीह के सारे कामों में जब रोड़े सब अटकाते थे
जब खेल का नाम आ जाता था बल तेवरी पर पड़ जाते थे
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
उधर है पार्क बच्चों का चलो आओ ज़रा घूमें
ज़रा चक्कर का झूला झूल कर हाथी पे जा बैठें
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर
छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर