aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".waz"
शायद मिरी तुर्बत को भी ठुकरा के चलोगीशायद मिरी बे-सूद वफ़ाओं पे हँसोगीइस वज़्-ए-करम का भी तुम्हें पास न होगालेकिन दिल-ए-नाकाम को एहसास न होगा
सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न मानेतेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुरानेअपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखाजंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा नेतंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ावाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़सानेपत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा हैख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है
इक मौलवी साहब की सुनाता हूँ कहानीतेज़ी नहीं मंज़ूर तबीअत की दिखानीशोहरा था बहुत आप की सूफ़ी-मनुशी काकरते थे अदब उन का अआली ओ अदानीकहते थे कि पिन्हाँ है तसव्वुफ़ में शरीअतजिस तरह कि अल्फ़ाज़ में मुज़्मर हों मआनीलबरेज़ मय-ए-ज़ोहद से थी दिल की सुराहीथी तह में कहीं दुर्द-ए-ख़याल-ए-हमा-दानीकरते थे बयाँ आप करामात का अपनीमंज़ूर थी तादाद मुरीदों की बढ़ानीमुद्दत से रहा करते थे हम-साए में मेरेथी रिंद से ज़ाहिद की मुलाक़ात पुरानीहज़रत ने मिरे एक शनासा से ये पूछा'इक़बाल' कि है क़ुमरी-ए-शमशाद-ए-मआनीपाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत में है कैसागो शेर में है रश्क-ए-कलीम-ए-हमदानीसुनता हूँ कि काफ़िर नहीं हिन्दू को समझताहै ऐसा अक़ीदा असर-ए-फ़लसफ़ा-दानीहै उस की तबीअत में तशय्यो भी ज़रा सातफ़्ज़ील-ए-अली हम ने सुनी उस की ज़बानीसमझा है कि है राग इबादात में दाख़िलमक़्सूद है मज़हब की मगर ख़ाक उड़ानीकुछ आर उसे हुस्न-फ़रामोशों से नहीं हैआदत ये हमारे शोरा की है पुरानीगाना जो है शब को तो सहर को है तिलावतइस रम्ज़ के अब तक न खुले हम पे मआनीलेकिन ये सुना अपने मुरीदों से है मैं नेबे-दाग़ है मानिंद-ए-सहर उस की जवानीमज्मुआ-ए-अज़्दाद है 'इक़बाल' नहीं हैदिल दफ़्तर-ए-हिकमत है तबीअत ख़फ़क़ानीरिंदी से भी आगाह शरीअत से भी वाक़िफ़पूछो जो तसव्वुफ़ की तो मंसूर का सानीउस शख़्स की हम पर तो हक़ीक़त नहीं खुलतीहोगा ये किसी और ही इस्लाम का बानीअल-क़िस्सा बहुत तूल दिया वाज़ को अपनेता-देर रही आप की ये नग़्ज़-बयानीइस शहर में जो बात हो उड़ जाती है सब मेंमैं ने भी सुनी अपने अहिब्बा की ज़बानीइक दिन जो सर-ए-राह मिले हज़रत-ए-ज़ाहिदफिर छिड़ गई बातों में वही बात पुरानीफ़रमाया शिकायत वो मोहब्बत के सबब थीथा फ़र्ज़ मिरा राह शरीअत की दिखानीमैं ने ये कहा कोई गिला मुझ को नहीं हैये आप का हक़ था ज़े-रह-ए-क़ुर्ब-ए-मकानीख़म है सर-ए-तस्लीम मिरा आप के आगेपीरी है तवाज़ो के सबब मेरी जवानीगर आप को मालूम नहीं मेरी हक़ीक़तपैदा नहीं कुछ इस से क़ुसूर-ए-हमादानीमैं ख़ुद भी नहीं अपनी हक़ीक़त का शनासागहरा है मिरे बहर-ए-ख़यालात का पानीमुझ को भी तमन्ना है कि 'इक़बाल' को देखूँकी उस की जुदाई में बहुत अश्क-फ़िशानी'इक़बाल' भी 'इक़बाल' से आगाह नहीं हैकुछ इस में तमस्ख़ुर नहीं वल्लाह नहीं है
मुझे तेरे तसव्वुर से ख़ुशी महसूस होती हैदिल-ए-मुर्दा में भी कुछ ज़िंदगी महसूस होती हैये तारों की चमक में है न फूलों ही की ख़ुश्बू मेंतिरी तस्वीर में जो दिलकशी महसूस होती हैतुझे मैं आज तक मसरूफ़-ए-दर्स-ओ-वा'ज़ पाता हूँतिरी हस्ती मुकम्मल आगही महसूस होती हैये क्या मुमकिन नहीं तू आ के ख़ुद अब इस का दरमाँ करफ़ज़ा-ए-दहर में कुछ बरहमी महसूस होती हैउजाला सा उजाला है तिरी शम-ए-हिदायत काशब-ए-तीरा में भी इक रौशनी महसूस होती हैमैं आऊँ भी तो क्या मुँह ले के आऊँ सामने तेरेख़ुद अपने-आप से शर्मिंदगी महसूस होती हैतख़य्युल में तिरे नज़दीक जब मैं ख़ुद को पाता हूँमुझे उस वक़्त इक-तरफ़ा ख़ुशी महसूस होती हैतू ही जाने कहाँ ले आई मुझ को आरज़ू तेरीये मंज़िल अब सरापा बे-ख़ुदी महसूस होती है'कँवल' जिस वक़्त खो जाता हूँ मैं उस के तसव्वुर मेंमुझे तो ज़िंदगी ही ज़िंदगी महसूस होती है
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहाचर्चा है जा-ब-जा तिरे हाल-ए-तबाह कासमझा है तू ने नेचर ओ तदबीर को ख़ुदादिल में ज़रा असर न रहा ला-इलाह काहो तुझ से तर्क-ए-सौम-ओ-सलात-ओ-ज़कात-ओ-हजकुछ डर नहीं जनाब-ए-रिसालत-पनाह काशैतान ने दिखा के जमाल-ए-उरूस-ए-दहरबंदा बना दिया है तुझे हुब्ब-ए-जाह काउस ने दिया जवाब कि मज़हब हो या रिवाजराहत में जो मुख़िल हो वो काँटा है राह काअफ़्सोस है कि आप हैं दुनिया से बे-ख़बरक्या जानिए जो रंग है शाम-ओ-पगाह कायूरोप का पेश आए अगर आप को सफ़रगुज़रे नज़र से हाल रेआ'या-ओ-शाह कावो आब-ओ-ताब-ओ-शौकत-ए-ऐवान-ए-ख़ुसरवीवो महकमों की शान वो जल्वा सिपाह काआए नज़र उलूम-ए-जदीदा की रौशनीजिस से ख़जिल हो नूर रुख़-ए-मेहर-ओ-माह कादावत किसी अमीर के घर में हो आप कीकम-सिन मिसों से ज़िक्र हो उल्फ़त का चाह कानौ-ख़ेज़ दिल-फ़रेब गुल-अंदाम नाज़नींआरिज़ पे जिन के बार हो दामन निगाह कारुकिए अगर तो हँस के कहे इक बुत-ए-हसींसुन मौलवी ये बात नहीं है गुनाह काउस वक़्त क़िबला झुक के करूँ आप को सलामफिर नाम भी हुज़ूर जो लें ख़ानक़ाह कापतलून-ओ-कोट-ओ-बंगला-ओ-बिस्कुट की धुन बंधेसौदा जनाब को भी हो तुर्की कुलाह कामिम्बर पे यूँ तो बैठ के गोशे में ऐ जनाबसब जानते हैं वा'ज़ सवाब-ओ-गुनाह का
अब ख़ानक़हों की मुर्दा उदासीरोज़-ए-अज़ल की भूकी प्यासीझूमेगी मय-ख़ानों परअब साक़ी मुग़चे पीर-ए-मुग़ाँबेचेंगे वाज़ दुकानों परइन ज़हर भरे पैमानों परअब ख़ूब हँसेगा दीवाना
इबलीस को फ़रेब सिखाता रहा है वोऔर शोबदे हज़ार दिखाता रहा है वोआलम को उँगलियों पे नचाता रहा है वोहम को जज़ा सज़ा से डराता रहा है वोदोज़ख़ से वाज़ कह के बचाता है आदमीपर ख़ुद कभी कभी वहीं जाता है आदमी
बोले कि राज़-वाज़ तो कुछ भी नहीं है बससंडे की शाम पाँच बजे इज़्न-ए-आम है
अब कहाँ जमुना तिरी मौजों की मस्ताना वो चालअब कहाँ पानी के झरने और वो लुत्फ़-ए-बर्शगालअब कहाँ छोटा सा वो राधा का कुंज-ए-ख़ुश-गवारअब कहाँ वो आह मथुरा तेरे फूलों की बहारअब कहाँ वो बंसी वाले की अदा-ए-जाँ-नवाज़अब कहाँ वो आह मुरली की सदा-ए-जाँ-नवाज़अब कहाँ वो ख़ल्वत-ए-राज़-ओ-नियाज़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़बे-सदा ज़ेर-ए-ज़मीं हैं आह साज़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ओ तलव्वुन-केश ओ काफ़िर-अदा और दूँ-शिआ'रतू ने बदले रंग लाखों आह वज़-ए-रोज़गारख़ाक उठ कर आह सर पर दामन-ए-साहिल उड़ाटुकड़े टुकड़े कर जिगर को पारा-हा-ए-दिल उड़ासोज़िश-ए-ग़म से पिघल जा आह ऐ रेग-ए-रवाँज़र्रे ज़र्रे में तेरे तस्वीर-ए-इबरत है निहाँअब कहाँ वो कुंज-ए-दिल-कश अब कहाँ राधा का ऐशहै ब-रंग-ए-ख़ंदा-ए-गुल बे-बक़ा दुनिया का ऐश
तू जन्मदाता भगत-सिंह और श्रद्धा-नंद कामदरसा तू सूफ़ियों संतों के वा'ज़-ओ-पंद का
मस्जिद में और मंदिर मेंगिरिजा-घर की ख़ामोशी सेहम्द-ओ-सना के गीतों तकगुरुद्वारे की बैठक मेंढोलक की हर थाप से ले करलाट साहब के पाट तलकमौलवियों के वा'ज़ से ले करपंडित के भजन के अंदरसहराओं मेंदरियाओं मेंइस कोने से उस कोने तककाएनात के हर गोशे मेंफ़र्श से ले करअर्श के मंज़र-नामे तकदीवार-ए-गिर्या से ले करचश्म-ए-तलब के पार तलकऔर ख़ला से भी उस पारजिस के लिए मैं सरगर्दां थीजिस को ढूँडा गली गलीचमन चमन और कली कलीवो तो मेरी शह-ए-रग में थामेरा ख़ुदा बस मेरा ख़ुदा
आ'ज़ा का तनासुबरगों में दौड़ते ज़िंदा जवाँ सरशार ख़ूँ की गुनगुनाहटहमें देते हैं दावत इश्क़ कीलेकिनहमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन-शनासा हैलिबासों की मोहब्बतवज़्-ए-पैराहन को सब कुछ मान करना-बीना आँखें इश्क़ करती हैंहमारी ज़िंदगी तहज़ीब-ए-पैराहन हैज़ाहिर की परस्तिश हैहमारे सारे आदाब-ए-नज़ारा फ़र्ज़ कर लेते हैंइंसाँ बे-बदन हैबदन दर-अस्ल इंसाँ है तमद्दुन है मोहब्बत हैबदन ही रूह है नूर-ए-हरारत ज़िंदगी हैबदन ही का करिश्मा ज़ेहन की तख़्लीक़ तस्ख़ीर-ए-फुलाँ हैहमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन शनासा हैबदन की ताब ला सकती नहींतहज़ीब-ए-पैराहन न ज़िंदा है न ज़ेहन-ओ-रूह रखती हैहमारे बूढ़े कोहना और फ़र्सूदा लिबासों से इबारत हैंहमारे नौजवाँ मग़रिब के ताज़ा फैशनों के चलते फिरते इश्तिहारी हैंबदन मादूम हैऔर बे-बदन रूहें धुआँ हैंबे-बदन अज़हान आसेब-ए-नज़ारा हैं
नया निज़ाम नया इंतिज़ाम आएगानया तरीक़ा नया इंसिराम आएगासँभल सँभल के रहो ग़फ़लतों से हो बेदारजो आ रहा है वो इक इज़्दिहाम आएगावही नहीं है जो दिखता है तुम को आँखों सेहज़ार पर्दों में इक इल्तिज़ाम आएगासुना है मुर्ग़-ए-चमन कह रहा था ये रो केचमन में नक़ली कोई मुश्क-फ़ाम आएगासभी ही होंगे बे-पर्दा न कोई सत्र रहेयहाँ पे पर्दा-शिकन तेज़गाम आएगाहर एक चीज़ मजाज़ी किताब ज़र सर्वतहमारे दौर का बस इख़्तिताम आएगाजो वज़' होंगे तरीक़े नए नए अक़दाररिवाज-ओ-रस्म पे सब इंहिदाम आएगान वो तरीक़-ए-त’अल्लुम न होंगी दानिश-गाहयहाँ पे दौर-ए-मजाज़-ओ-मशाम आएगाज़वाल-ए-मर्दुमी अब है नविश्ता-ए-दीवारक़दम क़दम पे वो अब मुसतदाम आएगाअगर जो चाहो तो कह लो कि 'अह्द-ए-दज्जालीसुकूँ के पर्दे में सद एहतिमाम आएगाहमारा दौर है इक दौर-ए-हाइली यारोयहीं से इब्तिदा-ओ-इख़्तिताम आएगाशुरूर-ओ-नेकी के अदवार आते रहते हैंरुख़ों पे अश्क कभी इबतिसाम आएगा
फ़रहत-ए-दिल राहत-ए-जाँ ऐश-ए-पैहम के लिएईद आई बन के राहत सारे आलम के लिएख़ुश्क अब अंगूर के शर्बत से तर होने लगेहाथ सब के बढ़ रहे हैं साग़र-ए-जम के लिएआज जी-भर कर पिलाना और पीना चाहिएतीस दिन तरसे हैं इक इक क़तरा-ए-यम के लिएदोस्तों को हर तरफ़ सामान-ए-राहत है नसीबग़म है दुश्मन के लिए दुश्मन बना ग़म के लिएबे-तकल्लुफ़ तिफ़्ल-ए-शोख़-ओ-शैख़-ए-शैब-ओ-मर्द-ओ-ज़नआज मशग़ूल-ए-तरब हैं लुत्फ़-ए-बाहम के लिएमजलिस-ए-वाज़ आज तो होती नज़र आती नहींहज़रत-ए-वाइ'ज़ अबस कोशाँ हैं कोरम के लिएकल हमें मिल जाएगा गर हौज़-ए-कौसर ही कहींआज क्यों प्यासे रहें हम ऐश-ए-मुबहम के लिएईद के दिन चाहिए शुक्र-ए-ख़ुदा ज़िक्र-ए-रसूलवक़्त क्यों ज़ाएअ' करें हम ज़ेर और बम के लिएआईये सुन लीजिए है आज दुनिया-ए-सुख़नगोश-बर-आवाज़ इन अशआ'र-ए-मुलहम के लिए
पुरानी डाइरी के ख़ुश्क होते ज़र्द पन्नों सेकिसी भूली हुई तस्वीर के धुँदले नुक़ूश अब फिरमिरे कमरे की तन्हाई में दस्तक देने आए हैंहवा की सर्द लहरों मेंतुम्हारी याद की ख़ुश्बूकिसी बिछड़े हुए मौसम की आहट बन के आई हैगई रुत के तपाक-ए-हर्फ़ की गर्मीकिवाड़ों की दराज़ों से गुज़र कर जब भी आती हैमिरे दिल के निहाँ-ख़ानों में जैसेबर्फ़ गिरती हैवो पिछले साल का मंज़रकि जिस में हाथ हाथों में लिए हमफूल की महकार में घुलते हुए लम्हों को गिनते थेवो अब ख़्वाबों की किरची हैसुनो वो शाम-ए-रुख़्सत काधुआँ जो अब भी बस्ती की फ़ज़ा में रक़्स करता हैमिरी आँखों की बे-ख़्वाबी का मातम बन के फैला हैशजर अब नंगे पाँव हैंबरहना शाख़ के दुख पर परिंदे बैन करते हैंपुरानी वज़' का सूरजकई बीते हुए लम्हों की चादर तान लेता हैपलट आओ कि इस से क़ब्लसब रस्ते धुँदलके की कड़ी दीवार बन जाएँपलट आओ कि इस से क़ब्लकिसी यख़-बस्ता शब की ख़ामुशी मेंआख़री उम्मीद का साया भी सो जाए
या बाग़ में खिलता है दम-ए-सुब्ह गुल-ए-तरक्या क्या उसे होते नहीं ए'ज़ाज़ मयस्सरबनता है 'अरूसान-ए-जहाँ के लिए ज़ेवरदस्तार में नौशा के रहा करता है अक्सरलेकिन न किसी वज़' पर इस ढंग से देखाबेकस की लहद पर उसे जिस रंग से देखा
बीबियोजन्नती है वो बीवी जो शौहर के आने से पहलेसजे और सँवरेमू-ब-मू मोतियों को पिरोएइश्तिहा-ख़ेज़ ख़ुशबू भरे क़ाब खानों के तय्यार रक्खेरोटियाँ गर्म और नर्म बिस्तर का हो एहतिमामआफ़ताबेसर्द और गर्म पानी के मौजूद होंवहाँ न जाने उसे सर्द पानी की ख़्वाहिश हो या गर्म कीउस की ख़्वाहिश का कोई भरोसा नहींताकि उस का मजाज़ी ख़ुदा उस का मालिक जो आएज़रूरत की हर चीज़ बिन माँगे पाएऔर हाँ बीबियोइक छड़ी बेद की ख़ूब मज़बूत सीवो भी रखना न भूलेकौन जाने स'ऊबत के मैदाँ का हारा थका वो सिपाहीशोमी-ए-बख़्त सेना-मुरादी के ज़ख़्मों से लिथड़ा हुआ आ रहा होजो आए ढूँडने की न ज़हमत उठाएनेक बीबी के बेचारा शानों से रेशम का रंगीं लबादाउस छड़ी से हटा करअपनी नाकामियों का लहू उस के शफ़्फ़ाफ़ नाज़ुक बदन पर छिड़क देताकि फिर चैन की नींद वो सो सकेहाँ मजाज़ी ख़ुदा है होता सज्दा ख़ुदा के सिवा गर किसी को रवा तोउसी को रवा है उसी ने तो तुम को बचा के ज़माने कीधूपों से घर के हिसारों में महफ़ूज़ रक्खा उस की मेहनतके पाए हुए रिज़्क़ से ही तो दामन तुम्हारा भरासो मिरी बीबियो जन्नती है वो बीवीजो शौहर की ख़्वाहिश पे जीती रहीदिन को उस ने कहा रात तो उस ने भी रात समझाउस की ख़ातिर वो मर-मर के ज़िंदा रहीउस की ख़ातिर मरीसीधी जन्नत सिधारेगी पुर्सिश न होगी गुनाहों कीसब मु'आफ़ होंगेवा'ज़ मेंकहने वाली ने इतना कहा और चुप हो गईनेक बीबी की बख़्शिश का मुज़्दा सुनायामगर ऐसा शौहर कहाँ जाएगा उस की बाबत किसी को न कुछ भी बतायाख़ुदाया ख़ुदायासफ़-ब-सफ़ नस्ल-दर-नस्ल बे-मोल की ये कनीज़ेंइन्हें उन के होने का एहसासतू ही 'अता कर
हम देखेंगेलाज़िम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिस का वादा हैजो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा हैजब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँरूई की तरह उड़ जाएँगेहम महकूमों के पाँव-तलेजब धरती धड़-धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
मुंतज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिएअब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिएपर मुसीबत है मिरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिएऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
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