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नज़्म
हमेशा बे-यक़ीनी के ख़तर से काँपते आए
हमेशा ख़ौफ़ के पैराहनों से अपने पैकर ढाँपते आए
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
आँख से चंद आँसू टपक कर मेरे
कान को ढाँपते मेरे बालों की सूखी लटों को भिगोतें हुए कान में जा गिरे
कँवल मलिक
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ