aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "KHauf"
सो ये जवाब है मेरा मिरे अदू के लिएकि मुझ को हिर्स-ए-करम है न ख़ौफ़-ए-ख़म्याज़ाउसे है सतवत-ए-शमशीर पर घमंड बहुतउसे शिकोह-ए-क़लम का नहीं है अंदाज़ा
कुछ लोग तुम्हें समझाएँगेवो तुम को ख़ौफ़ दिलाएँगेजो है वो भी खो सकता हैइस राह में रहज़न हैं इतनेकुछ और यहाँ हो सकता हैकुछ और तो अक्सर होता हैपर तुम जिस लम्हे में ज़िंदा होये लम्हा तुम से ज़िंदा हैये वक़्त नहीं फिर आएगातुम अपनी करनी कर गुज़रोजो होगा देखा जाएगा
ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुएतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन सेन जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुमवो शोख़ियाँ वो तबस्सुम वो क़हक़हे न रहेहर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुमछुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनीख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुममेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दोउमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहींमिरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करोग़म-ए-हयात ग़म-ए-यक-नफ़स है कुछ भी नहींतुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करोवफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहींमुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत होमिरी फ़ना मिरे एहसास का तक़ाज़ा हैमैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम कोमुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया हैयहाँ हयात के पर्दे में मौत पलती हैशिकस्त-ए-साज़ की आवाज़ रूह-ए-नग़्मा हैमुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहींमिरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुमये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँमगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुमख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब परतुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुममिरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगामगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहोहुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लियायहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तोमुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी कीमैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दोमैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगामगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकतामैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँमगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकतातुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझेनजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकताये ऊँचे ऊँचे मकानों की डेवढ़ियों के तलेहर एक गाम पे भूके भिकारीयों की सदाहर एक घर में है अफ़्लास और भूक का शोरहर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुकाये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस मेंहै दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्माये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलकये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशेये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोरये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द-रू बच्चेगली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरेहुसैन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुईये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँख़रीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिन कीये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्तये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरीये ग़म बहुत हैं मिरी ज़िंदगी मिटाने कोउदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो
फिर वही ख़ौफ़ की दीवार तज़ब्ज़ुब की फ़ज़ाफिर वही आम हुईं अहल-ए-रिया की बातेंनारा-ए-हुब्ब-ए-वतन माल-ए-तिजारत की तरहजिंस-ए-अर्ज़ां की तरह दीन-ए-ख़ुदा की बातें
अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करोजब दिल टुकड़े हो जाएगाऔर सारे ग़म मिट जाएँगेतुम ख़ौफ़-ओ-ख़तर से दर-गुज़रोजो होना है सो होना हैगर हँसना है तो हँसना हैगर रोना है तो रोना हैतुम अपनी करनी कर गुज़रोजो होगा देखा जाएगा
मिरी नज़रों मेंआइंदा के अफ़सोस के साए लर्ज़ां हैंमुझे क़ैद-ख़ौफ़ से रिहा करोमैं अपने दर्द की नंगी धूप सेघनी तसल्ली माँग माँग के हार गयाऐ दर्द मिरा फ़ैसला करोमिरी ख़ाली आँखेंमंज़र मंज़र भटक रहीलड़खड़ा रही हैंदया करोमुझे ख़्वाबों की बैसाखी दो
मेरे स्कूल मिरी यादों के पैकर सुन लेमैं तिरे वास्ते रोता हूँ बराबर सुन लेतेरे उस्तादों ने मेहनत से पढ़ाया है मुझेतेरी बेंचों ने ही इंसान बनाया है मुझेना-तराशीदा सा हीरा था तराशा तू नेज़ेहन-ए-तारीक को बख़्शा है उजाला तू नेइल्म की झील का तैराक बनाया है मुझेख़ौफ़ को छीन के बेबाक बनाया है मुझेतुझ से शफ़क़त भी मिली तुझ से मोहब्बत भी मिलीदौलत-ए-इल्म मिली मुझ को शराफ़त भी मिलीशफ़्क़तें ऐसी मिली हैं मुझे उस्तादों कीपरवरिश करता हो जैसे कोई शहज़ादों कीतेरी चाहत में मैं इस दर्जा भी खो जाता थातेरी बेंचों पे ही कुछ देर को सो जाता था
तो ख़ौफ़ नहीं ले चल!ऐ इश्क़ कहीं ले चल!
जहाँ-ज़ादवो हल्ब की कारवाँ-सरा का हौज़, रात वो सुकूतजिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहेमुहीत जिस तरह हो दाएरे के गिर्द हल्क़ा-ज़नतमाम रात तैरते रहे थे हमहम एक दूसरे के जिस्म ओ जाँ से लग केतैरते रहे थे एक शाद-काम ख़ौफ़ सेकि जैसे पानी आँसुओं में तैरता रहेहम एक दूसरे से मुतमइन ज़वाल-ए-उम्र के ख़िलाफ़तैरते रहेतू कह उठी 'हसन यहाँ भी खींच लाईजाँ की तिश्नगी तुझे!'(लो अपनी जाँ की तिश्नगी को याद कर रहा था मैंकि मेरा हल्क़ आँसुओं की बे-बहा सख़ावतोंसे शाद-काम हो गया!)मगर ये वहम दिल में तैरने लगा कि हो न होमिरा बदन कहीं हलब के हौज़ ही में रह गयानहीं, मुझे दुई का वाहिमा नहींकि अब भी रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ का ए'तिबार है मुझेयही वो ए'तिबार थाकि जिस ने मुझ को आप में समो दियामैं सब से पहले 'आप' हूँअगर हमीं हों तू हो और मैं हूँ फिर भी मैंहर एक शय से पहले आप हों!अगर मैं ज़िंदा हूँ तो कैसे आप से दग़ा करूँ?कि तेरे जैसी औरतें, जहाँ-ज़ाद,ऐसी उलझनें हैंजिन को आज तक कोई नहीं 'सुलझ' सकाजो मैं कहूँ के मैं 'सुलझ' सका तो सर-ब-सरफ़रेब अपने आप से!कि औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने-आप परजवाब जिस का हम नहीं(लबीब कौन है? तमाम रात जिस का ज़िक्रतेरे लब पे थावो कौन तेरे गेसुओं को खींचता रहालबों को नोचता रहाजो मैं कभी न कर सकानहीं ये सच है मैं हूँ या लबीब होरक़ीब हो तो किस लिए तिरी ख़ुद-आगही की बे-रिया नशात-ऐ-नाब काजो सद-नवा ओ यक-नवा खिराम-ऐ-सुब्ह की तरहलबीब हर नवा-ऐ-साज़-गार की नफ़ी सही!)मगर हमारा राब्ता विसाल-ए-आब-ओ-गिल नहीं, न था कभीवजूद-ए-आदमी से आब-ओ-गिल सदा बरूँ रहेन हर विसाल-ए-आब-ओ-गिल से कोई जाम या सुबू ही बन सकाजो इन का एक वाहिमा ही बन सके तो बन सके!
मज़लूमरात छाई तो हर इक दर्द के धारे छूटेसुब्ह फूटी तो हर इक ज़ख़्म के टाँके टूटेदोपहर आई तो हर रग ने लहू बरसायादिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आयाया ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहरये मिरी उम्र का बे-मंज़िल ओ आराम सफ़रक्या यही कुछ मिरी क़िस्मत में लिखा है तू नेहर मसर्रत से मुझे आक़ किया है तू नेवो ये कहते हैं तू ख़ुश-नूद हर इक ज़ुल्म से हैवो ये कहते हैं हर इक ज़ुल्म तिरे हुक्म से हैगर ये सच है तो तिरे अद्ल से इंकार करूँ?उन की मानूँ कि तिरी ज़ात का इक़रार करूँ?
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
ऐ इश्क़-ए-अज़ल-गीर ओ अबद-ताबऐ काहिन-ए-दानिश-वर ओ आली-गुहर ओ पीरतू ने ही बताई हमें हर ख़्वाब की ताबीरतूने ही सुझाई ग़म-ए-दिल-गीर की तस्ख़ीरटूटी तिरे हाथों ही से हर ख़ौफ़ की ज़ंजीरऐ इश्क़-ए-अज़ल-गीर ओ अबद-ताब, मेरे भी हैं कुछ ख़्वाबमेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
ख़ौफ़-ए-आफ़त से कहाँ दिल में रिया आएगीबात सच्ची है जो वो लब पे सदा आएगीदिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़तमेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगीमैं उठा लूँगा बड़े शौक़ से उस को सर परख़िदमत-ए-क़ौम-ओ-वतन में जो बला आएगीसामना सब्र ओ शुजाअत से करूँगा मैं भीखिंच के मुझ तक जो कभी तेग़-ए-जफ़ा आएगीग़ैर ज़ोम और ख़ुदी से जो करेगा हमलामेरी इमदाद को ख़ुद ज़ात-ए-ख़ुदा आएगीआत्मा हूँ मैं बदल डालूँगा फ़ौरन चोलाक्या बिगाड़ेगी अगर मेरी क़ज़ा आएगीख़ून रोएगी समा पर मेरे मरने पे शफ़क़ग़म मनाने के लिए काली घटा आएगीअब्र-ए-तर अश्क बहाएगा मिरे लाशे परख़ाक उड़ाने के लिए बाद-ए-सबा आएगीज़िंदगानी में तो मिलने से झिझकती है 'फ़लक'ख़ल्क़ को याद मिरी ब'अद-ए-फ़ना आएगी
दरख़्त! मेरे दोस्ततुम मिल जाते हो किसी न किसी मोड़ परऔर आसान कर देते हो सफ़रतुम्हारे पैर की उँगलियाँजमी रहीं पाताल के भेदों परक़ाएम रहे मेरे दोस्ततुम्हारे तने की मतानत और क़ुव्वतधूप और बारिश तुम्हें अपने तोहफ़ों से नवाज़ती रहेतुम बहुत पुर-वक़ार और सादा होमेरे थैले को जानना चाहते होज़रूर.... ये लो मैं इसे खोलता हूँरोटियाँ दुआएँ और नज़्मेंमेरे पास इस से ज़ियादा कुछ नहींएक शायर के पास इस से ज़ियादा कुछ नहीं होतादोस्त दुख देना तुम ने सीखा ही नहींतुम ने न तो मुझ से शायरी का मतलब पूछाऔर न कभी मेरे मुतालेए पर शक कियाऐसा ही होना चाहिए दोस्तों कोअगर मेरे पास इक और ज़िंदगी होती तोतो मैं अपनी पहली ज़िंदगी तुम्हारी जड़ों पर गुज़ार देतामगर मैं घर से ख़ानदान भर ख़ुशियों के लिए निकला हूँऔर वहाँ मेरा इंतिज़ार किया जा रहा हैतुम ने मेरे दोस्तहाँ तुम नेबहुत कुछ सिखाया है मुझेमसलन ज़मीन और आसमानी बिजलीऔर हवाऔर इंतिज़ारऔर दूसरों के लिए ज़िंदा रहनाबहुत क़ीमती हैं ये बातेंमैं क्या दे सकता हूँ इस फ़य्याज़ी का जवाबमेरे पास तुम्हारे लिएएक रोटी और दुआ हैरोटी: तुम्हारी चियूँटियों के लिएदुआ तुम्हारे आख़िरी दिन के लिएमुझे मालूम है तुम ने कुल्हाड़ी के मुसाफ़हेऔर आरी की हँसी से कभी ख़ौफ़ नहीं खायामगर तुम रोक नहीं सकते इन्हेंकोई भी नहीं रोक सकताख़ुदा करेख़ुदा करे तुम्हारी शाख़ों से एक झोंपड़ी बनाई जाएबाज़ुओं के घेरे में न आने वाले तुम्हारेतने की लकड़ीबहुत काफ़ी हैदो पहियों और एक कश्ती के लिएदोस्त: हम फिर मिलेंगेमुसाफ़िर और छकड़ामुसाफ़िर और कश्तीकहीं न कहीं हम फिर एक साथ होंगेकहीं न कहींएक साथ.... हम सामना करेंगेहवा का और रास्तों कामसर्रत और मौत का....
मरने चले तो सतवत-ए-क़ातिल का ख़ौफ़ क्याइतना तो हो कि बाँधने पाए न दस्त ओ पामक़्तल में कुछ तो रंग जमे जश्न-ए-रक़्स कारंगीं लहू से पंजा-ए-सय्याद कुछ तो होख़ूँ पर गवाह दामन-ए-जल्लाद कुछ तो होजब ख़ूँ-बहा तलब करें बुनियाद कुछ तो हो
मुझे ख़ौफ़ है कि किताब मेंमिरे रोज़-ओ-शब की अज़िय्यतेंवो नदामतें वो मलामतेंकिसी हाशिए पे रक़म न होंमैं फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-बरतरीमैं असीर-ए-हल्क़ा-ए-बुज़-दिलीवो किताब कैसे पढ़ूँगी मैं?
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
ऐ वतन जोश है फिर क़ुव्वत-ए-ईमानी मेंख़ौफ़ क्या दिल को सफ़ीना है जो तुग़्यानी मेंदिल से मसरूफ़ हैं हर तरह की क़ुर्बानी मेंमहव हैं जो तिरी कश्ती की निगहबानी मेंग़र्क़ करने को जो कहते हैं ज़माने वालेमुस्कुराते हैं तिरी नाव चलाने वाले
हम जीतेंगेहक़्क़ा हम इक दिन जीतेंगेबिल-आख़िर इक दिन जीतेंगेक्या ख़ौफ़ ज़ी-यलग़ार-ए-आदाहै सीना सिपर हर ग़ाज़ी काक्या ख़ौफ़ ज़ी-यूरिश-ए-जैश-ए-क़ज़ासफ़-बस्ता हैं अरवाहुश्शुहदाडर काहे का
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