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नज़्म
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब भाई जंग में काम आएँ
सरमाए के क़हबा-ख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा