aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aariz"
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामतनिगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़तधड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृतहमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकतलचक लचक गुनगुना रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
वही गेसू वही नज़रें वही आरिज़ वही जिस्ममैं जो चाहूँ तो मुझे और भी मिल सकते हैंवो कँवल जिन को कभी उन के लिए खिलना थाउन की नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
तू किसी और के दामन की कली है लेकिनमेरी रातें तिरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैंतू कहीं भी हो तिरे फूल से आरिज़ की क़समतेरी पलकें मिरी आँखों पे झुकी रहती हैं
तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीरमेरे तख़्ईल में रह रह के झलक उठती हैयूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता हैजैसे ज़ुल्मत में कोई शम्अ भड़क उठती है
हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा थाख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा थातिरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ हैतू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा थातिरी चीन-ए-जबीं ख़ुद इक सज़ा क़ानून-ए-फ़ितरत मेंइसी शमशीर से कार-ए-सज़ा लेती तो अच्छा थाये तेरा ज़र्द रुख़ ये ख़ुश्क लब ये वहम ये वहशततू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा थादिल-ए-मजरूह को मजरूह-तर करने से क्या हासिलतू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा थातिरे ज़ेर-ए-नगीं घर हो महल हो क़स्र हो कुछ होमैं ये कहता हूँ तू अर्ज़-ओ-समा लेती तो अच्छा थाअगर ख़ल्वत में तू ने सर उठाया भी तो क्या हासिलभरी महफ़िल में आ कर सर झुका लेती तो अच्छा थातिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा हैअगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा थाअयाँ हैं दुश्मनों के ख़ंजरों पर ख़ून के धब्बेउन्हें तू रंग-ए-आरिज़ से मिला लेती तो अच्छा थासनानें खींच ली हैं सर-फिरे बाग़ी जवानों नेतू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा थातिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनतू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतनजो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करेंकितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगाकितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें
तू मेरा हैतेरे मन में छुपे हुए सब दुख मेरे हैंतेरी आँख के आँसू मेरेतेरे लबों पे नाचने वाली ये मा'सूम हँसी भी मेरीतू मेरा हैहर वो झोंकाजिस के लम्स कोअपने जिस्म पे तू ने भी महसूस किया हैपहले मेरे हाथों कोछू कर गुज़रा थातेरे घर के दरवाज़े परदस्तक देने वालाहर वो लम्हा जिस मेंतुझ को अपनी तन्हाई काशिद्दत से एहसास हुआ थापहले मेरे घर आया थातू मेरा हैतेरा माज़ी भी मेरा थाआने वाली हर सा'अत भी मेरी होगीतेरे तपते 'आरिज़ की दोपहर है मेरीशाम की तरह गहरे गहरे ये पलकों साए हैं मेरेतेरे सियाह बालों की शब से धूप की सूरतवो सुब्हें जो कल जागेंगीमेरी होंगीतू मेरा हैलेकिन तेरे सपनों में भी आते हुए ये डर लगता हैमुझ से कहीं तू पूछ न बैठेक्यूँ आए होमेरा तुम से क्या नाता है
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी रुख़-ए-गुलरंग पे वोजन्नत के नज़ारे रौशन हैंक्या अब भी रसीली आँखों मेंसावन के सितारे रौशन हैंओ देस से आने वाले बताओ देस से आने वाले बताक्या अब भी शहाबी आरिज़ परगेसू-ए-सियह बिल खाते हैंया बहर-ए-शफ़क़ की मौजों परदो नाग पड़े लहराते हैंऔर जिन की झलक से सावन कीरातों के सपने आते हैंओ देस से आने वाले बता
मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई होअपने साए से झिझकती हुई घबराती हुईअपने एहसास की तहरीक पे शरमाती हुईअपने क़दमों की भी आवाज़ से कतराती हुईअपनी साँसों के महकते हुए अंदाज़ लिएअपनी ख़ामोशी में गहनाए हुए राज़ लिएअपने होंटों पे इक अंजाम का आग़ाज़ लिएदिल की धड़कन को बहुत रोकती समझाती हुईअपनी पायल की ग़ज़ल-ख़्वानी पे झल्लाती हुईनर्म शानों पे जवानी का नया बार लिएशोख़ आँखों में हिजाबात से इंकार लिएतेज़ नब्ज़ों में मुलाक़ात के आसार लिएकाले बालों से बिखरती हुई चम्पा की महकसुर्ख़ आरिज़ पे दमकते हुए शालों की चमकनीची नज़रों में समाई हुई ख़ुद्दार झिजकनुक़रई जिस्म पे वो चाँद की किरनों की फुवारचाँदनी रात में बुझता हुआ पलकों का सितारफ़र्त-ए-जज़्बात से महकी हुई साँसों की क़तारदूर माज़ी की बद-अंजाम रिवायात लिएनीची नज़रें वही एहसास-ए-मुलाक़ात लिएवही माहौल वही तारों भरी रात लिएआज तुम आई हो दोहराती हुई माज़ी कोमेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई होकाश इक ख़्वाब रहे तल्ख़ हक़ीक़त न बनेये मुलाक़ात भी दीवाने की जन्नत न बने
फिर न दहकेंगे कभी आरिज़-ओ-रुख़्सार मिलोमातमी हैं दम-ए-रुख़्सत दर-ओ-दीवार मिलोफिर न हम होंगे न इक़रार न इंकार मिलोआख़िरी बार मिलो
तू दमकते हुए आरिज़ की शुआएँ ले करगुल-शुदा शमएँ जलाने को चली आई है
तुम्हें क्याज़िंदगी जैसी भी हैतुम ने उस के हर अदा से रंग की मौजें निचोड़ी हैंतुम्हें तो टूट कर चाहा गया चेहरों के मेले मेंमोहब्बत की शफ़क़ बरसी तुम्हारे ख़ाल-ओ-ख़द परआइने चमके तुम्हारी दीद सेख़ुश्बू तुम्हारे पैरहन की हर शिकन सेइज़्न ले कर हर तरफ़ वहशत लुटाती थीतुम्हारे चाहने वालों के झुरमुट मेंसभी आँखें तुम्हारे आरिज़-ओ-लब की कनीज़ें थींतुम्हें क्यातुम ने हर मौसम की शह-ए-रग में उंडेले ज़ाइक़े अपनेतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि चेहरों से अटी दुनिया में तन्हा साँस लेतीहाँफती रातों के बे-घर हम-सफ़रकितनी मशक़्क़त से गरेबान-ए-सहर के चाक सीते हैंतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि तन्हाई के जंगल मेंसियह लम्हों की चुभती किर्चियों से कौन खेला हैतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि चेहरों से अटी दुनिया मेंकिस का दिल अकेला है
देखना जज़्ब-ए-मोहब्बत का असर आज की रातमेरे शाने पे है उस शोख़ का सर आज की रातऔर क्या चाहिए अब ऐ दिल-ए-मजरूह तुझेउस ने देखा तो ब-अंदाज़-ए-दिगर आज की रातफूल क्या ख़ार भी हैं आज गुलिस्ताँ-ब-कनारसंग-रेज़े हैं निगाहों में गुहर आज की रातमहव-ए-गुलगश्त है ये कौन मिरे दोश-ब-दोशकहकशाँ बन गई हर राहगुज़र आज की रातफूट निकला दर-ओ-दीवार से सैलाब-ए-नशातअल्लाह अल्लाह मिरा कैफ़-ए-नज़र आज की रातशब्नमिस्तान-ए-तजल्ली का फ़ुसूँ क्या कहिएचाँद ने फेंक दिया रख़्त-ए-सफ़र आज की रातनूर ही नूर है किस सम्त उठाऊँ आँखेंहुस्न ही हुस्न है ता-हद्द-ए-नज़र आज की रातक़स्र-ए-गीती में उमँड आया है तूफ़ान-ए-हयातमौत लर्ज़ां है पस-ए-पर्दा-ए-दर आज की रातअल्लाह अल्लाह वो पेशानी-ए-सीमीं का जमालरह गई जम के सितारों की नज़र आज की रातआरिज़-ए-गर्म पे वो रंग-ए-शफ़क़ की लहरेंवो मिरी शोख़-निगाही का असर आज की रातनर्गिस-ए-नाज़ में वो नींद का हल्का सा ख़ुमारवो मिरे नग़्म-ए-शीरीं का असर आज की रातनग़्मा ओ मय का ये तूफ़ान-ए-तरब क्या कहिएघर मिरा बन गया 'ख़य्याम' का घर आज की रातमेरी हर साँस पे वो उन की तवज्जोह क्या ख़ूबमेरी हर बात पे वो जुम्बिश-ए-सर आज की रातवो तबस्सुम ही तबस्सुम का जमाल-ए-पैहमवो मोहब्बत ही मोहब्बत की नज़र आज की रातउफ़ वो वारफ़्तगी-ए-शौक़ में इक वहम-ए-लतीफ़कपकपाए हुए होंटों पे नज़र आज की रातमज़हब-ए-इश्क़ में जाएज़ है यक़ीनन जाएज़चूम लूँ मैं लब-ए-लालीं भी अगर आज की रातअपनी रिफ़अत पे जो नाज़ाँ हैं तो नाज़ाँ ही रहेंकह दो अंजुम से कि देखें न इधर आज की रातउन के अल्ताफ़ का इतना ही फ़ुसूँ काफ़ी हैकम है पहले से बहुत दर्द-ए-जिगर आज की रात
ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैंजिंस-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैंइश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरीफ़ित्ना-ए-अक़्ल से बे-ज़ार हूँ मैंख़्वाब-ए-इशरत में हैं अरबाब-ए-ख़िरदऔर इक शाइर-ए-बेदार हूँ मैंछेड़ती है जिसे मिज़राब-ए-अलमसाज़-ए-फ़ितरत का वही तार हूँ मैंरंग नज़्ज़ारा-ए-क़ुदरत मुझ सेजान-ए-रंगीनी-ए-कोहसार हूँ मैंनश्शा-ए-नर्गिस-ए-ख़ूबाँ मुझ सेग़ाज़ा-ए-आरिज़-ओ-रुख़्सार हूँ मैंऐब जो हाफ़िज़ ओ ख़य्याम मैं थाहाँ कुछ इस का भी गुनहगार हूँ मैंज़िंदगी क्या है गुनाह-ए-आदमज़िंदगी है तो गुनहगार हूँ मैंरश्क-ए-सद-होश है मस्ती मेरीऐसी मस्ती है कि हुश्यार हूँ मैंले के निकला हूँ गुहर-हा-ए-सुख़नमाह ओ अंजुम का ख़रीदार हूँ मैंदैर ओ काबा में मिरे ही चर्चेऔर रुस्वा सर-ए-बाज़ार हूँ मैंकुफ़्र ओ इल्हाद से नफ़रत है मुझेऔर मज़हब से भी बे-ज़ार हूँ मैंअहल-ए-दुनिया के लिए नंग सहीरौनक़-ए-अंजुमन-ए-यार हूँ मैंऐन इस बे-सर-ओ-सामानी मेंक्या ये कम है कि गुहर-बार हूँ मैंमेरी बातों में मसीहाई हैलोग कहते हैं कि बीमार हूँ मैंमुझ से बरहम है मिज़ाज-ए-पीरीमुजरिम-ए-शोख़ी-ए-गुफ़्तार हूँ मैंहूर ओ ग़िल्माँ का यहाँ ज़िक्र नहींनौ-ए-इंसाँ का परस्तार हूँ मैंमहफ़िल-ए-दहर पे तारी है जुमूदऔर वारफ़्ता-ए-रफ़्तार हूँ मैंइक लपकता हुआ शो'ला हूँ मैंएक चलती हुई तलवार हूँ मैं
वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियमवो मख़मूर आँखें वो गेसू-ए-पुर-ख़मवो अर्ज़-ए-कलीसा की इक माह-पारावो दैर-ओ-हरम के लिए इक शरारावो फ़िरदौस-ए-मरियम का इक ग़ुंचा-ए-तरवो तसलीस की दुख़्तर-ए-नेक-अख़्तरवो इक नर्स थी चारा-गर जिस को कहिएमदावा-ए-दर्द-ए-जिगर जिस को कहिएजवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थीहवा चल रही थी कली खिल रही थीवो पुर-रोब तेवर वो शादाब चेहरामता-ए-जवानी पे फ़ितरत का पहरामिरी हुक्मरानी है अहल-ए-ज़मीं परये तहरीर था साफ़ उस की जबीं परसफ़ेद और शफ़्फ़ाफ़ कपड़े पहन करमिरे पास आती थी इक हूर बन करवो इक आसमानी फ़रिश्ता थी गोयाकि अंदाज़ था उस में जिब्रईल का सावो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं कीवो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं कीवो तस्कीन-ए-दिल थी सुकून-ए-नज़र थीनिगार-ए-शफ़क़ थी जमाल-ए-नज़र थीवो शो'ला वो बिजली वो जल्वा वो परतवसुलैमाँ की वो इक कनीज़-ए-सुबुक-रौकभी उस की शोख़ी में संजीदगी थीकभी उस की संजीदगी में भी शोख़ीघड़ी चुप घड़ी करने लगती थी बातेंसिरहाने मिरे काट देती थी रातेंअजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वोकभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वोनक़ाहत के आलम में जब आँख उठतीनज़र मुझ को आती मोहब्बत की देवीवो उस वक़्त इक पैकर-ए-नूर होतीतख़य्युल की पर्वाज़ से दूर होतीहंसाती थी मुझ को सुलाती थी मुझ कोदवा अपने हाथों से मुझ को पिलातीअब अच्छे हो हर रोज़ मुज़्दा सुनातीसिरहाने मिरे एक दिन सर झुकाएवो बैठी थी तकिए पे कुहनी टिकाएख़यालात-ए-पैहम में खोई हुई सीन जागी हुई सी न सोई हुई सीझपकती हुई बार बार उस की पलकेंजबीं पर शिकन बे-क़रार उस की पलकेंवो आँखों के साग़र छलकते हुए सेवो आरिज़ के शोले भड़कते हुए सेलबों में था लाल-ओ-गुहर का ख़ज़ानानज़र आरिफ़ाना अदा राहिबानामहक गेसुओं से चली आ रही थीमिरे हर नफ़स में बसी जा रही थीमुझे लेटे लेटे शरारत की सूझीजो सूझी भी तो किस क़यामत की सूझीज़रा बढ़ के कुछ और गर्दन झुका लीलब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा लीवो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिएबेहिश्त-ए-जवानी का तोहफ़ा समझिएशराब-ए-मोहब्बत का इक जाम-ए-रंगींसुबू-ज़ार-ए-फ़ितरत का इक जाम-ए-रंगींमैं समझा था शायद बिगड़ जाएगी वोहवाओं से लड़ती है लड़ जाएगी वोमैं देखूँगा उस के बिफरने का आलमजवानी का ग़ुस्सा बिखरने का आलमइधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा थामगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा थाहँसी और हँसी इस तरह खिलखिला करकि शम-ए-हया रह गई झिलमिला करनहीं जानती है मिरा नाम तक वोमगर भेज देती है पैग़ाम तक वोये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सरकि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर
तेरे चेहरे के ये सादा से अछूते से नुक़ूशमेरी तख़्ईल को क्या रंग अता करते हैंतेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे आरिज़ तिरे होंटकैसी अन-जानी सी मासूम ख़ता करते हैं
आज भी कितनी अन-गिनत शमएँमेरे सीने में झिलमिलाती हैंकितने आरिज़ की झलकियाँ अब तकदिल में सीमीं वरक़ लुटाती हैंकितने हीरा-तराश जिस्मों कीबिजलियाँ दिल में कौंद जाती हैंकितनी तारों से ख़ुश-नुमा आँखेंमेरी आँखों में मुस्कुराती हैंकितने होंटों की गुल-फ़िशाँ आँचेंमेरे होंटों में सनसनाती हैंकितनी शब-ताब रेशमी ज़ुल्फ़ेंमेरे बाज़ू पे सरसराती हैंकितनी ख़ुश-रंग मोतियों से भरीबालियाँ दिल में टिमटिमाती हैंकितनी गोरी कलाइयों की लवेंदिल के गोशों में जगमगाती हैंकितनी रंगीं हथेलियाँ छुप करधीमे धीमे कँवल जलाती हैंकितनी आँचल से फूटती किरनेंमेरे पहलू में रसमसाती हैंकितनी पायल की शोख़ झंकारेंदिल में चिंगारियाँ उड़ाती हैंकितनी अंगड़ाइयाँ धनक बन करख़ुद उभरती हैं टूट जाती हैंकितनी गुल-पोश नक़्रई बाँहेंदिल को हल्क़े में ले के गाती हैंआज भी कितनी अन-गिनत शमएँमेरे सीने में झिलमिलाती हैंअपने इस जल्वा-गर तसव्वुर कीजाँ-फ़ज़ा दिलकशी से ज़िंदा हूँइन ही बीते जवान लम्हों कीशोख़-ताबिंदगी से ज़िंदा हूँयही यादों की रौशनी तो हैआज जिस रौशनी से ज़िंदा हूँआओ मैं तुम से ए'तिराफ़ करूँमैं इसी शाइरी से ज़िंदा हूँ
वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैंये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैंवही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापालबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैंवही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुममैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैंख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगींक़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैंशबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगींतमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैंतमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़रसँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैंबहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्यातमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैंतुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुलसब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैंशराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही हैछलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैंख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैंख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैंफ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा हैवो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैंज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शामकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैंवो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनमये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैंये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे हैगुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैंये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुमज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैंफ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई हैसुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैंअब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल परहम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैंये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़ममगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैंज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्लीतिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअनी बना रहे हैंख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत हैये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों कीघटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों कीवो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की
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