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नज़्म
कि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा है
अगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिन
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
और होती हैं तजल्ली-बख़्श ताज-ए-ज़र-फ़िशाँ
फिर भी वो शायर की नज़रों में हैं ख़ाली सीपियाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
क़ुर्बत-ए-गुल किस क़दर जाँ-बख़्श है ख़ारों से पूछ
चाँद की तनवीर में क्या लुत्फ़ है तारों से पूछ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
चाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगा
उस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तब
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
मुझ को बख़्श दो
मैं इस से पहले भी तो साया-ए-शजर की जुस्तुजू में इतने ज़ख़्म खा चुका हूँ