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नज़्म
ज़िंदगी इंसाँ की है मानिंद-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-नवा
शाख़ पर बैठा कोई दम चहचहाया उड़ गया
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बुलबुलें चहकारती हैं शाख़-ए-गुल पर जा-ब-जा
बुलबुलें क्या फ़िल-हक़ीक़त चहचहाती है बहार