aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chuusaa"
शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंगइश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंगघात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दारखेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकाररफ़्ता रफ़्ता लूट ली तेरी मता-ए-आबरूख़ूब चूसा तेरी रग रग से जवानी का लहूखेलते हैं आज भी तुझ से यही सरमाया-दारये तमद्दुन के ख़ुदा तहज़ीब के पर्वरदिगारसामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम परख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सररास्ते में दिन को ले सकते नहीं तेरा सलामरात को जो तेरे हाथों से चढ़ा जाते हैं जामतेरे कूचा से जिन्हें हो कर गुज़रना है गुनाहगर्म उन की साँस से रहती है तेरी ख़्वाब-गाहमहफ़िलों में तुझ से कर सकते नहीं जो गुफ़्तुगूतेरे आँचल में बंधी है उन की झूटी आबरू
जून ने जूँही जल्वा दिखायादिल ने ख़ुशी का नग़्मा गायाआया आम का मौसम आयाहम ने गर्मी की छुट्टी मेंमीठे आम का लुत्फ़ उठायाआया आम का मौसम आयाशिद्दत जब गर्मी की बढ़ी तोमेरे रब ने मेंह बरसायाआया आम का मौसम आयापहले इस को फ्रीज़ में रक्खाबत्न में इस के बाद बिठायाआया आम का मौसम आयाकुछ भी न छोड़ा जुज़ छिलकों केगुठली चूसी गूदा खायाआया आम का मौसम आयाचाैंसे का रस चूसा हम नेसिंधड़ी का फिर शेक बनायाआया आम का मौसम आयाख़ुद वो कितना मीठा होगाजिस ने शीरीं आम बनायाआया आम का मौसम आया
उस ने मुझे धूप-भरी अजरक पेश कीमैं ने उस धूप को अपनी ज़मीन पर रखाकपास और खजूर उगाईखजूर से शराब और कपास से अपनी महबूबा के लिएमहीन मलमल कातीमलमल ने उस के बदन को छुआउस पर फूल निकल आएशराब को ज़मीन में दबायाउस पर ताड़ के दरख़्त उग आएइस ने मुझे धूप-भरी अजरक पेश कीमैं ने उस धूप को अपने दिल पर रखाजो सरसों का फूल बन गईउस फूल से एक मौसम पैदा हुआजिस का नाम मैं ने इश्क़ और सख़ावत का मौसम रख दियाउस मौसम के बीज से एक रास्ताउस के घर की तरफ़ निकलाउस बीज से पाँच कबूतर निकलेभरी हुई गागर वाले फ़क़ीर के रौज़े पर जा कर बैठ गएउस ने मुझे धूप से भरी अजरक पेश कीमैं ने उसे तुम्हारे घर के ज़ीने पर फैला दियाताकि तुम धूप की सीढ़ियों से मेरे दिल में उतर सकोमुझे याद है कभी न कभी कहीं न कहींमेरा सितारा तुम्हारे सितारे के क़रीब से गुज़रा हैउस ने मुझे धूप-भरी अजरक पेश कीमैं ने उसे समुंदर में फैला दियाहवा ने उस का रस चूसाऔर मदहोश हो कर बादबानों से लिपट गईसमुंदर के अंदर एक और समुंदर नींद से जागादोनों एक दूसरे के ख़रोश मेंदेर तक इस धूप में आँखें मूँदे लेटे रहेइस ने मुझे धूप-भरी अजरक पेश कीफिर मैं ने वो अजरक शहबाज़ क़लंदर के एकफ़क़ीर को दे दीउस ने मुझे दुआ का एक बादल दियामैं जिसे अपने सर पर लिए फिरता हूँ
हल्की-फुल्की बादबानी जरसियाँ पहना करोचाशनी डलवा के गोले बर्फ़ के चूसा करो
ख़िज़ाँ के दौर में फैली बरहना शाख़ों नेजड़ों की तरह से रंग-ए-शफ़क़ को चूसा थासुनहरी धूप की ताबानियों को जज़्ब कियासफ़ेद बर्फ़ की नर्मी को यूँ समोया थाकि अब बहार के आने पे वो गुलाबी शफ़क़गुलों के रूप में शाख़ों पे फूट आई हैसफ़ेद बर्फ़ ने फूलों की पंखुड़ी का बदनसुनहरी धूप ने पीले गुलों को ढाला हैबहार का ये तसव्वुर जवान रखता हैख़िज़ाँ-ओ-यास के फैलाए यख़ नज़ारों मेंख़याल-ए-ज़ीस्त ख़ुशी कामरानियों को मिरी
मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ाखो चुका है जो किसी और की रानाई मेंशायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल मेंऔर कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता हैकि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव मेंगुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थीये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर हैतिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थीअजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो करतिरे जमाल की रानाइयों में खो रहतातिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखेंइन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहतापुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने कीतिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेताहयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैंघनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेतामगर ये हो न सका और अब ये आलम हैकि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहींगुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसेइसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहींज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गलेगुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों सेमुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैंहयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों सेन कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरीइन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो करमैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँहीकभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँचली है रस्म कि कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकलेनज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चलेहै अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशादकि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूरसुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गामबदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूरनशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हरामजिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलनकिसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहींकहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गईअभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहींअभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आईनजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आईचले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
ये इक शाम-ए-अज़ाब-ए-बे-सरोकाराना हालत हैहुए जाने की हालत में हूँ बस फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत हैनहीं मालूम तुम इस वक़्त किस मालूम में होगेन जाने कौन से मअनी में किस मफ़्हूम में होगेमैं था मफ़्हूम ना-मफ़्हूम में गुम हो चुका हूँ मैंमैं था मालूम ना-मालूम में गुम हो चुका हूँ मैं
जिस दिन से मिले हैं दोनों का सब चैन गया आराम गयाचेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गयाहाथों से ख़ुशी का जाम छुटा होंटों से हँसी का नाम गया
जो ज़िंदगी के नए सफ़र मेंतुझे किसी वक़्त याद आएँतो एक इक हर्फ़ जी उठेगापहन के अन्फ़ास की क़बाएँउदास तन्हाइयों के लम्होंमें नाच उट्ठेंगी ये अप्सराएँमुझे तिरे दर्द के अलावा भीऔर दुख थे ये मानता हूँहज़ार ग़म थे जो ज़िंदगी कीतलाश में थे ये जानता हूँमुझे ख़बर थी कि तेरे आँचल मेंदर्द की रेत छानता हूँमगर हर इक बार तुझ को छू करये रेत रंग-ए-हिना बनी हैये ज़ख़्म गुलज़ार बन गए हैंये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी हैये दर्द मौज-ए-सबा हुआ हैये आग दिल की सदा बनी हैऔर अब ये सारी मता-ए-हस्तीये फूल ये ज़ख़्म सब तिरे हैंये दुख के नौहे ये सुख के नग़्मेजो कल मिरे थे वो अब तिरे हैंजो तेरी क़ुर्बत तिरी जुदाईमें कट गए रोज़-ओ-शब तिरे हैंवो तेरा शाइ'र तिरा मुग़न्नीवो जिस की बातें अजीब सी थींवो जिस के अंदाज़ ख़ुसरवाना थेऔर अदाएँ ग़रीब सी थींवो जिस के जीने की ख़्वाहिशें भीख़ुद उस के अपने नसीब सी थींन पूछ इस का कि वो दिवानाबहुत दिनों का उजड़ चुका हैवो कोहकन तो नहीं था लेकिनकड़ी चटानों से लड़ चुका हैवो थक चुका था और उस का तेशाउसी के सीने में गड़ चुका है
जब से चमन छुटा है ये हाल हो गया हैदिल ग़म को खा रहा है ग़म दिल को खा रहा हैगाना इसे समझ कर ख़ुश हों न सुनने वालेदुखते हुए दिलों की फ़रियाद ये सदा हैआज़ाद मुझ को कर दे ओ क़ैद करने वालेमैं बे-ज़बाँ हूँ क़ैदी तू छोड़ कर दुआ ले!
कभी कभी मैं ये सोचता हूँकि चलती गाड़ी से पेड़ देखोतो ऐसा लगता हैदूसरी सम्त जा रहे हैंमगर हक़ीक़त मेंपेड़ अपनी जगह खड़े हैंतो क्या ये मुमकिन हैसारी सदियाँक़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी होंये वक़्त साकित होऔर हम ही गुज़र रहे होंइस एक लम्हे मेंसारे लम्हेतमाम सदियाँ छुपी हुई होंन कोई आइंदान गुज़िश्ताजो हो चुका हैजो हो रहा हैजो होने वाला हैहो रहा हैमैं सोचता हूँकि क्या ये मुमकिन हैसच ये होकि सफ़र में हम हैंगुज़रते हम हैंजिसे समझते हैं हमगुज़रता हैवो थमा हैगुज़रता है या थमा हुआ हैइकाई है या बटा हुआ हैहै मुंजमिदया पिघल रहा हैकिसे ख़बर हैकिसे पता हैये वक़्त क्या है
तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगीजो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगीभड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगीघनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगीकि आज तक आज़मा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही होनहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगीवफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगीमुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगीजुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगीक़रीब बढ़ती ही आ रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
अब घाट न घर दहलीज़ न दरअब पास रहा है क्या बाबाबस तन की गठरी बाक़ी हैजा ये भी तू ले जा बाबाहम बस्ती छोड़े जाते हैंतू अपना क़र्ज़ चुका बाबा
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारामुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारातौहीद की अमानत सीनों में है हमारेआसाँ नहीं मिटाना नाम-ओ-निशाँ हमारादुनिया के बुत-कदों में पहला वो घर ख़ुदा काहम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारातेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैंख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारामग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारीथमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमाराबातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमाराऐ गुलिस्तान-ए-उंदुलुस वो दिन हैं याद तुझ कोथा तेरी डालियों में जब आशियाँ हमाराऐ मौज-ए-दजला तू भी पहचानती है हम कोअब तक है तेरा दरिया अफ़्साना-ख़्वाँ हमाराऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हमहै ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारासालार-ए-कारवाँ है मीर-ए-हिजाज़ अपनाइस नाम से है बाक़ी आराम-ए-जाँ हमारा'इक़बाल' का तराना बाँग-ए-दरा है गोयाहोता है जादा-पैमा फिर कारवाँ हमारा
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश सेये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
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