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नज़्म
अहमद फ़राज़
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये न समझना मेरे साजन
दे न सकी मैं साथ तुम्हारा
ये न समझना मेरे दिल को
आज तुम्हारा दुख है गवारा
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगती
कोई घटता हुआ बढ़ता हुआ बेकल साया
एक दीवार से कहता कि मिरे साथ चलो