aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ghaas"
गर तो है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी हैऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी हैक्या शक्कर मिस्री क़ंद गरी क्या सांभर मीठा खारी हैक्या दाख मुनक़्का सोंठ मिरच क्या केसर लौंग सुपारी हैसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
जब ठहर कर इधर उधर देखापास इक गाय को खड़े पाया
घास भी मुझ जैसी हैपाँव-तले बिछ कर ही ज़िंदगी की मुराद पाती हैमगर ये भीग कर किस बात गवाही बनती हैशर्मसारी की आँच कीकि जज़्बे की हिद्दत कीघास भी मुझ जैसी हैज़रा सर उठाने के क़ाबिल होतो काटने वाली मशीनउसे मख़मल बनाने का सौदा लिएहमवार करती रहती हैऔरत को भी हमवार करने के लिएतुम कैसे कैसे जतन करते होन ज़मीं की नुमू की ख़्वाहिश मरती हैन औरत कीमेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त थाजो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकेंवो पैवंद-ए-ज़मीं हो करयूँही ज़ोर-आवरों के लिए रास्ता बनाते हैंमगर वो पर-ए-काह हैंघास नहींघास तो मुझ जैसी है!
घास पर खेलता है इक बच्चापास माँ बैठी मुस्कुराती हैमुझ को हैरत है जाने क्यूँ दुनियाकाबा ओ सोमनात जाती है
छुटपुटे के ग़ुर्फ़े मेंलम्हे अब भी मिलते हैंसुब्ह के धुँदलके मेंफूल अब भी खिलते हैंअब भी कोहसारों परसर-कशीदा हरियालीपत्थरों की दीवारेंतोड़ कर निकलती हैअब भी आब-ज़ारों परकश्तियों की सूरत मेंज़ीस्त की तवानाईज़ाविए बदलती हैअब भी घास के मैदाँशबनमी सितारों सेमेरे ख़ाक-दाँ पर भीआसमाँ सजाते हैंअब भी खेत गंदुम केतेज़ धूप में तप करइस ग़रीब धरती कोज़र-फ़िशाँ बनाते हैंसाए अब भी चलते हैंसूरज अब भी ढलता हैसुब्हें अब भी रौशन हैंरातें अब भी काली हैंज़ेहन अब भी चटयल हैंरूहें अब भी बंजर हैंजिस्म अब भी नंगे हैंहाथ अब भी ख़ाली हैंअब भी सब्ज़ फ़सलों मेंज़िंदगी के रखवालेज़र्द ज़र्द चेहरों परख़ाक ओढ़े रहते हैंअब भी उन की तक़दीरेंमुंक़लिब नहीं होतींमुंक़लिब नहीं होंगीकहने वाले कहते हैंगर्दिशों की रानाईआम ही नहीं होतीअपने रोज़-ए-अव्वल कीशाम ही नहीं होती
गर्मी की तपिश बुझाने वालीसर्दी का पयाम लाने वालीक़ुदरत के अजाइबात की काँआरिफ़ के लिए किताब-ए-इरफ़ाँवो शाख़-ओ-दरख़्त की जवानीवो मोर-ओ-मलख़ की ज़िंदगानीवो सारे बरस की जान बरसातवो कौन-ए-ख़ुदा की शान बरसातआई है बहुत दुआओं के बा'दवो सैकड़ों इल्तिजाओं के बा'दवो आई तो आई जान में जाँसब थे कोई दिन के वर्ना मेहमाँगर्मी से तड़प रहे थे जान-दारऔर धूप में तप रहे थे कोहसारभूबल से सिवा था रेग-ए-सहराऔर खौल रहा था आब-ए-दरियासांडे थे बिलों में मुँह छुपाएऔर हाँप रहे थे चारपाएथीं लोमड़ियाँ ज़बाँ निकालेऔर लू से हिरन हुए थे कालेचीतों को न थी शिकार की सुधहिरनों को न थी क़तार की सुधथे शेर पड़े कछार में सुस्तघड़ियाल थे रूद-बार में सुस्तढोरों का हुआ था हाल पतलाबैलों ने दिया था डाल कंधाभैंसों के लहू न था बदन मेंऔर दूध न था गऊ के थन मेंघोड़ों का छुटा था घास दानाथा प्यास का उन पे ताज़ियानागर्मी का लगा हुआ था भबकाऔर अंस निकल रहा था सब कातूफ़ान थे आँधियों के बरपाउठता था बगूले पर बगूलाआरे थे बदन पे लू के चलतेशो'ले थे ज़मीन से निकलतेथी आग का दे रही हवा कामथा आग का नाम मुफ़्त बद-नामरस्तों में सवार और पैदलसब धूप के हाथ से थे बेकलघोड़ों के न आगे उठते थे पाँवमिलती थी कहीं जो रूख की छाँवथी सब की निगाह सू-ए-अफ़्लाकपानी की जगह बरसती थी ख़ाक
रब का शुक्र अदा कर भाईजिस ने हमारी गाय बनाईउस मालिक को क्यूँ न पुकारेंजिस ने पिलाईं दूध की धारेंख़ाक को उस ने सब्ज़ा बनायासब्ज़े को फिर गाय ने खायाकल जो घास चरी थी बन मेंदूध बनी अब गाय के थन मेंसुब्हान-अल्लाह दूध है कैसाताज़ा गर्म सफ़ेद और मीठादूध में भीगी रोटी मेरीउस के करम ने बख़्शी सेरीदूध दही और मीठा मस्कादे न ख़ुदा तो किस के बस कागाय को दी क्या अच्छी सूरतख़ूबी की है गोया मूरतदाना दुन्का भूसी चोकरखा लेती है सब ख़ुश हो करखा कर तिनके और ठेठरेदूध है देती शाम सवेरेक्या ही ग़रीब और कैसी प्यारीसुब्ह हुई जंगल को सिधारीसब्ज़े से मैदान हरा हैझील में पानी साफ़ भरा हैपानी मौजें मार रहा हैचरवाहा चुम्कार रहा हैपानी पी कर चारा चर करशाम को आई अपने घर परदूरी में जो दिन है काटाबच्चे को किस प्यार से चाटागाय हमारे हक़ में है ने'मतदूध है देती खा के बनस्पतबछड़े उस के बैल बनाएजो खेती के काम में आएरब की हम्द-ओ-सना कर भाईजिस ने ऐसी गाय बनाई
चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटकाघास शबनम में शराबोर है शब है आधीबाम सूना है, कहाँ ढूँडें किसी का चेहरा(लोग समझेंगे कि बे-रब्त हैं बातें अपनी)शेर उगते हैं दुखी ज़ेहन से कोंपल कोंपलकौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलेंदूर पहुँचे हैं सरकते हुए ऊदे बादलचाँद तन्हा है (अगर उस की बलाएँ ले लें?)दोस्तो जी का अजब हाल है, लेना बढ़नाचाँदनी रात है कातिक का महीना होगामीर-ए-मग़्फ़ूर के अशआर न पैहम पढ़नाजीने वालों को अभी और भी जीना होगाचाँद ठिठका है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर कब सेकौन सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगोधुँद उड़ने लगी बुनने लगी क्या क्या चेहरेअच्छी लगती हैं दिवानों की सी बातें लोगोभीगती रात में दुबका हुआ झींगर बोलाकसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुश्बू लपकीकोई काकुल कोई दामन, कोई आँचल होगाएक दुनिया थी मगर हम से समेटी न गई
गोलियों से ये जवाँ आग न बुझ पाएगीगैस फेंकोगे तो कुछ और भी लहराएगी
हुक्मराँ भी हैं, महल भी हैं, फ़सलें भी हैंजेल-ख़ाने भी हैं और गैस के चेम्बर भी हैंहीरोशीमा पे किताबें भी सजा रक्खी हैंबेड़ियाँ आहनी हथकड़ियाँ भी स्टील की हैंऔर ग़ुलामों को भी आज़ादी है, बाँधा नहीं जाता
मैं उड़ते हुए पंछियों को डराता हुआकुचलता हुआ, घास की कलग़ियाँगिराता हुआ गर्दनें इन दरख़्तों की, छुपता हुआजिन के पीछे सेनिकला चला जा रहा था वो सूरजतआक़ुब में था उस के मैं!गिरफ़्तार करने गया था उसेजो ले के मिरी उम्र का एक दिन भागता जा रहा था!
वो देखो उठी काली काली घटाहै चारों तरफ़ छाने वाली घटाघटा के जो आने की आहट हुईहवा में भी इक सनसनाहट हुईघटा आन कर मेंह जो बरसा गईतो बे-जान मिट्टी में जान आ गईज़मीं सब्ज़े से लहलहाने लगीकिसानों की मेहनत ठिकाने लगीजड़ी-बूटियाँ पेड़ आए निकलअजब बेल पत्ते अजब फूल फलहर इक पेड़ का यक नया ढंग हैहर इक फूल का इक नया रंग हैये दो दिन में क्या माजरा हो गयाकि जंगल का जंगल हरा हो गयाजहाँ कल था मैदान चटयल पड़ावहाँ आज है घास का बन पड़ाहज़ारों फुदकने लगे जानवरनिकल आए गोया कि मिट्टी के पर
ऐ शांति अहिंसा की उड़ती हुई परीआ तू भी आ कि आ गई छब्बीस जनवरी
फूल हैं, घास है, अश्जार हैं, दीवारें हैंऔर कुछ साए कि हैं मुख़्तसर ओ तीरा-ओ-तार,तुझ को क्या इस से ग़रज़ है कि ख़ुदा है कि नहीं?देख पत्तों में लरज़ती हुई किरनों का नफ़ूज़सरसराती हुई बढ़ती है रगों में जैसेअव्वलीं बादा-गुसारी में नई तुंद शराबतुझ को क्या इस से ग़रज़ है कि ख़ुदा है कि नहींकहकशाँ अपनी तमन्नाओं का है राह-गुज़ारकाश इस राह पे मिल कर कभी पर्वाज़ करेंइक नई ज़ीस्त का दर बाज़ करें!आसमाँ दूर है लेकिन ये ज़मीं है नज़दीकआ इसी ख़ाक को हम जल्वा-गह-ए-राज़ करें!रूहें मिल सकती नहीं हैं तो ये लब ही मिल जाएँ,आ इसी लज़्ज़त-ए-जावेद का आग़ाज़ करें!सुब्ह जब बाग़ में रस लेने को ज़ंबूर आएउस के बोसे से हों मदहोश समन और गुलाबशबनमी घास पे दो पैकर-ए-यख़-बस्ता मिलें,और ख़ुदा है तो पशेमाँ हो जाए!
मिला था पोस्ट पे कस्टम का इक बड़ा अफ़सरज़रा सी घास जो डाली तो दम हिलाने लगा
मस्त घटा मंडलाई हुई हैबाग़ पे मस्ती छाई हुई हैझूम रही हैं आम की शाख़ेंनींद सी जैसे आई हुई हैबोलता है रह रह के पपीहाबर्क़ सी इक लहराई हुई हैलहके हुए हैं फूल शफ़क़ केआतिश-ए-तर छलकाई हुई हैशेर मिरे बन बन के हुवैदाक़ौस की हर अंगड़ाई हुई हैरेंगते हैं ख़ामोश तरानेमौज-ए-हवा बल खाई हुई हैरौनक़-ए-आलम सर है झुकाएजैसे दुल्हन शर्माई हुई हैघास पे गुम-सुम बैठा है 'कैफ़ी'याद किसी की आई हुई है
इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोएदूजा ज़ुल्फ़ों की छाँव में सुख की सेज पे सोएराज-सिंघासन पर इक बैठा और इक उस का दासभए कबीर उदासऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुक्म चलाएँक़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएँधरती पर भगवान बने हैं धन है जिन के पासभए कबीर उदासगीत लिखाएँ पैसे ना दें फ़िल्म नगर के लोगउन के घर बाजे शहनाई लेखक के घर सोगगाएक सुर में क्यूँ कर गाए क्यूँ ना काटे घासभए कबीर उदासकल तक था जो हाल हमारा हाल वही है आज'जालिब' अपने देस में सुख का काल वही है आजफिर भी मोची-गेट पे लीडर रोज़ करें बकवासभए कबीर उदास
घास से बच के चलो रेत को गुलज़ार कहोनर्म कलियों पे चढ़ा दो ग़म-ए-दौराँ के ग़िलाफ़ख़ुद को दिल थाम के मुर्ग़ान-ए-गिरफ़्तार कहोरात को उस के तबस्सुम से लिपट कर सो जाओसुब्ह उट्ठो तो उसे शाहिद-ए-बाज़ार कहोज़ेहन क्या चीज़ है जज़्बे की हक़ीक़त क्या हैफ़र्श पर बैठ के तब्लीग़ के अशआ'र कहो
शेर जंगल में है उदास बहुतजानवर कम हैं और घास बहुतसोचता है कि क्या करें अब हमकर लिया ग़ौर और क़यास बहुतमा-बदौलत का हो गया पड़ाथी कभी अपनी धोंस-धाँस बहुतसब रेआ'या चली गई ज़ू मेंनौकरी आई सब को रास बहुतसब के जंगल को छोड़ जाने सेहो गया है हमारा लॉस बहुतखाने पीने के पड़ गए लालेचाहिए फैमली को मास बहुतबच्चे उधम मचाए रखते हैंइन को लगती है भूक प्यास बहुतशेरनी ने भी रोज़ लड़ लड़ करकर दिया है हमारा नास बहुतवो समझती है आज भी हैगामाल-ओ-दौलत हमारे पास बहुतरोज़ मेक-अप का चाहिए सामाँऔर दरकार हैं लिबास बहुतउस से शिकवे शिकायतें सुन करता'ने देती है हम को सास बहुतजी में आता है ख़ुद-कुशी कर लेंज़िंदगानी से हैं निरास बहुतपर कभी सोचते हैं शहर चलेंसूँघ ली जंगलों की बास बहुतजा के सर्कस में नौकरी कर लेंगर मिलें तो हैं सौ पचास बहुत
भागना रंगों के पीछे घास के मैदान मेंतितलियों के शौक़ में वो मार खाना याद है
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