aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gholte"
ओ देस से आने वाले बताक्या आम के ऊँचे पेड़ों परअब भी वो पपीहे बोलते हैंशाख़ों के हरीरी पर्दों मेंनग़्मों के ख़ज़ाने घोलते हैंसावन के रसीले गीतों सेतालाब में अमरस घोलते हैंओ देस से आने वाले बता
इक उम्र के बाद तुम मिले होऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओहर हिज्र का दिन था हश्र का दिनदोज़ख़ थे फ़िराक़ के अलावरोऊँ कि हँसूँ समझ न आएहाथों में हैं फूल दिल में घावतुम आए तो साथ ही तुम्हारेबिछड़े हुए यार याद आएइक ज़ख़्म पे तुम ने हाथ रक्खाऔर मुझ को हज़ार याद आएवो सारे रफ़ीक़ पा-ब-जौलाँसब कुश्ता-ए-दार याद आएहम सब का है एक ही क़बीलाइक दश्त के सारे हम-सफ़र हैंकुछ वो हैं जो दूसरों की ख़ातिरआशुफ़्ता-नसीब ओ दर-ब-दर हैंकुछ वो हैं जो ख़िलअत-ओ-क़बा सेऐवान-ए-शही में मो'तबर हैंसुक़रात ओ मसीह के फ़सानेतुम भी तो बहुत सुना रहे थेमंसूर ओ हुसैन से अक़ीदततुम भी तो बहुत जता रहे थेकहते थे सदाक़तें अमर हैंऔरों को यही बता रहे थेऔर अब जो हैं जा-ब-जा सलीबेंतुम बाँसुरियाँ बजा रहे होऔर अब जो है कर्बला का नक़्शातुम मदह-ए-यज़ीद गा रहे होजब सच तह-ए-तेग़ हो रहा हैतुम सच से नज़र चुरा रहे होजी चाहता है कि तुम से पूछूँक्या राज़ इस इज्तिनाब में हैतुम इतने कठोर तो नहीं थेये बे-हिसी किसी हिसाब में हैतुम चुप हो तो किस तरह से चुप होजब ख़ल्क़-ए-ख़ुदा अज़ाब में हैसोचो तो तुम्हें मिला भी क्या हैइक लुक़्मा-ए-तर क़लम की क़ीमतग़ैरत को फ़रोख़्त करने वालोइक कासा-ए-ज़र क़लम की क़ीमतपिंदार के ताजिरो बताओदरबान का दर क़लम की क़ीमतनादाँ तो नहीं हो तुम कि समझूँग़फ़लत से ये ज़हर घोलते होथामे हुए मस्लहत की मीज़ानहर शेर का वज़्न तौलते होऐसे में सुकूत, चश्म-पोशीऐसा है कि झूट बोलते होइक उम्र से अदल ओ सिद्क़ की लाशग़ासिब की सलीब पर जड़ी हैइस वक़्त भी तुम ग़ज़ल-सरा होजब ज़ुल्म की हर घड़ी कड़ी हैजंगल पे लपक रहे हैं शोलेताऊस को रक़्स की पड़ी हैहै सब को अज़ीज़ कू-ए-जानाँइस राह में सब जिए मरे हैंहाँ मेरी बयाज़-ए-शेर में भीबर्बादी-ए-दिल के मरसिए हैंमैं ने भी किया है टूट कर इश्क़और एक नहीं कई किए हैंलेकिन ग़म-ए-आशिक़ी नहीं हैऐसा जो सुबुक-सरी सिखाएये ग़म तो वो ख़ुश-मआल ग़म हैजो कोह से जू-ए-शीर लाएतेशे का हुनर क़लम को बख़्शेजो क़ैस को कोहकन बनाएऐ हीला-गरान-ए-शहर-ए-शीरींआया हूँ पहाड़ काट कर मैंहै बे-वतनी गवाह मेरीहर-चंद फिरा हूँ दर-ब-दर मैंबेचा न ग़ुरूर-ए-नय-नवाज़ीऐसा भी न था सुबुक हुनर मेंतुम भी कभी हम-नवा थे मेरेफिर आज तुम्हें ये क्या हुआ हैमिट्टी के वक़ार को न बेचोये अहद-ए-सितम जिहाद का हैदरयूज़ा-गरी के मक़बरों सेज़िंदाँ की फ़सील ख़ुशनुमा हैकब एक ही रुत रही हमेशाये ज़ुल्म की फ़स्ल भी कटेगीजब हर्फ़ कहेगा क़ुम-बे-इज़्नीमरती हुई ख़ाक जी उठेगीलैला-ए-वतन के पैरहन मेंबारूद की बू नहीं रहेगीफिर बाँधेंगे अबरुओं के दोहेफिर मद्ह-ए-रुख़-ओ-दहन कहेंगेठहराएँगे उन लबों को मतलाजानाँ के लिए सुख़न कहेंगेअफ़्साना-ए-यार ओ क़िस्सा-ए-दिलफिर अंजुमन अंजुमन कहेंगे
उम्र उस बूढ़े पनवाड़ी की पान लगाते गुज़रीचूना घोलते छालियाँ काटते कथ पिघलाते गुज़रीसिगरेट की ख़ाली डिबियों के महल सजाते गुज़रीकितने शराबी मुश्वरियों से नैन मिलाते गुज़रीचंद कसीली पत्तों की गुत्थी सुलझाते गुज़री
ये साठ सदी का क़िस्सा हैकुछ और नहीं हैमेरे अंदर साठ सदी की गूँज बसी हैमैं और तुम इस गूँज में ज्ञान किनारेआ कर बैठ गए थेतारीख़ ने जब इस धरती पर बिसराम कियाजब क़िस्सा-गो की लोरी में हम सोते थेऔर चिड़ियों की चहकार में आँखें खोलते थेमौसम के मिज़ाज में रची हुई बातों मेंअमृत घोलते थेयहीं कहीं पर हम तुम'मीर' और 'मीरा' के दुख दिल में एल्बम करते थेवो दुख तंदूर की रोटी में पक जाते थेमेरी और तुम्हारी माँवो रोटी अपने दिल के तंदूर से लाती थीफिर भूक हमारी पहले से बढ़ जाती थीमैं और तुम तारीख़ के बीज से फूटेंगेऔर 'गौतम-बुध' के जंगल जैसी उम्र में ढल जाएँगे
चलते चलते दफ़अ'तन पटरी बदलने का चलनथा सियासत के क़लाबाज़ों का यक मशहूर फ़नफ़ाएदा होता था वक़्ती तौर पर इस खेल मेंगो सका हज़रात कहते थे उसे बाज़ार-पनअहल-ए-शे'रिस्तान ने भी अब उसे अपना लियाकार-आमद देख कर ये नुस्ख़ा-ए-आहन-शिकनहो रहा है इस क़दर मक़्बूल ये नुस्ख़ा कि अबदिल बदलते रहते हैं दिन रात अर्बाब-ए-सुख़ननित नया बहरूप लाज़िम है पए इज़हार-ए-ज़ातजब नज़र के सामने हो फ़न बराए मक्र-ओ-फ़नवो ज़माना जब कि बज़्म-ए-शेर थी इक रज़्म-गाहछोड़ दी थी हर नए शाइ'र ने रफ़्तार-ए-कुहनघोलते रहते थे वो हज़रात जाम-ए-शेर मेंनग़्मा-ए-बुलबुल के बदले शोरिश-ए-दार-ओ-रसनहोटलों में बैठ कर होता था ज़िक्र-ए-इंक़लाबअपने सर से बाँधे फिरते थे तख़य्युल में कफ़नइन में कुछ लीडर सिफ़त थे और कुछ वालंटियरझुण्ड में सुरख़ाब के हों जिस तरह ज़ाग़-ओ-ज़ग़नना'रा बाज़ी में अगर होते थे लीडर पाव सेरइन के हर वालंटियर का वज़्न होता डेढ़ मनरफ़्ता रफ़्ता शोर-ए-ग़ौग़ाई सुख़न का जब थमालग गया जब माह-ए-नख़शब में हवादिस का गहनआ गए कुछ और कर्तब-बाज़ बज़्म-ए-शेर मेंइक ज़रा सा जानते थे जो नज़र-बंदी का फ़नसूँघ कर मौसम की बू और रुख़ हवा का देख करकेचुली बदली हर इक वालंटियर ने दफ़अ'तनसुबह दम देखा तो टेड्डी सूट में मल्बूस हैंफेंक कर चुपके से अपना इंक़िलाबी पैरहनसर के बालों की सफ़ेदी हो गई ग़र्क़-ए-ख़िज़ाबतह-ब-तह ग़ाज़ा लगा कर दूर की रुख़ की शिकनशाइ'री की उम्र थी गो बीस या पच्चीस साललेकिन अपने फ़न में वो बिल-क़स्द लाए बाल-पनकर दिया बहर-ए-सदारत पेश अपने आप कोजब बनाई चंद नौ-मश्क़ों ने कोई अंजुमनइस लिए घुसपैठ करते ये सब वालंटियरबन गए अब ख़ाम ज़ेहनों के इमाम-ए-फ़िक्र-ओ-फ़नइन का मक़्सद है अगर कुछ तो हुसूल-ए-मंफ़अतइंक़िलाबी शाइ'री हो या मुअम्माती सुख़न
सुनने वालों को धड़कती हुई तन्हाई मेंकौन दर आता है चुपके से तमन्ना बन करकिस की आवाज़ हवाओं की सुबुक लहरों पररक़्स करती नज़र आती है तमाशा बन करकौन लफ़्ज़ों को अता करता है तस्वीर का हुस्नकौन दिल में उतर आता है मसीहा बन करकिस की धड़कन में है किरदारों के दिल की धड़कनकौन उभर आता है महताब का हाला बन करकितने ज़ेहनों के उफ़ुक़ कितने दिलों के अफ़्लाकतीरगी में भी फ़रोज़ाँ हैं उजाला बन करकितने अन-जानों की तस्कीन-ए-समाअत के लिएअपनी आवाज़ के जादू से ये रस घोलते हैंसरसराते हुए लम्हों की सुबुक-रफ़्तारीकह रही है कि ये तूफ़ानों में पर तौलते हैंकोई भी रूप हो बहरूप बदल कर ये लोगपेच-दर-पेच फ़सानों की गिरह खोलते हैंवो शहनशह हो कि दरयूज़ा-गर-ए-राह-ए-हयातअपने किरदार के औसाफ़ लिए
इस बदन के मलबे के अंदरइक दिल की उजड़ी तख़्ती हैजिस में सन्नाटे बोलते हैंयादों के दर जो खोलते हैंकुछ ख़्वाबों के ज़र्रे हैं जोइस लहू में ख़लियों की सूरतजब रक़्स करें तो बोलते हैंकुछ बिखरे आस के टुकड़े हैंजो मन में ख़ुशबू घोलते हैंइक कर्ब ही मेरे अंदर हैइक दुख ही मिरा मुक़द्दर हैइन ख़्वाबों के जो लाशे हैंवो मन मलबे में चीख़ते हैंऔर इस मलबे के ढेर पे मैंअब अपने आप को ढूँढती हूँयादों को अब तक पूजती हूँतुम पूछते हो नाँ कौन हूँ मैंअब क्या बतलाऊँ कौन हूँ मैं
कितने अलबेले शोख़ कनहैयाइस बरगद के साए मेंअपनी नय सेमद-भरी आवाज़ का जादू घोलते थेबिरहा-राग को छेड़ के अक्सरफ़र्त-ए-ग़म सेअश्क के मोती रोलते थे
अजब शय है किराए का मकाँ भीमकाँ भी है ये ज़ालिम ला-मकाँ भीबड़ी उजलत में बनवाया गया हैलई से छत को चिपकाया गया हैहै वाक़े' एक नाली के किनारेमयस्सर हैं मुझे क्या क्या नज़ारेनज़ीर उन की जहान-ए-ख़्वाब में हैबहाराँ की शब-ए-महताब में हैन क्यों हो जिस्म मेरा रंज से चूरफ़क़त दो मील है ये शहर से दूरयहाँ आब-ओ-हवा का मस्ख़ चेहरामिला हरगिज़ न मौक़ा देखने काहम आपस में बहुत घुल-मिल गए हैंमुझे जेबों में चमगादड़ मिले हैंहैं बाम-ओ-दर पे ये ग़ारत-गर-ए-होशबहार-ए-बिस्तर-ओ-नौ-रोज़-ए-आग़ोशहमारी अब ये हालत हो गई हैअँधेरों से मोहब्बत हो गई हैयहाँ दिन को भी उल्लू बोलते हैंमिरे कानों में अमरस घोलते हैंजो दुनिया में हैं ये कीड़े-मकोड़ेयहीं पल कर जवाँ होते हैं सारेग़ुबार-आलूद यूँ मेरी जबीं हैकहीं सीढ़ी कहीं कुछ भी नहीं हैइसी सीढ़ी का है वो वाक़िआ' भीलुढ़क कर मर गई जो सास मेरीयहाँ चूहों के बिल इतने बड़े हैंकई साबित क़दम इन में गिरे हैंमुझे भी दूर की इक रोज़ सूझीकिसी बिल को मैं खोदूँ जी में आईजो खोदा चश्म-ए-हैराँ ने ये देखाकि इक लीडर नुमा मोटा सा चूहादबाए मुँह में इक ख़ासा बताशामिरे मोज़े पहन कर जा रहा थावहीं इक चूहिया आ निकली कहीं सेटपकता नाज़ था उस की जबीं सेबसा था इत्र में हर रेशा उस कापरे था अर्श से अंदेशा उस काबहुत बन-ठन के निकली थी बिचारीमियाँ चूहे ने फ़ौरन आँख मारीनिगाह-ए-ग़ैर से शर्मा गई वोमियाँ चूहे से फिर टकरा गई वोमिले यूँ तालिब-ओ-मतलूब बाहममजाज़ी इश्क़ का लहराया परचमग़रज़ चूहे क़यामत ढा रहे हैंदर-ओ-दीवार पर मंडला रहे हैंमैं लाया था कहीं से एक बिल्लीपकड़ कर ले गए चूहे उसे भी
पड़ोसी उन के हैं मुँह-ज़ोर भाईइधर वो और उधर सारी ख़ुदाईख़ुदा लगती कभी कहते नहीं हैंवो घुल-मिल कर कभी रहते नहीं हैंसभी हमसाए उन के बोलते हैंमरासिम में वो तल्ख़ी घोलते हैंहमेशा पीछे वो पैसे के भागेज़बाँ तेज़ी में है नश्तर से आगेकलेजे पर चला कर तीर छोड़ेंसभी को कर के वो दिल-गीर छोड़ेंज़बाँ कब वो शकर-आमेज़ करतेवो इस मीठे से भी परहेज़ करतेबचाए हर शनासा अपना दामनकि है बेज़ार वीराने से गुलशन
अजब रात है हद्द-ए-निगाह तक हर-सूअथाह ज़हर भरी चाँदनी की झील सी हैवरा-ए-मद्द-ए-नज़र कोहर है तख़य्युल कीवरा-ए-हद्द-ए-तख़य्युल सियह फ़सील सी हैसमाँ है हू का सड़क है सड़क के दोनो तरफ़क़तार ता-बा-उफ़ुक़ है घने दरख़्तों कीहवा सनकती है तो चौंक चौंक पड़ती हैंहर एक पेड़ में रूहें सी तीरा-बख़्तों कीकुछ ऐसे घूर के बस घोलते हैं सन्नाटेहवा के ज़ोर से जब टहनियाँ उलझती हैंधुएँ से रेंगते हैं तह-ब-तह ख़यालों मेंसुकूत चीख़ता है सीटियाँ सी बजती हैंनज़र उठाता हूँ तो ज़ाविए निगाहों मेंउठा के धूल सराबों की झोंक देते हैंक़दम बढ़ाता हूँ तो अज़दहे हयूलों केफनों के तीर कफ़-ए-पा में ठोंक देते हैंजो साँस लेता हूँ तो साँस साँस की लौ परतफ़क्कुरात की आँधी सी चलने लगती हैजो सोचता हूँ तो एहसास के महलकों तकसियाहियों की ग़लाज़त उछलने लगती हैदिल-ओ-निगाह पे कितनी मुहीब तेज़ी सेकुछ उलझनों के सियह-नाग रेंग आए हैंक़दम क़दम पे है कितनी अमीक़-ए-फ़िक्र की लौक़दम क़दम पे मिरी रह में कितने साए हैं
चाशनी है ज़बान में जिन कीपासबाँ ये अमीर ख़ुसरौ के'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के राज़दान-ए-सुख़नवारिसान-ए-ज़बान-ए-उर्दू हैंघोलते हैं मिठास बातों सेअपना लहजा हसीन रखते हैंएक तहज़ीब है सक़ाफ़त हैइस के खानों की अपनी लज़्ज़त हैऔर फिर हुस्न की तमाज़त हैदेखने वाले देखते हैं कहींइस के साहिल पे रौनक़-ए-दुनियाखेलती हँसती ग़ुल मचाती हुईमन-चले हँसते मुस्कुराते हुएज़िंदगी की ग़ज़ल सुनाते हुएरौनक़ों के असीर रहते हैंजिस को कहते थे लोग कोलाचीअब वो साहिल किनारे बस्ता शहरजाना जाता है शहर-ए-क़ाइद सेलोग जिस को कराची कहते हैं
इंकिशाफ़ईजादअफ़्कार-ओ-उलूमचहचहाते नाचतेबुलबुल-ओ-ताऊसरस कानों मेंनूर आँखों मेंभरते घोलतेज़ह्न को आँखों कोदस्त-ओ-पा को अपनेखोलतेगोद में मादर-ए-फ़ितरत कीवो मासूम तिफ़्लकुनमुनातामुस्कुराताखेलताजिस की इक मासूमदुज़्दीदा नज़रज़िंदगी कोदिलकशी सेहुस्न सेभर देती हैढूँड लाते हैंअँधेरी रात मेंरौशनीइस गुनाह-ए-अव्वलीं कीनित नईमंसूबा-दारसनअत-ओ-हिरफ़तफ़न्न-ए-ता'मीरतस्ख़ीर-ए-जिहात
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों सेपीप बहती हुई गलते हुए नासूरों सेलौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजेअब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी केजब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी केक्या साज़ जड़ाओ ज़र-ज़ेवर क्या गोटे थान कनारी केक्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के क्या हाथी लाल अमारी केसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
खड़ी धूप में अपने घर से निकलनावो चिड़ियाँ वो बुलबुल वो तितली पकड़नावो गुड़ियों की शादी पे लड़ना झगड़नावो झूलों से गिरना वो गिरते सँभलनावो पीतल के छाँव के प्यारे से तोहफ़ेवो टूटी हुई चूड़ियों की निशानीवो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराबकितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाबनब्ज़ बुझती भी भड़कती भी हैदिल का मामूल है घबराना भीरात अंधेरे ने अंधेरे से कहाएक आदत है जिए जाना भीक़ौस इक रंग की होती है तुलूएक ही चाल भी पैमाने कीगोशे गोशे में खड़ी है मस्जिदशक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने कीकोई कहता था समुंदर हूँ मैंऔर मिरी जेब में क़तरा भी नहींख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँअब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहींअपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरहचंद रेखाओं में सीमाओं मेंज़िंदगी क़ैद है सीता की तरहराम कब लौटेंगे मालूम नहींकाश रावण ही कोई आ जाता
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