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नज़्म
रबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रा
सबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़
अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाक
इश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किराम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लबीब हर नवा-ऐ-साज़-गार की नफ़ी सही!)
मगर हमारा राब्ता विसाल-ए-आब-ओ-गिल नहीं, न था कभी
नून मीम राशिद
नज़्म
मेरे जाम ओ मीना ओ गुल-दाँ के रेज़े मिले हैं
कि जैसे वो इस शहर-ए-बर्बाद का हाफ़िज़ा हों
नून मीम राशिद
नज़्म
तो ज़र-निगार पल्लुवों से झाँकती कलाइयों की तेज़ नब्ज़ रुक गई
वो बोलर एक मह-वशों के जमघटों में घिर गया
मजीद अमजद
नज़्म
वो आरज़ू है कौन सी जो आज पा-ब-गिल नहीं
है नाम दिल का दिल मगर जो सच कहूँ तो दिल नहीं
अर्श मलसियानी
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
चुने रिफ़ाह के गुल हुस्न-ए-इंतिख़ाब के साथ
शबाब क़ौम का चमका तिरे शबाब के साथ