aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "goshe"
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराबकितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाबनब्ज़ बुझती भी भड़कती भी हैदिल का मामूल है घबराना भीरात अंधेरे ने अंधेरे से कहाएक आदत है जिए जाना भीक़ौस इक रंग की होती है तुलूएक ही चाल भी पैमाने कीगोशे गोशे में खड़ी है मस्जिदशक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने कीकोई कहता था समुंदर हूँ मैंऔर मिरी जेब में क़तरा भी नहींख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँअब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहींअपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरहचंद रेखाओं में सीमाओं मेंज़िंदगी क़ैद है सीता की तरहराम कब लौटेंगे मालूम नहींकाश रावण ही कोई आ जाता
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँये मेरा चमन है मेरा चमन मैं अपने चमन का बुलबुल हूँहर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन इक साग़र-ए-नौ में ढलती हैकलियों से हुस्न टपकता है फूलों से जवानी उबलती हैजो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शम्अ यहाँ भी जलती हैइस दश्त के गोशे गोशे से इक जू-ए-हयात उबलती हैइस्लाम के इस बुत-ख़ाने में असनाम भी हैं और आज़र भीतहज़ीब के इस मय-ख़ाने में शमशीर भी है और साग़र भीयाँ हुस्न की बर्क़ चमकती है याँ नूर की बारिश होती हैहर आह यहाँ इक नग़्मा है हर अश्क यहाँ इक मोती हैहर शाम है शाम-ए-मिस्र यहाँ हर शब है शब-ए-शीराज़ यहाँहै सारे जहाँ का सोज़ यहाँ और सारे जहाँ का साज़ यहाँये दश्त-ए-जुनूँ दीवानों का ये बज़्म-ए-वफ़ा परवानों कीये शहर-ए-तरब रूमानों का ये ख़ुल्द-ए-बरीं अरमानों कीफ़ितरत ने सिखाई है हम को उफ़्ताद यहाँ पर्वाज़ यहाँगाए हैं वफ़ा के गीत यहाँ छेड़ा है जुनूँ का साज़ यहाँइस फ़र्श से हम ने उड़ उड़ कर अफ़्लाक के तारे तोड़े हैंनाहीद से की है सरगोशी परवीन से रिश्ते जोड़े हैंइस बज़्म में तेग़ें खींची हैं इस बज़्म में साग़र तोड़े हैंइस बज़्म में आँख बिछाई है इस बज़्म में दिल तक जोड़े हैंइस बज़्म में नेज़े फेंके हैं इस बज़्म में ख़ंजर चूमे हैंइस बज़्म में गिर कर तड़पे हैं इस बज़्म में पी कर झूमे हैंआ आ के हज़ारों बार यहाँ ख़ुद आग भी हम ने लगाई हैफिर सारे जहाँ ने देखा है ये आग हमीं ने बुझाई हैयाँ हम ने कमंदें डाली हैं याँ हम ने शब-ख़ूँ मारे हैंयाँ हम ने क़बाएँ नोची हैं याँ हम ने ताज उतारे हैंहर आह है ख़ुद तासीर यहाँ हर ख़्वाब है ख़ुद ताबीर यहाँतदबीर के पा-ए-संगीं पर झुक जाती है तक़दीर यहाँज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँइस गुल-कदा-ए-पारीना में फिर आग भड़कने वाली हैफिर अब्र गरजने वाले हैं फिर बर्क़ कड़कने वाली हैजो अब्र यहाँ से उट्ठेगा वो सारे जहाँ पर बरसेगाहर जू-ए-रवाँ पर बरसेगा हर कोह-ए-गिराँ पर बरसेगाहर सर्व-ओ-समन पर बरसेगा हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगाख़ुद अपने चमन पर बरसेगा ग़ैरों के चमन पर बरसेगाहर शहर-ए-तरब पर गरजेगा हर क़स्र-ए-तरब पर कड़केगाये अब्र हमेशा बरसा है ये अब्र हमेशा बरसेगा
आई जब उन की याद तो आती चली गईहर नक़्श-ए-मा-सिवा को मिटाती चली गईहर मंज़र-ए-जमाल दिखाती चली गईजैसे उन्हीं को सामने लाती चली गईहर वाक़िआ क़रीब-तर आता चला गयाहर शय हसीन-तर नज़र आती चली गईवीराना-ए-हयात के एक एक गोशे मेंजोगन कोई सितार बजाती चली गईदिल फुंक रहा था आतिश-ए-ज़ब्त-ए-फ़िराक़ सेदीपक को मय-गुसार बनाती चली गईबे-हर्फ़ ओ बे-हिकायत ओ बे-साज़ ओ बे-सदारग रग में नग़्मा बन के समाती चली गईजितना ही कुछ सुकून सा आता चला गयाउतना ही बे-क़रार बनाती चली गईकैफ़िय्यतों को होश सा आता चला गयाबे-कैफ़ियों को नींद सी आती चली गईक्या क्या न हुस्न-ए-यार से शिकवे थे इश्क़ कोक्या क्या न शर्मसार बनाती चली गईतफ़रीक़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का झगड़ा नहीं रहातमईज़-ए-क़ुर्ब-ओ-बोद मिटाती चली गईमैं तिश्ना-काम-ए-शौक़ था पीता चला गयावो मस्त अँखड़ियों से पिलाती चली गईइक हुस्न-ए-बे-जिहत की फ़ज़ा-ए-बसीत मेंउड़ती गई मुझे भी उड़ाती चली गईफिर मैं हूँ और इश्क़ की बेताबियाँ 'जिगर'अच्छा हुआ वो नींद की माती चली गई
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
रौशन कहीं बहार के इम्काँ हुए तो हैंगुलशन में चाक चंद गरेबाँ हुए तो हैंअब भी ख़िज़ाँ का राज है लेकिन कहीं कहींगोशे रह-ए-चमन में ग़ज़ल-ख़्वाँ हुए तो हैंठहरी हुई है शब की सियाही वहीं मगरकुच कुछ सहर के रंग पर-अफ़्शाँ हुए तो हैंइन में लहू जला हो हमारा कि जान ओ दिलमहफ़िल में कुछ चराग़ फ़रोज़ाँ हुए तो हैंहाँ कज करो कुलाह कि सब कुछ लुटा के हमअब बे-नियाज़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ हुए तो हैंअहल-ए-क़फ़स की सुब्ह-ए-चमन में खुलेगी आँखबाद-ए-सबा से वअदा-ओ-पैमाँ हुए तो हैंहै दश्त अब भी दश्त मगर ख़ून-ए-पा से 'फ़ैज़'सैराब चंद ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हुए तो हैं
गोशे में इसी क़स्र के दो दिल हैं हम-आग़ोशशोले हैं मगर मस्लहत-ए-वक़्त से ख़ामोश
मर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओवो ख़ुदाओं का मुक़र्रब वो ख़ुदावंद-ए-कलामसौत-ए-इंसानी की रूह-ए-जावेदाँआसमानों की निदा-ए-बे-कराँआज साकित मिस्ल-ए-हर्फ़-ए-ना-तमाममर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओआओ इस्राफ़ील के इस ख़्वाब-ए-बे-हंगाम पर आँसू बहाएँआर्मीदा है वो यूँ क़र्ना के पासजैसे तूफ़ाँ ने किनारे पर उगल डाला उसेरेग-ए-साहिल पर चमकती धूप में चुप चापअपने सूर के पहलू में वो ख़्वाबीदा हैउस की दस्तार उस के गेसू उस की रीशकैसे ख़ाक-आलूदा हैंथे कभी जिन की तहें बूद-ओ-नबूदकैसे इस का सूर इस के लब से दूरअपनी चीख़ों अपनी फ़रियादों में गुमझिलमिला उठते थे जिस से दैर-ओ-ज़ूदमर्ग-ए-इस्राफ़ील पर आँसू बहाओवो मुजस्सम हमहमा था वो मुजस्सम ज़मज़मावो अज़ल से ता अबद फैली हुई ग़ैबी सदाओं का निशाँमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेहल्क़ा दर हल्क़ा फ़रिश्ते नौहा गरइब्न-ए-आदम ज़ुल्फ़-दर-ख़ाक-ओ-नज़ारहज़रत-ए-यज़्दाँ की आँखें ग़म से तारआसमानों की सफ़ीर आती नहींआलम-ए-लाहूत से कोई नफ़ीर आती नहींमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेइस जहाँ पर बंद आवाज़ों का रिज़्क़मुतरिबों का रिज़्क़ और साज़ों का रिज़्क़अब मुग़न्नी किस तरह गाएगा और गाएगा क्यासुनने वालों के दिलों के तार चुपअब कोई रक़्क़ास क्या थिरकेगा लहराएगा क्याबज़्म के फ़र्श-ओ-दर-ओ-दीवार चुपअब ख़तीब-ए-शहर फ़रमाएगा क्यामस्जिदों के आस्तान-ओ-गुम्बद-ओ-मीनार चुपफ़िक्र का सय्याद अपना दाम फैलाएगा क्याताइरान-ए-मंज़िल-ओ-कोहसार चुपमर्ग-ए-इस्राफ़ील हैगोश-ए-शनवा की लब-ए-गोया की मौतचश्म-ए-बीना की दिल-ए-दाना की मौतथी इसी के दम से दरवेशों की सारी हाव-हूअहल-ए-दिल की अहल-ए-दिल से गुफ़्तुगूअहल-ए-दिल जो आज गोशा-गीर-ओ-सुर्मा-दर-गुलूअब तना ता-हू भी ग़ाएब और या-रब हा भी गुमअब गली कूचों की हर आवा भी गुमये हमारा आख़िरी मलजा भी गुममर्ग-ए-इस्राफ़ील सेइस जहाँ का वक़्त जैसे सो गया पथरा गयाजैसे कोई सारी आवाज़ों को यकसर खा गयाऐसी तन्हाई कि हुस्न-ए-ताम याद आता नहींऐसा सन्नाटा कि अपना नाम याद आता नहींमर्ग-ए-इस्राफ़ील सेदेखते रह जाएँगे दुनिया के आमिर भीज़बाँ-बंदी के ख़्वाबजिस में मजबूरों की सरगोशी तो होउस ख़ुदावंदी के ख़्वाब
वक़्त बदला तो मिरे नाम का तारा निकलाजैसे बच्चे का कोई लफ़्ज़ हो पहला पहलाजैसे प्यासा कोई आ कर लब-ए-दरिया मचलाजैसे कोहसार के गोशे पे मुसाफ़िर सँभला
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
जो सुन लेता है गोश-ए-दिल से अफ़्साना कनहैया कावो हो जाता है सच्चे दिल से दीवाना कनहैया कानज़र आती है जिस को ख़्वाब में वो सूरत-ए-दिलकशवो अपना दिल बना लेता है काशाना कनहैया कासुरूर-ओ-कैफ़ की मिलती है उस को लज़्ज़त-ए-दाइमलगा लेता है होंटों से जो पैमाना कनहैया कातुम अपना हाथ फैलाओ ज़रा साक़ी की महफ़िल मेंकि बाँटा जा रहा है आज पैमाना कनहैया काकिसी पर बंद होने का नहीं मय-ख़ाना-ए-उलफ़तचले आओ खुला रहता है मय-ख़ाना कनहैया काकनहैया की मोहब्बत में जो जाँ पर खेल जाता हैउसे सब लोग कह देते हैं दीवाना कनहैया का'नहीफ़' अपने पराए सब इसी के दिल में रहते हैंसब अपने हैं नहीं कोई भी बेगाना कनहैया का
देख बाज़ार में लोगों का हुजूमबे-पनाह सैल के मानिंद रवाँजैसे जिन्नात बयाबानों मेंमिशअलें ले के सर-ए-शाम निकल आते हैंउन में हर शख़्स के सीने के किसी गोशे मेंएक दुल्हन सी बनी बैठी हैटिमटिमाती हुई नन्ही सी ख़ुदी की क़िंदीललेकिन इतनी भी तवानाई नहींबढ़ के उन में से कोई शोला-ए-जव्वाला बने!इन में मुफ़लिस भी हैं बीमार भी हैंज़ेर-ए-अफ़्लाक मगर ज़ुल्म सहे जाते हैं
यूँ वक़्त गुज़रता हैफ़ुर्सत की तमन्ना मेंजिस तरह कोई पत्ताबहता हुआ दरिया मेंसाहिल के क़रीब आ करचाहे कि ठहर जाऊँऔर सैर ज़रा कर लूँउस अक्स-ए-मोशज्जर कीजो दामन-ए-दरिया परज़ेबाइश-ए-दरिया हैया बाद का वो झोंकाजो वक़्फ़-ए-रवानी हैइक बाग़ के गोशे मेंचाहे कि यहाँ दम लूँदामन को ज़रा भर लूँउस फूल की ख़ुशबू सेजिस को अभी खिलना हैफ़ुर्सत की तमन्ना मेंयूँ वक़्त गुज़रता है
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहाचर्चा है जा-ब-जा तिरे हाल-ए-तबाह कासमझा है तू ने नेचर ओ तदबीर को ख़ुदादिल में ज़रा असर न रहा ला-इलाह काहो तुझ से तर्क-ए-सौम-ओ-सलात-ओ-ज़कात-ओ-हजकुछ डर नहीं जनाब-ए-रिसालत-पनाह काशैतान ने दिखा के जमाल-ए-उरूस-ए-दहरबंदा बना दिया है तुझे हुब्ब-ए-जाह काउस ने दिया जवाब कि मज़हब हो या रिवाजराहत में जो मुख़िल हो वो काँटा है राह काअफ़्सोस है कि आप हैं दुनिया से बे-ख़बरक्या जानिए जो रंग है शाम-ओ-पगाह कायूरोप का पेश आए अगर आप को सफ़रगुज़रे नज़र से हाल रेआ'या-ओ-शाह कावो आब-ओ-ताब-ओ-शौकत-ए-ऐवान-ए-ख़ुसरवीवो महकमों की शान वो जल्वा सिपाह काआए नज़र उलूम-ए-जदीदा की रौशनीजिस से ख़जिल हो नूर रुख़-ए-मेहर-ओ-माह कादावत किसी अमीर के घर में हो आप कीकम-सिन मिसों से ज़िक्र हो उल्फ़त का चाह कानौ-ख़ेज़ दिल-फ़रेब गुल-अंदाम नाज़नींआरिज़ पे जिन के बार हो दामन निगाह कारुकिए अगर तो हँस के कहे इक बुत-ए-हसींसुन मौलवी ये बात नहीं है गुनाह काउस वक़्त क़िबला झुक के करूँ आप को सलामफिर नाम भी हुज़ूर जो लें ख़ानक़ाह कापतलून-ओ-कोट-ओ-बंगला-ओ-बिस्कुट की धुन बंधेसौदा जनाब को भी हो तुर्की कुलाह कामिम्बर पे यूँ तो बैठ के गोशे में ऐ जनाबसब जानते हैं वा'ज़ सवाब-ओ-गुनाह का
महसूस ये होता हैदुख झेले थे जो अब तकबे-नाम मसाफ़त मेंलिखने की मोहब्बत मेंपढ़ने की ज़रूरत मेंबे-सूद रियाज़त थीबे-फ़ैज़ इबादत थीजो ख़्वाब भी देखे थेइन जागती आँखों नेसब ख़ाम-ख़याली थीफिर भी तुझे पाने कीदिल के किसी गोशे मेंख़्वाहिश तो बचा ली थीलेकिन तुझे पा कर भीऔर ख़ुद को गँवा कर भीइस हब्स के मौसम की खिड़की से हवा आईन फूल से ख़ुशबू की कोई भी सदा आईअब नींद है आँखों मेंनाँ दिल में वो पहली सी ताज़ा सुख़न-आराईनाँ लफ़्ज़ मिरे निकलेनाँ हर्फ़-ओ-मुआ'फ़ी की दानिश मिरे काम आईनादीदा रिफ़ाक़त मेंजितनी भी अज़िय्यत थीसब मेरे ही नाम आईकुछ भी तो नहीं वैसाजैसा तुझे सोचा थाजितना तुझे चाहा था
सफ़-ए-मातम बिछी हैसुख़न का आख़िरी दर बंद होने की ख़बर नेखिड़कियों के पार बैठे ग़मगुसारों कोये कैसी चुप लगा दी हैये किस की ना-गहानी मौत पर सरगोशियों की आग रौशन हैकिसी के कुंज-ए-लब से कोई तारा मेरे दिल पर आन पड़ता हैबुरा हो मौत का जिस ने मिरे फ़रियाद-रस की जान ले ली हैअभी उस की ज़रूरत थीमैं इस दुनिया के इक गोशे में बैठा सोचता हूँआज इस वीरान मंडली मेंमैं किस को पुर्सा देने के लिए आया हूँमुझ को ताज़ियत तो ख़ुद से करना थीअभी इस घर से इक मय्यत सिधारी हैदम-ए-रुख़्सतकिसी ने निकहत-ए-ज़ुल्फ़-परेशाँ का नहीं पूछाकिसी ने दुख के अंदर रौशनी की छब नहीं देखीमकाँ से फूटने वाली रविश परएक बच्चा रो रहा हैआज उस के आँसुओं को कौन पोंछेगाकि उस के साथ जो शतरंज की बाज़ी लगाता थावो अब ज़ेर-ए-ज़मीं इक चादर-ए-सादा की ख़ुशबू हैयहाँ सुब्हें भी आएँगीयहाँ शामें भी उतरेंगीमगर इक हिचकियाँ लेता हुआ बच्चाचराग़-ए-आरज़ू बन करसर-ए-ताक़-ए-लहद गूँगी ज़मीं की लब-कुशाई तक पुकारे गाबुरा हो मौत का जिस ने मिरे फ़रियाद-रस की जान ले ली है
मुझे रस्ता नहीं मिलतामैं जौहड़ में खिले फूलों के हक़ में बोल करदलदल की तह में धँस गया हूँमें नहीं कहता कि ये किस आसमाँ का कौन सा सय्यारा-ए-बद हैमगर ये तह ज़मीं की आख़िरी छत हैयहाँ दिन ही निकलता है न शाम-ए-उम्र ढलती हैपरिंदा भी नहीं कोई कि जिस के पाँव से कोईनविश्ता बाँध कर भेजूँ तो समझूँ उस से मिलने काबहाना हाथ आया हैसितारा भी नहीं कोई कि जिस से गुफ़्तुगू ठहरेनवाह-ए-जिस्म में फैली ख़िज़र-आसार तंहाई मिरी साँसें बढ़ाती हैमुझे इस दलदली गोशे से जाने का कोई रस्ता नहीं मिलतासन ऐ मेरी ख़िज़र-आसार तंहाईमिरी ख़ातिर भी थोड़ा सा तरद्दुद करमुझे भी तो 'सिकंदर' के जनाज़े में पहुँचना हैमुझे भी आब-ए-हैवाँ से छलकती मौत का नौहा सुनाना हैमुझे भी दूर जाना हैसन ऐ मेरी ख़िज़र-आसार तंहाईमुझे इस तुख़्म-ए-इम्काँ के दरीचे से निकलने देनुमू की चाल चलने देमुझे रस्ता नहीं मिलता
एक कछवे के आ गई जी मेंकीजिए सैर ओ गश्त ख़ुश्की कीजा रहा था चला हुआ ख़ामोशउस से नाहक़ उलझ पड़ा ख़रगोशमियाँ कछवे! तुम्हारी चाल है येया कोई शामत और वबाल है येयूँ क़दम फूँक फूँक धरते होगोया उत्तू ज़मीं पे धरते होक्यूँ हुए चल के मुफ़्त में बद-नामबे-चले क्या अटक रहा था कामतुम को ये हौसला न करना थाचुल्लू पानी में डूब मरना थाये तन-ओ-तोश और ये रफ़्तारऐसी रफ़्तार पर ख़ुदा की मारबोला कछवा कि हों ख़फ़ा न हुज़ूरमैं तो हूँ आप मो'तरिफ़ ब-क़ुसूरअगर आहिस्तगी है जुर्म-ओ-गुनाहतो मैं ख़ुद अपने जुर्म का हूँ गवाहमुझ को जो सख़्त सुस्त फ़रमायाआप ने सब दुरुस्त फ़रमायामुझ को ग़ाफ़िल मगर न जानिएगाबंदा-परवर बुरा न मानिएगायूँ ज़बानी जवाब तो क्या दूँशर्त बद कर चलो तो दिखला दूँतुम तो हो आफ़्ताब में ज़र्रापर मिटा दूँगा आप का ग़र्रासुन के ख़रगोश ने ये तल्ख़ जवाबकहा कछवे से यूँ ज़ि-रू-ए-इताबतू करे मेरी हम-सरी का ख़यालतेरी ये ताब ये सकत ये मजालच्यूँटी के जो पर निकल आएतो यक़ीं है कि अब अजल आएअरे बेबाक! बद-ज़बाँ मुँह-फटतू ने देखी कहाँ है दौड़ झपटजब मैं तेज़ी से जस्त करता हूँशहसवारों को पस्त करता हूँगर्द को मेरी बाद-ए-पा न लगेलाख दौड़े मिरा पता न लगेरेल हूँ बर्क़ हूँ छलावा हूँमैं छलावे का बल्कि बावा हूँतेरी मेरी निभेगी सोहबत क्याआसमाँ को ज़मीं से निस्बत क्याजिस ने भुगते हों तुर्की ओ ताज़ीऐसे मरियल से क्या बदे बाज़ीबात को अब ज़ियादा क्या दूँ तूलख़ैर करता हूँ तेरी शर्त क़ुबूलहै मुनासिब कि इम्तिहाँ हो जाएताकि ऐब ओ हुनर अयाँ हो जाएअल-ग़रज़ इक मक़ाम ठहरा करहुए दोनों हरीफ़ गर्म-ए-सफ़रबस-कि ज़ोरों पे था चढ़ा ख़रगोशतेज़ी फुरती से यूँ बढ़ा ख़रगोशजिस तरह जाए तोप का गोलाया गिरे आसमान से ओलाएक दो खेत चौकड़ी भर केअपनी चुसती पे आफ़रीं कर केकिसी गोशे में सो गया जा करफ़िक्र ''क्या है चलेंगे सुस्ता कर''और कछवा ग़रीब आहिस्ताचला सीने को ख़ाक पर घिसतासूई घंटे की जैसे चलती हैया ब-तदरीज छाँव ढलती हैयूँही चलता रहा ब-इस्तिक़्लालन किया कुछ इधर उधर का ख़यालकाम करता रहा जो पै-दर-पैकर गया रफ़्ता रफ़्ता मंज़िल तयहैफ़ ख़रगोश रह गया सोतासमरा ग़फ़लत का और क्या होताजब खुली आँख तो सवेरा थासख़्त शर्मिंदगी ने घेरा थासब्र ओ मोहब्बत में है सर-अफ़राज़ीसुस्त कछवे ने जीत ली बाज़ीनहीं क़िस्सा ये दिल-लगी के लिएबल्कि इबरत है आदमी के लिएहै सुख़न इस हिजाब में रू-पोशवर्ना कछवा कहाँ कहाँ ख़रगोश
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