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नज़्म
अभी तो नेकियों के सींच कर नख़्ल-ए-तर-ओ-ताज़ा
अभी सहन-ए-स'आदत में लगाने की ज़रूरत थी
ऐश शुजाबादी
नज़्म
कभी ईसा के ख़ून-ए-गर्म-ओ-ताज़ा ने किया रंगीं
कभी गौतम की मौसीक़ी के सायों ने इसे घेरा
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
मुरली की सुहानी संगत को ताऊस-ओ-रबाब आ जाते हैं
चम्पा के महकते पहलू में ख़ुश-रंग गुलाब आ जाते हैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जहान-ए-ताज़ा की अफ़्कार-ए-ताज़ा से है नुमूद
कि संग-ओ-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो कारवान-ए-गुल-ए-ताज़ा जिस के मुज़्दे से
दिमाग़-ए-इश्क़ मोअत्तर है और फ़ज़ा मामूर