aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "hoor"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
मिरे रब की मुझ पर इनायत हुईकहूँ भी तो कैसे इबादत हुई
वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबावो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबाकिस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कारकिस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ारगेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुएऔर कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुएरंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहींकैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहींवो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशीजैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ीमुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहींऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहींदुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहींवो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी शफ़क़ के सायों मेंदिन रात के दामन मिलते हैंक्या अब भी चमन में वैसे हीख़ुश-रंग शगूफ़े खिलते हैंबरसाती हवा की लहरों सेभीगे हुए पौदे हिलते हैंओ देस से आने वाले बता
उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म सेसितारे आसमाँ के बे-ख़बर थे लज़्ज़त-ए-रम सेक़मर अपने लिबास-ए-नौ में बेगाना सा लगता थान था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन-ए-मुसल्लम सेअभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनियामज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम सेकमाल-ए-नज़्म-ए-हस्ती की अभी थी इब्तिदा गोयाहुवैदा थी नगीने की तमन्ना चश्म-ए-ख़ातम सेसुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर थासफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम सेलिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ाछुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम सेनिगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर कीवो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म सेबढ़ा तस्बीह-ख़्वानी के बहाने अर्श की जानिबतमन्ना-ए-दिली आख़िर बर आई सई-ए-पैहम सेफिराया फ़िक्र-ए-अज्ज़ा ने उसे मैदान-ए-इम्काँ मेंछुपेगी क्या कोई शय बारगाह-ए-हक़ के महरम सेचमक तारे से माँगी चाँद से दाग़-ए-जिगर माँगाउड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़-ए-बरहम सेतड़प बिजली से पाई हूर से पाकीज़गी पाईहरारत ली नफ़स-हा-ए-मसीह-ए-इब्न-ए-मरयम सेज़रा सी फिर रुबूबियत से शान-ए-बे-नियाज़ी लीमलक से आजिज़ी उफ़्तादगी तक़दीर शबनम सेफिर इन अज्ज़ा को घोला चश्मा-ए-हैवाँ के पानी मेंमुरक्कब ने मोहब्बत नाम पाया अर्श-ए-आज़म सेमुहव्विस ने ये पानी हस्ती-ए-नौ-ख़ेज़ पर छिड़कागिरह खोली हुनर ने उस के गोया कार-ए-आलम सेहुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ागले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम सेख़िराम-ए-नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों नेचटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला-ज़ारों ने
ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैंजिंस-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैंइश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरीफ़ित्ना-ए-अक़्ल से बे-ज़ार हूँ मैंख़्वाब-ए-इशरत में हैं अरबाब-ए-ख़िरदऔर इक शाइर-ए-बेदार हूँ मैंछेड़ती है जिसे मिज़राब-ए-अलमसाज़-ए-फ़ितरत का वही तार हूँ मैंरंग नज़्ज़ारा-ए-क़ुदरत मुझ सेजान-ए-रंगीनी-ए-कोहसार हूँ मैंनश्शा-ए-नर्गिस-ए-ख़ूबाँ मुझ सेग़ाज़ा-ए-आरिज़-ओ-रुख़्सार हूँ मैंऐब जो हाफ़िज़ ओ ख़य्याम मैं थाहाँ कुछ इस का भी गुनहगार हूँ मैंज़िंदगी क्या है गुनाह-ए-आदमज़िंदगी है तो गुनहगार हूँ मैंरश्क-ए-सद-होश है मस्ती मेरीऐसी मस्ती है कि हुश्यार हूँ मैंले के निकला हूँ गुहर-हा-ए-सुख़नमाह ओ अंजुम का ख़रीदार हूँ मैंदैर ओ काबा में मिरे ही चर्चेऔर रुस्वा सर-ए-बाज़ार हूँ मैंकुफ़्र ओ इल्हाद से नफ़रत है मुझेऔर मज़हब से भी बे-ज़ार हूँ मैंअहल-ए-दुनिया के लिए नंग सहीरौनक़-ए-अंजुमन-ए-यार हूँ मैंऐन इस बे-सर-ओ-सामानी मेंक्या ये कम है कि गुहर-बार हूँ मैंमेरी बातों में मसीहाई हैलोग कहते हैं कि बीमार हूँ मैंमुझ से बरहम है मिज़ाज-ए-पीरीमुजरिम-ए-शोख़ी-ए-गुफ़्तार हूँ मैंहूर ओ ग़िल्माँ का यहाँ ज़िक्र नहींनौ-ए-इंसाँ का परस्तार हूँ मैंमहफ़िल-ए-दहर पे तारी है जुमूदऔर वारफ़्ता-ए-रफ़्तार हूँ मैंइक लपकता हुआ शो'ला हूँ मैंएक चलती हुई तलवार हूँ मैं
वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियमवो मख़मूर आँखें वो गेसू-ए-पुर-ख़मवो अर्ज़-ए-कलीसा की इक माह-पारावो दैर-ओ-हरम के लिए इक शरारावो फ़िरदौस-ए-मरियम का इक ग़ुंचा-ए-तरवो तसलीस की दुख़्तर-ए-नेक-अख़्तरवो इक नर्स थी चारा-गर जिस को कहिएमदावा-ए-दर्द-ए-जिगर जिस को कहिएजवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थीहवा चल रही थी कली खिल रही थीवो पुर-रोब तेवर वो शादाब चेहरामता-ए-जवानी पे फ़ितरत का पहरामिरी हुक्मरानी है अहल-ए-ज़मीं परये तहरीर था साफ़ उस की जबीं परसफ़ेद और शफ़्फ़ाफ़ कपड़े पहन करमिरे पास आती थी इक हूर बन करवो इक आसमानी फ़रिश्ता थी गोयाकि अंदाज़ था उस में जिब्रईल का सावो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं कीवो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं कीवो तस्कीन-ए-दिल थी सुकून-ए-नज़र थीनिगार-ए-शफ़क़ थी जमाल-ए-नज़र थीवो शो'ला वो बिजली वो जल्वा वो परतवसुलैमाँ की वो इक कनीज़-ए-सुबुक-रौकभी उस की शोख़ी में संजीदगी थीकभी उस की संजीदगी में भी शोख़ीघड़ी चुप घड़ी करने लगती थी बातेंसिरहाने मिरे काट देती थी रातेंअजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वोकभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वोनक़ाहत के आलम में जब आँख उठतीनज़र मुझ को आती मोहब्बत की देवीवो उस वक़्त इक पैकर-ए-नूर होतीतख़य्युल की पर्वाज़ से दूर होतीहंसाती थी मुझ को सुलाती थी मुझ कोदवा अपने हाथों से मुझ को पिलातीअब अच्छे हो हर रोज़ मुज़्दा सुनातीसिरहाने मिरे एक दिन सर झुकाएवो बैठी थी तकिए पे कुहनी टिकाएख़यालात-ए-पैहम में खोई हुई सीन जागी हुई सी न सोई हुई सीझपकती हुई बार बार उस की पलकेंजबीं पर शिकन बे-क़रार उस की पलकेंवो आँखों के साग़र छलकते हुए सेवो आरिज़ के शोले भड़कते हुए सेलबों में था लाल-ओ-गुहर का ख़ज़ानानज़र आरिफ़ाना अदा राहिबानामहक गेसुओं से चली आ रही थीमिरे हर नफ़स में बसी जा रही थीमुझे लेटे लेटे शरारत की सूझीजो सूझी भी तो किस क़यामत की सूझीज़रा बढ़ के कुछ और गर्दन झुका लीलब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा लीवो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिएबेहिश्त-ए-जवानी का तोहफ़ा समझिएशराब-ए-मोहब्बत का इक जाम-ए-रंगींसुबू-ज़ार-ए-फ़ितरत का इक जाम-ए-रंगींमैं समझा था शायद बिगड़ जाएगी वोहवाओं से लड़ती है लड़ जाएगी वोमैं देखूँगा उस के बिफरने का आलमजवानी का ग़ुस्सा बिखरने का आलमइधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा थामगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा थाहँसी और हँसी इस तरह खिलखिला करकि शम-ए-हया रह गई झिलमिला करनहीं जानती है मिरा नाम तक वोमगर भेज देती है पैग़ाम तक वोये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सरकि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर
इन्ही सहराओं में वो अपने गल्ले को चराती थीइन्हीं चश्मों पे वो हर रोज़ मुँह धोने को आती थीइन्ही टीलों के दामन में वो आज़ादाना रहती थीयही वादी है वो हमदम जहाँ 'रेहाना' रहती थी
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
गरचे लिखी हुई थी शहादत इमाम कीलेकिन मेरे हुसैन ने हुज्जत तमाम की
सुहानी नुमूद-ए-जहाँ की घड़ी थीतबस्सुम-फ़शाँ ज़िंदगी की कली थीकहीं मुहर को ताज-ए-ज़र मिल रहा थाअता चाँद को चाँदनी हो रही थीसियह पैरहन शाम को दे रहे थेसितारों को ता'लीम-ए-ताबिंदगी थीकहीं शाख़-ए-हस्ती को लगते थे पत्तेकहीं ज़िंदगी की कली फूटती थीफ़रिश्ते सिखाते थे शबनम को रोनाहँसी गुल को पहले-पहल आ रही थीअता दर्द होता था शाइ'र के दिल कोख़ुदी तिश्ना-काम मय-ए-बे-ख़ुदी थीउठी अव्वल अव्वल घटा काली कालीकोई हूर चोटी को खोले खड़ी थीज़मीं को था दा'वा कि मैं आसमाँ हूँमकाँ कह रहा था कि मैं ला-मकाँ हूँग़रज़ इस क़दर ये नज़ारा था प्याराकि नज़ारगी हो सरापा नज़ारामलक आज़माते थे परवाज़ अपनीजबीनों से नूर-ए-अज़ल आश्काराफ़रिश्ता था इक इश्क़ था नाम जिस काकि थी रहबरी उस की सब का सहाराफ़रिश्ता कि पुतला था बे-ताबियों कामलक का मलक और पारे का पारापए सैर फ़िरदौस को जा रहा थाक़ज़ा से मिला राह में वो क़ज़ा-राये पूछा तिरा नाम क्या काम क्या हैनहीं आँख को दीद तेरी गवाराहुआ सुन के गोया क़ज़ा का फ़रिश्ताअजल हूँ मिरा काम है आश्काराउड़ाती हूँ मैं रख़्त-ए-हस्ती के पुर्ज़ेबुझाती हूँ मैं ज़िंदगी का शरारामिरी आँख में जादू-ए-नीस्ती हैपयाम-ए-फ़ना है उसी का इशारामगर एक हस्ती है दुनिया में ऐसीवो आतिश है मैं सामने उस के पाराशरर बन के रहती है इंसाँ के दिल मेंवो है नूर-ए-मुतलक़ की आँखों का ताराटपकती है आँखों से बन बन के आँसूवो आँसू कि हो जिन की तल्ख़ी गवारासुनी इश्क़ ने गुफ़्तुगू जब क़ज़ा कीहँसी उस के लब पर हुई आश्कारागिरी इस तबस्सुम की बिजली अजल परअंधेरे का हो नूर में क्या गुज़ाराबक़ा को जो देखा फ़ना हो गई वोक़ज़ा थी शिकार क़ज़ा हो गई वो
तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिएवक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहेऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूरइतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँही दूर ही दूरसोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गयाशहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गयारूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकीबचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगीदूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो देतुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिएबाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंधऐ कलियो क्यूँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंदकितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिएतुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सकेसेहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगेफिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगेऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बूहर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तूजो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन लेतुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए
गुनाह के तुंद-ओ-तेज़ शोलों से रूह मेरी भड़क रही थीहवस की सुनसान वादियों में मिरी जवानी भटक रही थीमिरी जवानी के दिन गुज़रते थे वहश-आलूद इशरतों मेंमिरी जवानी के मय-कदों में गुनाह की मय छलक रही थीमिरे हरीम-ए-गुनाह में इश्क़ देवता का गुज़र नहीं थामिरे फ़रेब-ए-वफ़ा के सहरा में हूर-ए-इस्मत भटक रही थीमुझे ख़स-ए-ना-तवाँ के मानिंद ज़ौक़-ए-इस्याँ बहा रहा थागुनाह की मौज-ए-फ़ित्ना-सामाँ उठा उठा कर पटक रही थीशबाब के अव्वलीं दिनों में तबाह ओ अफ़्सुर्दा हो चुके थेमिरे गुलिस्ताँ के फूल जिन से फ़ज़ा-ए-तिफ़्ली महक रही थीग़रज़ जवानी में अहरमन के तरब का सामान बन गया मैंगुनह की आलाइशों में लुथड़ा हुआ इक इंसान बन गया मैं
फ़र्यादी-ए-जफ़ा-ए-अय्याम हो रहा हूँपामाल-ए-जौर-ए-बख़्त-ए-नाकाम हो रहा हूँसरगश्ता-ए-ख़याल-ए-अंजाम हो रहा हूँबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँबद-नाम हो रहा हूँसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँसलमा से दिल लगा कर सलमा से दिल लगा करउस हूर-वश के ग़म में दुनिया-ओ-दीं गँवा करहोश-ओ-हवास खो कर सब्र-ओ-सुकूँ लुटा करबैठे बिठाए दिल में ग़म की ख़लिश बसा करहर चीज़ को भुला करसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँकहती हैं सब ये किस की तड़पा गई है सूरतसलमा की शायद इस के मन भा गई है सूरतऔर उस के ग़म में इतनी मुरझा गई है सूरतमुरझा गई है सूरत कुम्हला गई है सूरतसँवला गई है सूरतसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँपनघट पे जब कि सारी होती हैं जम्अ' आ करगागर को अपनी रख कर, घुँघट उठा उठा करये क़िस्सा छेड़ती हैं मुझ को बता बता करसलमा से बातें करते देखा है इस को जा करहम ने नज़र बचा करसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँरातों को गीत गाने जब मिल कर आती हैं सबतालाब के किनारे धूमें मचाती हैं सबजंगल की चाँदनी में मंगल मनाती हैं सबतो मेरे और सलमा के गीत गाती हैं सबऔर हँसती जाती हैं सबसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँखेतों से लौटती हैं जब दिन छुपे मकाँ कोतब रास्ते में बाहम वो मेरी दास्ताँ कोदोहरा के छेड़ती हैं सलमा को मेरी जाँ कोऔर वो हया की मारी सी लेती है ज़बाँ कोकि छेड़े इस बयाँ कोसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँकहती है रहम खा कर यूँ एक माह-ए-तलअतये शहरी नौजवाँ था किस दर्जा ख़ूबसूरतआँखों में बस रही है अब भी वो पहली रंगतदो दिन में आह क्या है क्या हो गई है हालतअल्लाह तेरी क़ुदरतसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँउस शम्अ'-रू का जब से परवाना बन गया हूँबस्ती की लड़कियों में अफ़्साना बिन गया हूँहर माह-वश के लब का पैमाना बन गया हूँदीवाना हो रहा हूँ दीवाना बन गया हूँदीवाना बन गया हूँसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँउन की ज़बाँ पे मेरी जितनी कहानियाँ हैंक्या जानें ये कि दिल की सब मेहरबानियाँ हैंकम-सिन हैं बे-ख़बर हैं उठती जवानियाँ हैंक्या समझें ग़म के हाथों क्यूँ सर-गिरानियाँ हैंक्यूँ ख़ूँ-फ़िशानियाँ हैंसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँहर इक के रहम का यूँ इज़हार हो रहा हैबेचारे को ये कैसा आज़ार हो रहा हैदेखे तो कोई जाने बीमार हो रहा हैकिस दर्जा ज़िंदगी से बेज़ार हो रहा हैनाचार हो रहा हैसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँइक पूछती है आ कर तुम बे-क़रार क्यूँ होकुछ तो हमें बताओ यूँ दिल-फ़िगार क्यूँ होक्या रोग है कहो तो तुम अश्क-बार क्यूँ होदीवाने क्यूँ हुए हो दीवाना वार क्यूँ होबा-हाल-ए-ज़ार क्यूँ होसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँजाऊँ शिकार को गर बा-हमरहान-ए-सहराखेतों से घूरती हैं यूँ दुख़्तरान-ए-सहराबिजली की रौशनी को जैसे मियान-ए-सहरातारीक शब में देखें कुछ आहुवान-ए-सहराहैरत कुशान-ए-सहरासलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँइक शोख़ छेड़ती है इस तरह पास आ करदेखो वो जा रही है सलमा नज़र बचा करशरमा के मुस्कुरा कर आँचल से मुँह छुपा करजाओ ना पीछे पीछे दो बातें कर लो जा करखेतों में छुप छुपा करसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँगोया हमें हसद से कुछ नाज़नीन निगाहेंसलमा की भा गई हैं क्यूँ दिल-नशीं निगाहेंउन से ज़्यादा दिलकश हैं ये हसीं निगाहेंअल-क़िस्सा एक दिल है सौ ख़शमगीं निगाहेंशौक़ आफ़रीं निगाहेंसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँइक शोख़ ताज़ा दारद ससुराल से घर आ करसखियों से पूछती है जिस दम मुझे बता करये कौन है तो ज़ालिम कहती हैं मुस्कुरा करतुम इस का हाल पूछो सलमा के दिल से जा करये गीत उसे सुना करसलमा से दिल लगा करबस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ
रात के फैले अंधेरे में कोई साया नहींझिलमिलाते हुए कमज़ोर सितारे ये कहे जाते हैंचाँद आएगा तो साए भी चले आएँगेरात के फैले अंधेरे में कोई साया नहीं होता है
आज वो आख़िरी तस्वीर जला दी हम नेजिस से इस शहर के फूलों की महक आती थीजिस से बे-नूर ख़यालों पे चमक आती थीकाबा-ए-रहमत-ए-असनाम था जो मुद्दत सेआज उस क़स्र की ज़ंजीर हिला दी हम नेआग, काग़ज़ के चमकते हुए सीने पे बढ़ीख़्वाब की लहर में बहते हुए आए साहिलमुस्कुराते हुए होंटों का सुलगता हुआ कर्बसरसराते हुए लम्हों के धड़कते हुए दिलजगमगाते हुए आवेज़ां की मुबहम फ़रियाददश्त-ए-ग़ुर्बत में किसी हजला-नशीं का महमिलएक दिन रूह का हर तार सदा देता थाकाश हम बिक के भी इस जिंस-ए-गिराँ को पा लेंख़ुद भी खो जाएँ पर इस रम्ज़-ए-निहाँ को पा लेंअक़्ल उस हूर के चेहरे की लकीरों को अगरआ मिटाती थी तो दिल और बना देता थाऔर अब याद के इस आख़िरी पैकर का तिलिस्मक़िस्सा-ए-रफ़्ता बना ज़ीस्त की मातों से हुआदूर इक खेत पे बादल का ज़रा सा टुकड़ाधूप का ढेर हुआ धूप के हातों से हुआउस का प्यार उस का बदन उस का महकता हुआ रूपआग की नज़्र हुआ और इन्ही बातों से हुआ
ये मई की पहली, दिन है बंदा-ए-मज़दूर कामुद्दतों के ब'अद देखा इस ने जल्वा हूर काये जो रिश्ता-दार था हम सब का लेकिन दूर कामिल के मालिक ने इसे रुत्बा दिया मंसूर काजब लगाया हक़ का नारा दार पर खींचा गयानख़्ल-ए-सनअ'त इस के ख़ूँ की धार पर सींचा गया
क्या रूह-फ़ज़ा जल्वा-ए-रुख़्सार-ए-सहर हैकश्मीर दिल-ए-ज़ार है फ़िरदौस-ए-नज़र हैहर फूल का चेहरा अरक़-ए-हुस्न से तर हैहर चीज़ में इक बात है हर शय में असर है
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