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नज़्म
इम्तिहान-ए-दीदा-ए-ज़ाहिर में कोहिस्ताँ है तू
पासबाँ अपना है तू दीवार-ए-हिन्दुस्ताँ है तू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रौश्नी-ए-तब्अ' के हाथों नहीं हासिल सुकूँ
ज़ेहन-ओ-दिल की कश्मकश अल्फ़ाज़ में क्यूँकर कहूँ
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
मैं अपनी तुर्फ़गी-ए-तब्अ' का तो पी लूँ ज़हर
जो दस्तरस में नहीं चश्मा-ए-हयात तो क्या
वहीद अख़्तर
नज़्म
तौसन-ए-तब-ए-रसा के पाँव में कुछ लंग है
लेकिन इस सूरत में चुप रहना भी वज्ह-ए-नंग है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
फिर दिल को पास-ए-ज़ब्त की तल्क़ीन कर चुकें
और इम्तिहान-ए-ज़ब्त से फिर जी चुराईं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इम्तिहान-ए-ज़ीस्त में तू किस क़दर ही कामयाब
हर वरक़ तेरी किताब-ए-उम्र का है ख़ुद किताब
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
हुई फिर इमतिहान-ए-इशक़ की तदबीर बिस्मिल्लाह
गिनो सब दाग़ दिल के हसरतें शौक़ें निगाहों की