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नज़्म
अली अकबर नातिक़
नज़्म
कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार
फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
मर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
उठाए फिरतीं जवान परियों की महमिलों को
ये सेहन-ए-क़र्या है उन जगहों पर घनी खजूरों की सब्ज़ शाख़ें
अली अकबर नातिक़
नज़्म
उफ़ कि तुझे अज़ीज़ हैं चर्ब-ज़बान-ओ-बद-सुख़न
तुझ से कहूँ तो क्या कहूँ ऐ मिरी बा-मुराद क़ौम
अर्श मलसियानी
नज़्म
बे-ज़ार ज़िंदगी से हैं पीर ओ जवाँ सभी
अल्ताफ़-ए-शहरयार के हैं नौहा-ख़्वाँ सभी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मर्द-ओ-ज़न पीर-ओ-जवाँ इन के मज़ालिम के शिकार
ख़ून-ए-मासूम में डूबी हुई इन की तलवार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मुंतख़ब हम ने किया था एक मीर-ए-कारवाँ
वो बढ़ा जिस सम्त हर पीर-ओ-जवाँ बढ़ता गया