aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kahiye"
गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शामधुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रातऔर मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगीऔर उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हातउन का आँचल है कि रुख़्सार कि पैराहन हैकुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगींजाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाँव मेंटिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहींआज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगीवही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीररंग-ए-रुख़्सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का ग़ुबारसंदली हाथ पे धुंदली सी हिना की तहरीरअपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यहीजान-ए-मज़मूँ है यही शाहिद-ए-मअ'नी है यहीआज तक सुर्ख़ ओ सियह सदियों के साए के तलेआदम ओ हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है?मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई मेंहम पे क्या गुज़रेगी अज्दाद पे क्या गुज़री है?इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती हैये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती हैये हर इक सम्त पुर-असरार कड़ी दीवारेंजल-बुझे जिन में हज़ारों की जवानी के चराग़ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहेंजिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगेलेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंटहाए उस जिस्म के कम्बख़्त दिल-आवेज़ ख़ुतूतआप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
इस मुलाक़ात का इस बार कोई वहम नहींजिस से इक और मुलाक़ात की सूरत निकलेअब न हैजान ओ जुनूँ का न हिकायात का वक़्तअब न तजदीद-ए-वफ़ा का न शिकायात का वक़्तलुट गई शहर-ए-हवादिस में मता-ए-अल्फ़ाज़अब जो कहना है तो कैसे कोई नौहा कहिएआज तक तुम से रग-ए-जाँ के कई रिश्ते थेकल से जो होगा उसे कौन सा रिश्ता कहिए
जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँफूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँआँखें परी-रुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँसीने उपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँजितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से जिस का नाक तलक पेट है भराकरता परे है क्या वो उछल कूद जा-ब-जादीवार फाँद कर कोई कोठा उछल गयाठट्ठा हँसी शराब सनम साक़ी इस सिवासौ सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँजिस जा पे हाँडी चूल्हा तवा और तनूर हैख़ालिक़ की क़ुदरतों का उसी जा ज़ुहूर हैचूल्हे के आगे आँच जो चलती हुज़ूर हैजितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर हैइस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँआवे तवे तनूर का जिस जा ज़बाँ पे नामया चक्की चूल्हे के जहाँ गुलज़ार हों तमामवाँ सर झुका के कीजे ङंङवत और सलामइस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मक़ामपहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँइन रोटियों के नूर से सब दिल हैं बोर बोरआटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूरपेङ़ा हर एक उस का है बर्फ़ी ओ मोती चूरहरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूरइस आग को मगर ये बुझाती हैं रोटियाँपूछा कसी ने ये किसी कामिल फ़क़ीर सेये मेहर-ओ-माह हक़ ने बनाए हैं काहे केवो सुन के बोला बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर देहम तो न चाँद समझें न सूरज हैं जानतेबाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँफिर पूछा उस ने कहिए ये है दिल का तूर क्याइस के मुशाहिदे में है खुलता ज़ुहूर क्यावो बोला सुन के तेरा गया है शुऊ'र क्याकश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-क़ुबूर क्याजितने हैं कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी जब आई पेट में सौ क़ंद घुल गएगुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गएदो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गएचौदह तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गएये कश्फ़ ये कमाल दिखाती हैं रोटियाँरोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न होमेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न होभूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न होसच है कहा कसी ने कि भूके भजन न होअल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँअब आगे जिस के माल-पूए भर के थाल हैंपूरे भगत उन्हें कहो साहब के लाल हैंऔर जिन के आगे रोग़नी और शीर-माल हैंआरिफ़ वही हैं और वही साहब-कमाल हैंपक्की-पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँकपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्तेलम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्तेबाँधे कोई रुमाल हैं रोटी के वास्तेसब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्तेजितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से नाचे प्यादा क़वाएद दिखा दिखाअसवार नाचे घोड़े को कावा लगा लगाघुंघरू को बाँधे पैक भी फिरता है नाचताऔर इस सिवा जो ग़ौर से देखा तो जा-ब-जासौ सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँरोटी के नाच तो हैं सभी ख़ल्क़ में पड़ेकुछ भाँड भीगते ये नहीं फिरते नाचतेये रंडियाँ जो नाचे हैं घूँघट को मुँह पे लेघूँघट न जानो दोस्तो तुम ज़ीनहार उसेइस पर्दे में ये अपने कमाती हैं रोटियाँअशराफ़ों ने जो अपनी ये ज़ातें छुपाई हैंसच पूछिए तो अपनी ये शानें बढ़ाई हैंकहिए उन्हों की रोटियाँ किस किस ने खाई हैंअशराफ़ सब में कहिए तो अब नान-बाई हैंजिन की दुकाँ से हर कहीं जाती हैं रोटियाँदुनिया में अब बदी न कहीं और निकोई हैया दुश्मनी ओ दोस्ती या तुंद-ख़ूई हैकोई किसी का और किसी का न कोई हैसब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई हैनौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँरोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीररूखी ही रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीरया पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीरगेहूँ जवार बाजरे की जैसी हो 'नज़ीर'हम को तो सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ
लोग कहते हैं मगर आप अभी तक चुप हैंआप भी कहिए ग़रीबों में शराफ़त कैसी
देखना जज़्ब-ए-मोहब्बत का असर आज की रातमेरे शाने पे है उस शोख़ का सर आज की रातऔर क्या चाहिए अब ऐ दिल-ए-मजरूह तुझेउस ने देखा तो ब-अंदाज़-ए-दिगर आज की रातफूल क्या ख़ार भी हैं आज गुलिस्ताँ-ब-कनारसंग-रेज़े हैं निगाहों में गुहर आज की रातमहव-ए-गुलगश्त है ये कौन मिरे दोश-ब-दोशकहकशाँ बन गई हर राहगुज़र आज की रातफूट निकला दर-ओ-दीवार से सैलाब-ए-नशातअल्लाह अल्लाह मिरा कैफ़-ए-नज़र आज की रातशब्नमिस्तान-ए-तजल्ली का फ़ुसूँ क्या कहिएचाँद ने फेंक दिया रख़्त-ए-सफ़र आज की रातनूर ही नूर है किस सम्त उठाऊँ आँखेंहुस्न ही हुस्न है ता-हद्द-ए-नज़र आज की रातक़स्र-ए-गीती में उमँड आया है तूफ़ान-ए-हयातमौत लर्ज़ां है पस-ए-पर्दा-ए-दर आज की रातअल्लाह अल्लाह वो पेशानी-ए-सीमीं का जमालरह गई जम के सितारों की नज़र आज की रातआरिज़-ए-गर्म पे वो रंग-ए-शफ़क़ की लहरेंवो मिरी शोख़-निगाही का असर आज की रातनर्गिस-ए-नाज़ में वो नींद का हल्का सा ख़ुमारवो मिरे नग़्म-ए-शीरीं का असर आज की रातनग़्मा ओ मय का ये तूफ़ान-ए-तरब क्या कहिएघर मिरा बन गया 'ख़य्याम' का घर आज की रातमेरी हर साँस पे वो उन की तवज्जोह क्या ख़ूबमेरी हर बात पे वो जुम्बिश-ए-सर आज की रातवो तबस्सुम ही तबस्सुम का जमाल-ए-पैहमवो मोहब्बत ही मोहब्बत की नज़र आज की रातउफ़ वो वारफ़्तगी-ए-शौक़ में इक वहम-ए-लतीफ़कपकपाए हुए होंटों पे नज़र आज की रातमज़हब-ए-इश्क़ में जाएज़ है यक़ीनन जाएज़चूम लूँ मैं लब-ए-लालीं भी अगर आज की रातअपनी रिफ़अत पे जो नाज़ाँ हैं तो नाज़ाँ ही रहेंकह दो अंजुम से कि देखें न इधर आज की रातउन के अल्ताफ़ का इतना ही फ़ुसूँ काफ़ी हैकम है पहले से बहुत दर्द-ए-जिगर आज की रात
हमला जब क़ौम-ए-आर्या ने कियाऔर बजा उन का हिन्द में डंकामुल्क वाले बहुत से काम आएजो बचे वो ग़ुलाम कहलाएशुद्र कहलाए राक्षस कहलाएरंज परदेस के मगर न उठाएगो ग़ुलामी का लग गया धब्बान छुटा उन से देस पर न छुटा
वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियमवो मख़मूर आँखें वो गेसू-ए-पुर-ख़मवो अर्ज़-ए-कलीसा की इक माह-पारावो दैर-ओ-हरम के लिए इक शरारावो फ़िरदौस-ए-मरियम का इक ग़ुंचा-ए-तरवो तसलीस की दुख़्तर-ए-नेक-अख़्तरवो इक नर्स थी चारा-गर जिस को कहिएमदावा-ए-दर्द-ए-जिगर जिस को कहिएजवानी से तिफ़्ली गले मिल रही थीहवा चल रही थी कली खिल रही थीवो पुर-रोब तेवर वो शादाब चेहरामता-ए-जवानी पे फ़ितरत का पहरामिरी हुक्मरानी है अहल-ए-ज़मीं परये तहरीर था साफ़ उस की जबीं परसफ़ेद और शफ़्फ़ाफ़ कपड़े पहन करमिरे पास आती थी इक हूर बन करवो इक आसमानी फ़रिश्ता थी गोयाकि अंदाज़ था उस में जिब्रईल का सावो इक मरमरीं हूर ख़ुल्द-ए-बरीं कीवो ताबीर आज़र के ख़्वाब-ए-हसीं कीवो तस्कीन-ए-दिल थी सुकून-ए-नज़र थीनिगार-ए-शफ़क़ थी जमाल-ए-नज़र थीवो शो'ला वो बिजली वो जल्वा वो परतवसुलैमाँ की वो इक कनीज़-ए-सुबुक-रौकभी उस की शोख़ी में संजीदगी थीकभी उस की संजीदगी में भी शोख़ीघड़ी चुप घड़ी करने लगती थी बातेंसिरहाने मिरे काट देती थी रातेंअजब चीज़ थी वो अजब राज़ थी वोकभी सोज़ थी वो कभी साज़ थी वोनक़ाहत के आलम में जब आँख उठतीनज़र मुझ को आती मोहब्बत की देवीवो उस वक़्त इक पैकर-ए-नूर होतीतख़य्युल की पर्वाज़ से दूर होतीहंसाती थी मुझ को सुलाती थी मुझ कोदवा अपने हाथों से मुझ को पिलातीअब अच्छे हो हर रोज़ मुज़्दा सुनातीसिरहाने मिरे एक दिन सर झुकाएवो बैठी थी तकिए पे कुहनी टिकाएख़यालात-ए-पैहम में खोई हुई सीन जागी हुई सी न सोई हुई सीझपकती हुई बार बार उस की पलकेंजबीं पर शिकन बे-क़रार उस की पलकेंवो आँखों के साग़र छलकते हुए सेवो आरिज़ के शोले भड़कते हुए सेलबों में था लाल-ओ-गुहर का ख़ज़ानानज़र आरिफ़ाना अदा राहिबानामहक गेसुओं से चली आ रही थीमिरे हर नफ़स में बसी जा रही थीमुझे लेटे लेटे शरारत की सूझीजो सूझी भी तो किस क़यामत की सूझीज़रा बढ़ के कुछ और गर्दन झुका लीलब-ए-लाल-ए-अफ़्शाँ से इक शय चुरा लीवो शय जिस को अब क्या कहूँ क्या समझिएबेहिश्त-ए-जवानी का तोहफ़ा समझिएशराब-ए-मोहब्बत का इक जाम-ए-रंगींसुबू-ज़ार-ए-फ़ितरत का इक जाम-ए-रंगींमैं समझा था शायद बिगड़ जाएगी वोहवाओं से लड़ती है लड़ जाएगी वोमैं देखूँगा उस के बिफरने का आलमजवानी का ग़ुस्सा बिखरने का आलमइधर दिल में इक शोर-ए-महशर बपा थामगर उस तरफ़ रंग ही दूसरा थाहँसी और हँसी इस तरह खिलखिला करकि शम-ए-हया रह गई झिलमिला करनहीं जानती है मिरा नाम तक वोमगर भेज देती है पैग़ाम तक वोये पैग़ाम आते ही रहते हैं अक्सरकि किस रोज़ आओगे बीमार हो कर
आज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आतीं हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पहनाईऔर चाँद रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआज़माने निकलेंगेआरज़ू की गहराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
इक नन्ही मुन्नी सी पुजारनपतली बाँहें पतली गर्दनभोर भए मंदिर आई हैआई नहीं है माँ लाई हैवक़्त से पहले जाग उठी हैनींद अभी आँखों में भरी हैठोड़ी तक लट आई हुई हैयूँही सी लहराई हुई हैआँखों में तारों की चमक हैमुखड़े पे चाँदी की झलक हैकैसी सुंदर है क्या कहिएनन्ही सी इक सीता कहिएधूप चढ़े तारा चमका हैपत्थर पर इक फूल खिला हैचाँद का टुकड़ा फूल की डालीकम-सिन सीधी भोली भालीहाथ में पीतल की थाली हैकान में चाँदी की बाली हैदिल में लेकिन ध्यान नहीं हैपूजा का कुछ ज्ञान नहीं हैकैसी भोली छत देख रही हैमाँ बढ़ कर चुटकी लेती हैचुपके चुपके हँस देती हैहँसना रोना उस का मज़हबउस को पूजा से क्या मतलबख़ुद तो आई है मंदिर मेंमन उस का है गुड़िया-घर में
शहर-ए-दिल की गलियों मेंशाम से भटकते हैंचाँद के तमन्नाईबे-क़रार सौदाईदिल-गुदाज़ तारीकीजाँ-गुदाज़ तन्हाईरूह-ओ-जाँ को डसती हैरूह-ओ-जाँ में बस्ती हैशहर-ए-दिल की गलियों मेंताक शब की बेलों परशबनमीं सरिश्कों कीबे-क़रार लोगों नेबे-शुमार लोगों नेयादगार छोड़ी हैइतनी बात थोड़ी हैसद-हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रा'नाईउन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ थाआज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आती हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पिन्हाईऔर चाँद-रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआरज़ू की गीराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
मेरी ज़ुल्फ़ों मिरे काजल की न बातें करिएकुछ मिरे ज़ौक़-ओ-ज़ेहानत को भी अच्छा कहिए
जान पर आ बनी है क्या कहिएअपनी क़िस्मत बुरी है क्या कहिए
मेरे कमरे में उतर आई ख़मोशी फिर सेसाया-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ की तरहशोरिश-ए-दीदा-ए-गिर्याँ की तरहमौसम-ए-कुंज-ए-बयाबाँ की तरहकितना बे-नुत्क़ है यादों का हुजूमजैसे होंटों की फ़ज़ा यख़-बस्ताजैसे लफ़्ज़ों को गहन लग जाएजैसे रूठे हुए रस्तों के मुसाफ़िर चुप-चापजैसे मरक़द के सिरहाने कोई ख़ामोश चराग़जैसे सुनसान से मक़्तल की सलीबजैसे कजलाई हुई शब का नसीबमेरे कमरे में उतर आई ख़मोशी फिर सेफिर से ज़ख़्मों की क़तारें जागींअव्वल-ए-शाम-ए-चराग़ाँ की तरहहर नए ज़ख़्म ने फिर याद दिलाया मुझ कोइसी कमरे में कभीमहफ़िल-ए-अहबाब के साथगुनगुनाते हुए लम्हों के शजर फैलते थेरक़्स करते हुए जज़्बों के दहकते लम्हेक़र्या-ए-जाँ में लहू की सूरतशम-ए-वादा की तरह जलते थेसाँस लेती थी फ़ज़ा में ख़ुश्बूआँख में गुलबन-ए-मर्जां की तरहसाँस के साथ गुहर ढलते थेआज क्या कहिए कि ऐसा क्यूँ हैशाम चुप-चापफ़ज़ा यख़-बस्तादिल मिरा दिल कि समुंदर की तरह ज़िंदा थातेरे होते हुए तन्हा क्यूँ हैतो कि ख़ुद चश्मा-ए-आवाज़ भी हैमेरी महरम मिरी हमराज़ भी हैतेरे होते हुए हर सम्त उदासी कैसीशाम चुप-चापफ़ज़ा यख़-बस्तादिल के हमराह बदन टूट रहा हो जैसेरूह से रिश्ता-ए-जाँ छूट रहा हो जैसेऐ कि तू चश्मा-ए-आवाज़ भी हैहासिल-ए-नग़्मगी-ए-साज़ भी हैलब-कुशा हो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िगारइस से पहले कि शिकस्ता-दिल मेंबद-गुमानी की कोई तेज़ किरन चुभ जाएइस से पहले कि चराग़-ए-वा'दायक-ब-यक बुझ जाएलब-कुशा हो कि फ़ज़ा में फिर सेजलते लफ़्ज़ों के दहकते जुगनूतैर जाएँ तो सुकूत-ए-शब-ए-उर्यां टूटेफिर कोई बंद-ए-गरेबाँ टूटेलब-कुशा हो कि मिरी नस नस मेंज़हर भर दे न कहींवक़्त की ज़ख़्म-फ़रोशी फिर सेलब-कुशा हो कि मुझे डस लेगीख़ुद-फ़रामोशी फिर सेमेरे कमरे में उतर आईख़मोशी फिर से
ये गुल-कदा कहिए जिसे फ़िरदौस का ख़ाकाहै दफ़्न यहीं ख़ाक में सरमाया वफ़ा का
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
है दुनिया जिस का नाँव मियाँ ये और तरह की बस्ती हैजो मंहगों को ये महँगी है और सस्तों को ये सस्ती हैयाँ हर-दम झगड़े उठते हैं हर-आन अदालत बस्ती हैगर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो और किसी का मान रखे तो उस को भी अरमान मिलेजो पान खिला दे पान मिले जो रोटी दे तो नान मिलेनुक़सान करे नुक़सान मिले एहसान करे एहसान मिलेजो जैसा जिस के साथ करे फिर वैसा उस को आन मिलेकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो और किसी की जाँ बख़्शे तो उस की भी हक़ जान रखेजो और किसी की आन रखे तो उस की भी हक़ आन रखेजो याँ का रहने वाला है ये दिल में अपने जान रखेये तुरत-फिरत का नक़्शा है इस नक़्शे को पहचान रखेकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो पार उतारे औरों को उस की भी पार उतरनी हैजो ग़र्क़ करे फिर उस को भी डुबकों डुबकों करनी हैशमशीर तबर बंदूक़ सिनाँ और नश्तर तीर नहरनी हैयाँ जैसी जैसी करनी है फिर वैसी वैसी भरनी हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो इस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो ऊपर ऊँचा बोल करे तो उस का बोल भी बाला हैऔर दे पटके तो उस को भी कोई और पटकने वाला हैबे-ज़ुल्म-ओ-ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़बह कर डाला हैउस ज़ालिम के भी लोहू का फिर बहता नद्दी-नाला हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो मिस्री और के मुँह में दे फिर वो भी शक्कर खाता हैजो और तईं अब टक्कर दे फिर वो भी टक्कर खाता हैजो और को डाले चक्कर में फिर वो भी चक्कर खाता हैजो और को ठोकर मार चले फिर वो भी ठोकर खाता हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो और किसी को नाहक़ में कोई झूटी बात लगाता हैऔर कोई ग़रीब और बेचारा हक़ ना-हक़ में लुट जाता हैवो आप भी लूटा जाता है और लाठी-पाठी खाता हैजो जैसा जैसा करता है फिर वैसा वैसा पाता हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैजो और की पगड़ी ले भागे उस का भी ओर उचक्का हैजो और पे चौकी बिठलावे उस पर भी धोंस-धड़क्का हैयाँ पुश्ती में तो पुश्ती है और धक्के में याँ धक्का हैक्या ज़ोर मज़े का जमघट है क्या ज़ोर ये भीड़-भड़क्का हैकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती हैहै खटका उस के हाथ लगा जो और किसी को दे खटकाऔर ग़ैब से झटका खाता है जो और किसी के दे झटकाचीरे के बीच में चीरा है और पटके बीच जो है पटकाक्या कहिए और 'नज़ीर' आगे है ज़ोर तमाशा झट-पटकाकुछ देर नहीं अंधेर नहीं इंसाफ़ और अदल-परस्ती हैइस हाथ करो उस हाथ मिले याँ सौदा दस्त-ब-दस्ती है
एक आया गया दूसरा आएगा देर से देखता हूँ यूँही रात उस की गुज़र जाएगीमैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिए मुझ को क्या काम है याद आता नहीं याद भी टिमटिमाताहुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुई और झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा हैमगर मेरे कानों ने कैसे उसे सुन लिया एक आँधी चली चल के मिटभी गई आज तक मेरे कानों में मौजूद है साएँ साएँ मचलती हुई औरउबलती हुई फैलती फैलती देर से मैं खड़ा हूँ यहाँ एक आया गयादूसरा आएगा रात उस की गुज़र जाएगी एक हंगामा बरपा है देखें जिधरआ रहे हैं कई लोग चलते हुए और टहलते हुए और रुकते हुए फिर सेबढ़ते हुए और लपकते हुए आ रहे जा रहे हैं इधर से उधर और उधर सेइधर जैसे दिल में मिरे ध्यान की लहर से एक तूफ़ान है वैसे आँखेंमिरी देखती ही चली जा रही हैं कि इक टिमटिमाते दिए की किरन ज़िंदगी को फिसलतेहुए और गिरते हुए ढब से ज़ाहिर किए जा रही है मुझे ध्यानआता है अब तीरगी इक उजाला बनी है मगर इस उजाले से रिसती चली जा रहीहैं वो अमृत की बूँदें जिन्हें मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहा हूँ हथेलीमगर टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई थी लपक से उजाला हुआ लौ गिरी फिर अंधेरा साछाने लगा बैठता बैठता बैठ कर एक ही पल में उठता हुआ जैसे आँधी केतीखे थपेड़ों से दरवाज़े के ताक़ खुलते रहें बंद होते रहेंफड़फड़ाते हुए ताइर-ए-ज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद मैं देखता ही रहा एक आयागया दूसरा आएगा सोच आई मुझे पाँव बढ़ने से इंकार करतेगए मैं खड़ा ही रहा दिल में इक बूँद ने ये कहा रात यूँही गुज़र जाएगीदिल की इक बूँद को आँख में ले के मैं देखता ही रहा फड़फड़ाते हुए ताइरज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद दरवाज़े के ताक़ इक बार जब मिल गए मुझ को आहिस्ता आहिस्ताएहसास होने लगा अब ये ज़ख़्मी परिंदा न तड़पेगा लेकिन मिरे दिल को हर वक़्ततड़पाएगा मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहूँगा वो अमृत की बूँदें जिन्हें आँखसे मेरी रिस्ना था लेकिन मिरी ज़िंदगी टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुईऔर झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा है कि इस तीरगी में कोई बात ऐसी नहींजिस को पहले अंधेरे में देखा हो मैं ने सफ़र ये उजाले अंधेरे का चलतारहा है तो चलता रहेगा यही रस्म है राह की एक आया गया दूसराआएगा रात ऐसे गुज़र जाएगी टिमटिमाते सितारे बताते थे रस्ते कीनद्दी बही जा रही है बहे जा इस उलझन से ऐसे निकल जा कोई सीधा मंज़िल पे जाताथा लेकिन कई क़ाफ़िले भूल जाते थे अंजुम के दौर-ए-यगाना के मुबहम इशारे मगर वोभी चलते हुए और बढ़ते हुए शाम से पहले ही देख लेते थे मक़्सूद का बंददरवाज़ा खुलने लगा है मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ मुझ को क्या काम है मेरा दरवाज़ाखुलता नहीं है मुझे फैले सहरा की सोई हुई रेग का ज़र्रा ज़र्रा यही कह रहा हैके ऐसे ख़राबे में सूखी हथेली है इक ऐसा तलवा के जिस को किसी ख़ार की नोक चुभने पे भीकह नहीं सकती मुझ को कोई बूँद अपने लहू की पिला दो मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिएकाम कोई नहीं है तो मैं भी इन आते हुए और जाते हुए एक दो तीनलाखों बगूलों में मिल कर यूँही चलते चलते कहीं डूब जाता के जैसे यहाँबहती लहरों में कश्ती हर एक मौज को थाम लेती है अपनी हथेली के फैले कँवलमें मुझे ध्यान आता नहीं है कि इस राह में तो हर इक जाने वाले के बसमें है मंज़िल मैं चल दूँ चलूँ आइए आइए आप क्यूँ इस जगहऐसे चुप-चाप तन्हा खड़े हैं अगर आप कहिए तो हम इक अछूती सी टहनी सेदो फूल बस बस मुझे इस की कोई ज़रूरत नहीं है मैं इकदोस्त का रास्ता देखता हूँ मगर वो चला भी गया है मुझे फिर भीतस्कीन आती नहीं है कि मैं एक सहरा का बाशिंदा मालूम होने लगा हूँ ख़ुदअपनी नज़र में मुझे अब कोई बंद दरवाज़ा खुलता नज़र आए ये बात मुमकिन नहीं हैमैं इक और आँधी का मुश्ताक़ हूँ जो मुझे अपने पर्दे में यकसर छुपा लेमुझे अब ये महसूस होने लगा है सुहाना समाँ जितना बस में था मेरेवो सब एक बहता सा झोंका बना है जिसे हाथ मेरे नहीं रोक सकतेकि मेरी हथेली में अमृत की बूँदें तो बाक़ी नहीं हैं फ़क़त एक फैला हुआख़ुश्क बे-बर्ग बे-रंग सहरा है जिस में ये मुमकिन नहीं मैं कहूँएक आया गया दूसरा आएगा रात मेरी गुज़र जाएगी
दिल वो सहरा थाकि जिस सहरा मेंहसरतेंरेत के टीलों की तरह रहती थींजब हवादिस की हवाउन को मिटाने के लिएचलती थीयहाँ मिटती थींकहीं और उभर आती थींशक्ल खोते हीनई शक्ल में ढल जाती थींदिल के सहरा पे मगर अब की बारसानेहा गुज़रा कुछ ऐसाकि सुनाए न बनेआँधी वो आई कि सारे टीलेऐसे बिखरेकि कहीं और उभर ही न सकेयूँ मिटे हैंकि कहीं और बनाए न बनेअब कहींटीले नहींरेत नहींरेत का ज़र्रा नहींदिल में अब कुछ नहींदिल को सहरा भी अगर कहिएतो कैसे कहिए
किस से इस दर्द-ए-जुदाई की शिकायत कहिएयाँ तो सीने में नियस्तां का नियस्तां होगाकिस से इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिएसुनने वाला भी जो हैराँ नहीं, हैराँ होगाऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनीसूनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजलख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनीये शब-ए-माह भी कट जाएगी बे-कल बे-कल
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