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नज़्म
लिल्लाहिल-हम्द ब-अनजाम-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ
कलमा-ए-शुक्र ब-नाम-ए-लब-ए-शीरीं-दहनाँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जबकि जारी हो ज़बानों पर ये कलमा सुब्ह ओ शाम
नग़्मा-हा-ए-साज़ से बढ़ कर है जो मोजज़ निज़ाम
सफ़ीर काकोरवी
नज़्म
कुछ और नहीं तो आज शहादत का कलमा सुनने को मिलेगा
कानों के इक सदी पुराने क़ुफ़्ल खुलेंगे
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
कलमा-ए-हक़ कहा
मक़्तलों क़ैद-ख़ानों सलीबों में बहता लहू उन के होने का ऐलान करता रहा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
दा'वा तो ये है हम भी मुसलमान हैं ज़रूर
कलमा जो पोछिए तो नहीं याद है हुज़ूर
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
नज़्म
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं