aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kalol"
ये तन जो है हर इक के उतारे का झोंपड़ाइस से है अब भी सब के सहारे का झोंपड़ाइस से है बादशह के नज़ारे का झोंपड़ाइस में ही है फ़क़ीर बिचारे का झोंपड़ाअपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस में ही भोले-भाले इसी में सियाने हैंइस में ही होशियार इसी में दिवाने हैंइस में ही दुश्मन इस में ही अपने बेगाने हैंशा-झोंपड़ा भी अपने इसी में नमाने हैंअपना न मोल है न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस में ही लोग इश्क़-ओ-मोहब्बत के मारे हैंइस में ही शोख़ हुस्न के चाँद और सितारे हैंइस में ही यार-दोस्त इसी में पियारे हैंशा-झोंपड़ा भी अपने इसी में बिचारे हैंअपना न मोल है न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस में ही अहल-ए-दौलत-ओ-मुनइम अमीर हैंइस में ही रहते सारे जहाँ के फ़क़ीर हैंइस में ही शाह और इसी में वज़ीर हैंइस में ही हैं सग़ीर इसी में कबीर हैंइतना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस में ही चोर-ठग हैं इसी में अमोल हैंइस में ही रोनी शक्ल इसी में ढिढोल हैंइस में ही बाजे और नक़ारे-ओ-ढोल हैंशा-झोंपड़ा भी इस में ही करते कलोल हैंइतना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस में ही पारसा हैं इसी में लवंद हैंबेदर्द भी इसी में है और दर्दमंद हैंइस में ही सब परंद इसी में चरंद हैंशा-झोंपड़ा भी अब इसी डर बे बंद हैंइतना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ाइस झोंपड़े में रहते हैं सब शाह और वज़ीरइस में वकील बख़्शी ओ मुतसद्दी और अमीरइस में ही सब ग़रीब हैं इस में ही सब फ़क़ीरशा-झोंपड़ा जो कहते हैं सच है मियाँ 'नज़ीर'इतना न मोल का न इजारे का झोंपड़ाबाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा
तुम आज हज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तन्हाई मेंया बज़्म-ए-तरब-आराई मेंमेरे सपने बुनती होंगी बैठी आग़ोश पराई मेंऔर मैं सीने में ग़म ले कर दिन-रात मशक़्क़त करता हूँजीने की ख़ातिर मरता हूँअपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँमजबूर हूँ मैं मजबूर हो तुम मजबूर ये दुनिया सारी हैतन का दुख मन पर भारी हैइस दौर में जीने की क़ीमत या दार-ओ-रसन या ख़्वारी हैमैं दार-ओ-रसन तक जा न सका तुम जेहद की हद तक आ न सकींचाहा तो मगर अपना न सकींहम तो दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िल-ए-तस्कीं पा न सकेंजीने को जिए जाते हैं मगर साँसों में चिताएँ जलती हैंख़ामोश वफ़ाएँ जलती हैंसंगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैंऔर आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैंफिर दो दिल मिलने आए हैंफिर मौत की आँधी उट्ठी है फिर जंग के बादल छाए हैंमैं सोच रहा हूँ इन का भी अपनी ही तरह अंजाम न होइन का भी जुनूँ नाकाम न होइन के भी मुक़द्दर में लिखी इक ख़ून में लिथड़ी शाम न होसूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझेहमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सकामगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाएहमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिलीउन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाएबहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत काकि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँबहुत दिनों से ये है ख़ब्त हुक्मरानों काकि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँबहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैंबहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों मेंनिगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती हैचलो कि आज सभी पाएमाल रूहों सेकहें कि अपने हर इक ज़ख़्म को ज़बाँ कर लेंहमारा राज़ हमारा नहीं सभी का हैचलो कि सारे ज़माने को राज़-दाँ कर लेंचलो कि चल के सियासी मुक़ामिरों से कहेंकि हम को जंग-ओ-जदल के चलन से नफ़रत हैजिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आएहमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत हैकहो कि अब कोई क़ातिल अगर इधर आयातो हर क़दम पे ज़मीं तंग होती जाएगीहर एक मौज-ए-हवा रुख़ बदल के झपटेगीहर एक शाख़ रग-ए-संग होती जाएगीउठो कि आज हर इक जंग-जू से ये कह देंकि हम को काम की ख़ातिर कलों की हाजत हैहमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक़ नहींहमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत हैकहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख़ न करेअब इस जगह कोई कुँवारी न बेची जाएगीये खेत जाग पड़े उठ खड़ी हुईं फ़स्लेंअब इस जगह कोई क्यारी न बेची जाएगीये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक कीइस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभीहमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिएहमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभीकहो कि आज भी हम सब अगर ख़मोश रहेतो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहींजुनूँ की ढाली हुई एटमी बलाओं सेज़मीं की ख़ैर नहीं आसमाँ की ख़ैर नहींगुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएँगुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जाएँतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
मिरी याद तुम को भी आती तो होगीगुज़िश्ता मोहब्बत सताती तो होगी
गुलाल अबीर से कितने भरे हैं चौपाएतमाम हाथों में गड़वे भी रंग के लाएकोई कहे है किसी से कि हम भी लो आएतो उस से कहता वो हँस कर कि आ मिरे जाएहँसी ख़ुशी का है क़ाल-ओ-मक़ाल होली में
हड़ताल करने से न टलो मैं नशे में हूँऐ ग़ैर-मुलकियों की कलो मैं नशे में हूँमेरा जुलूस ले के चलो मैं नशे में हूँफिर ख़ाक सब के मुँह पे मलो मैं नशे में हूँ''यारो मुझे माफ़ रखो मैं नशे में हूँ''''अब दो तो जाम ख़ाली ही दो मैं नशे में हूँ''
इतनी गुज़री है गिराँ चीज़ों की अर्ज़ानी मुझेहो गया है ताज़ा सौदा-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझेदूध में बिल्कुल नज़र आता नहीं पानी मुझेदिल ने कर रक्खा है महव-ए-सद-परेशानी मुझे''एे ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''काम धंदा कुछ नहीं दिल किस तरह बहलाऊँ मैंक्यूँ न लीडर बन के सारी क़ौम को बहकाऊँ मैंजब नहीं धंदा तो चंदा ही करूँ और खाऊँ मैंस्क्रीनिंग की कमेटी के न हाथ आ जाऊँ मैं''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''क्यूँ न एडीटर बनूँ अख़बार-ए-गौहर-बार काऔर क़लम को रूप दूँ चलती हुई तलवार काहाथ में शमला हो सब अशराफ़ की दस्तार कामार्शल-ला में मगर पहला है टुकड़ा मार का''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''सोचता हूँ फिर कि हज कर आऊँ स्मगलर बनूँमाल-ए-दीन ओ माल-ए-दुनिया का बड़ा डीलर बनूँमुल्क के अंदर बनूँ या मुल्क के बाहर बनूँअल-ग़रज़ जो कुछ बनूँ मैं फ़ौज से बच कर बनूँ''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''क्या ख़बर थी क़ीमतें यूँ होंगी सस्ती एक दिन''रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन''चोर-बाज़ारी की मिट जाएगी हस्ती एक दिनहोगी शेवरलेट पे भी टू-लेट की तख़्ती एक दिन''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''बहर के सीने से सोना तक उगलवाया गयागंदुम-ए-ख़ल्वत-नशीं बाज़ार में लाया गयाऔर ज़ख़ीरा-बाज़ से चक्की में पिसवाया गयानफ़अ-ख़ोरों का दिवाला तक निकलवाया गया''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''हाए कश्कोल-ए-गदाई ले के अब जाएगा कौनलाल गंदुम ला के हम कालों को खिलवाएगा कौनजिस को अमरीकी सुअर खाते थे वो खाएगा कौनसाथ में गंदुम के मिस्टर घुन को पिसवाएगा कौन''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''ग़ैर-मुल्की माल को रोती हैं अब तक बीबियाँऔर हर इम्पोर्ट के लाइसेंस को उन के मियाँग़ैर बैंकों में जो दौलत है वो आएगी यहाँ''याद थीं हम को भी रंगा-रंग बज़्म-आराइयाँ''''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''या मैं सब कुछ छोड़ दूँ और चोर-बाज़ारी करूँज़िंदगी की फ़िल्म में ऐसी अदाकारी करूँदोनों हाथों से कमा कर उज़्र-ए-नादारी करूँजब हुकूमत टेक्स माँगे आह और ज़ारी करूँ''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''
बहाए बैठी है आँसू लहू के चाँदनी-चौकक़रोल-बाग़ के दिल में क़रोलियों की नोक
बना है कोट ये नीलाम की दुकाँ के लिएसला-ए-आम है यारान-ए-नुक्ता-दाँ के लिएबड़ा बुज़ुर्ग है ये आज़मूदा-कार है येकिसी मरे हुए गोरे की यादगार है येन देख कुहनियों पे इस की ख़स्ता-सामानीपहन चुके हैं इसे तुर्क और ईरानीबड़ा बुज़ुर्ग है ये गो क़लील क़ीमत हैमियाँ बुज़ुर्गों का साया बड़ा ग़नीमत हैजो क़द्र-दान हैं वो जानते हैं क़ीमत कोकि आफ़्ताब चुरा ले गया है रंगत कोये कोट कोटों की दुनिया का बावा-आदम हैअगरचे है वो निगह जो निगाह से कम हैगुज़िश्ता सदियों की तारीख़ का वरक़ है ये कोटख़रीदो इस को कि इबरत का इक सबक़ है ये कोट
तवील रातें कि मुख़्तसर दिनकसीर वादे क़लील उम्रेंअबस हिसाब-ओ-शुमार उस का जो गोश्त इस साल नाख़ुनों से जुदा हुआ हैसिकुड़ते लम्हे की एक सरहद से ता-ब-हद्द-ए-दिगर वही कार-ए-सत्र-पोशीवो मू-ए-तन हो कि तार-ए-पंबा कि बाल-ओ-पर अक्स-ए-आईना केहर एक कतरन पे ज़र्दियाँ बाँटने दरख़्तों के फ़ैसले हैंउदास पत्ताख़िज़ाँ का पानी नए मआ'नी नहीं समझतासो नहर अब तक पुराने पहरे में चल रही है
तुझे ए'तिबार-ए-सहर भी हैतुझे इंतिज़ार-ए-बहार भीमगर ऐ सदा-ए-उमीद-ए-दिलमिरी ज़िंदगी तो क़लील है
न जाने क्यूँ ये लग रहा हैजैसे खो गया है कुछकभी ये लग रहा हैजैसे हम ने पा लिया है कुछवो क्या है जो कि खो गयावो क्या था जिस को पा लियाये बात मुश्तमिल हैएक अर्सा-ए-अक़ील परक़लंदर एक रू-नुमाहुआ था इक सबील परवो पहले इल्म-ओ-फ़न की पूरीप्यास को जगाता थासवाल पूछता था औरतिश्नगी बुझाता थावो कहता था कि ख़्वाब देखोजागती इन आँखों सेवो हारने के क़िस्से को हीपढ़ता था पढ़ाता थावो कहता था कि जीत के ये वाक़िएपयाम ही तो देते हैंमगर शिकस्त जाने कितनेरास्तों के कुछअलग अलग निशान देती है
चलो कि ज़हर के दरिया की सैर की जाएउसे मथें और अमृत की खोज की जाएअपने ख़ुद-ग़रज़ इरादों की बाट बट कर केकाएनात इक नई शुरूअ' की जाएवो जो दानवों को भस्म करती होजो देवताओं को इंसान करती होवो जिस में शिव को ज़हर पीना न पड़ेवो काएनात जो सब को समान करती होवो जिस में भेस राहु बदल न सकेबदल भी ले तो अमृत को पी न सकेवो जिस में कौरवों की ज़ात न होवो जिस में सीता कोई चुरा न सके
तवील रातख़ल्वतनीम-बाज़ आँखेंबोलती हिम्मतयास ता-हद्द-ए-नज़रफ़िराक़माज़ी की तल्ख़ यादेंफ़र्द-ए-बे-सिलसिलाएहसास-ए-कमतरीज़िंदगी इन से उबर पाएतो सोच पाऊँकि तुम कोजवाब क्या दूँ
शाम को चहचहातीलौटती चिड़िया कोये नहीं मा'लूम कि उस के बसेरे वाला पेड़काट दिया गया हैघोंसले में रक्खे उस के अंडे रौंद दिए गए हैंपेड़ वाली जगह पर मॉल बनाने की प्रक्रिया जारी हैलौटते लौटते चिड़िया को अंधेरा हो जाएगा औरजब वो घर ढूँडते ढूँडते भटकेगीतो अंदेशा ये है किखुले पड़े बिजली की तारों कोडालियाँ समझ करउन से टकरा करकहीं वो भस्म न हो जाएक्यूँकि ऐसा अक्सरदिहाड़ी मज़दूरों और अवैध कही जाने वाली चालोंके साथ भी होते देखा गया है
नश्रिया आल इंडिया रेडियो भोपाल इंदौर 8 जुलाई 68सजी हुई गुलों से ये हसीन वादियाँये सब्ज़ा-ज़ार-ए-ख़ुशनुमा हरी-भरी ये खेतियाँये नहरें जिन में ज़िंदगी भरे हुए है मस्तियाँये झिलमिलाती नद्दियाँ ये मुस्कुराती नद्दियाँये गाँव गाँव शहर शहर स्वर्ग के समान हैंमेरे अज़ीम देश की ये बस्तियाँ महान हैंजगह जगह विकास की उभर रही है रौशनीनई अदा से करवटें बदल रही है ज़िंदगीमहक उठी रविश रविश चमक उठी गली गलीवो आज फूल बन गई जो कल थी अध-खिली कलीजो पस्तियाँ थीं कल वो अब उरूज-ए-आसमान हैंमिरे अज़ीम देश की ये बस्तियाँ महान हैंबुलंद ऊँची बिल्डिंगें ये जगमगाते रास्तेबसों के मोटरों के दौड़ते हुए ये सिलसिलेकलों की गड़गड़ाहटो में ज़िंदगी के वलवलेतरक़्क़ियों की खोज में रवाँ दवाँ ये क़ाफ़िलेमिरे वतन की रूह हैं मिरे चमन की जान हैंमिरे विशाल देश के भविष्य का निशान हैंहर एक फ़र्द इस चमन का आज पासबान हैक्लर्क या मजूर है जवान या किसान हैमिरा वतन अज़ीम है मिरा वतन महान हैये खेतियों का देश है मिलों का ये जहान हैये सर-बुलंद चिमनियाँ वतन की आन-बान हैंहरी भरी ये खेतियाँ मिरे चमन की शान हैं
ये है अलामत-ए-फ़िस्ताइयत गिराओ सेहमारे बच्चों के स्कूल से हटाओ इसेये ख़ूनी-क़िला का फाटक है या दहान-ए-जहीमफ़सील-ए-संग इबारत है ख़ूँ के धब्बों सेदिए लहूँ के फ़रोज़ाँ किए हुए हर ताक़है जिन के सामने ख़ीरा तला ओ गौहर ओ सीमसदा-ए-रक़्स निकलती हुई झरोंकों सेकिसी हसीना-ए-फ़िरऔन का महल जैसेसुतून मरमरीं अंगड़ाई ले के नींद में चूरलिबास-ए-बरहनगी में निहाँ क़लो-पत्रामियान-ए-नील कोई लाश देख कर हँस दे
बैठा था एक रोज़ मैं आँगन की धूप मेंआलम तमाम हल्क़ा-ए-दाम-ए-ख़याल थासरगोशियों में वक़्त सुनाता था बार बारक़िस्से क़दीम क़ैसर-ओ-किसरा की शान केकरता था वर्क़ वर्क़ हर इक दास्तान केमैं ने कहा कि हम-दम-ओ-हम-राज़-ओ-दीदा-वरमा-क़िस्सा-ए-सिकन्दर-ओ-दारा न ख़्वान्दा-एमकुछ ज़िक्र हो सबा का गुलों का शबाब कासाग़र का मय-कदे का सुराही का नाब काकुछ बात हो बहार की बाराँ की धूप कीख़ुशबू की चाँदनी की फ़ज़ाओं की रूप कीहो जाए कुछ मुशाहिदा-ए-हक़ की गुफ़्तुगूकुछ भूलने की फिर उसे पाने की जुस्तुजूकुछ पूछ मुझ से बाबत-ए-अफ़्क़ार-ए-दो-जहांअहवाल-ओ-इख़तियार-ओ-शिकायात-ए-दोस्तांजो जी में आए पूछमगर इतना याद रख''अज़ मा ब-जुज़ हिकायत-ए-मेहर-ओ-वफ़ा मपुर्स''बोला कि तू ''रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार''क्या जानता है बाबत-ए-इम्कान-ए-ज़िंदगीजीता है ज़िंदगी से पशेमान-ए-ज़िंदगीकुछ अपने दिल का हाल भी मालूम है तुझेये वहशतें ये दर्द ये तन्हाइयों का बोझये हिजरतें ये कर्ब ये बेज़ारियों का रोगये हसरतें ये रंज ये अफ़्सुर्दगी ये सोगसीना है दाग़ दाग़ जिगर लख़्त लख़्त हैतू ख़ुद कहाँ है और कहाँ तेरा बख़्त हैक़ुल्ज़ुम को एक क़तरे की ख़ातिर बहा दियाजो वक़्त ने दिया तुझे सब कुछ गँवा दियाएक बार मुड़ के देख कि क्या तेरा खो गयाजागा तिरा नसीब तो तू ख़ुद ही सो गयाअब हिज्र न विसाल न सौदा न सूद हैलम्हे से भी क़लील ये तेरा वजूद हैबाक़ी बचा है और क्या तेरे हिसाब में“नै हाथ बाग पर है न पा है रिकाब में''
टीका लगाऊँ माँग भी संदल से भर चुकूँदुल्हन बनूँ तो चाहिए जोड़ा सुहाग कामेहंदी रचेगी पोरों कहीं जा के दैर मेंकंघी करूँ तो चढ़ती है कालों की और लहरअफ़्शाँ है बख़्त भी कि रहा उन के फेर मेंकहती है साँझ भोर के अब घाट उतर चुकूँतुम बैठो मैं तो आई पे जी से गुज़र चुकूँइतने दिनों तो दिल की लगी ने ख़ुदाई कीपायल बजे तो बंसी की धुन नाच नाच उठेबद-नामियाँ करिश्मे मिरे देवता के हैंदीदे घुमा घुमा के कहीं क्यूँ न गोपियाँउन के चलन तो बिगड़े हुए इब्तिदा के हैंबिपता न होगी कल से लगाई बुझाई कीदहके शफ़क़ तू दहके चिता जग हँसाई की2चीख़ें सुन सुन के सभी नींद के माते जागेसामने दहकी हुई आग का पैकर देखाचल के दो-चार क़दम फिर से पलट कर जौलाँचीख़ें शो'लों के दहकने पे लपक उठती थींदूद के हल्क़े रवाँ होए फ़लक चर्ख़ ज़नाँसब ये समझे कि कोई ग़ूल-ए-बयाबानी हैयूँही लूका जो लगाने को निकल आया यहाँबाद-पा आग थी या लाल रसीली साड़ीछाया कालों की थी शो'लों की ज़बानों का धुआँयक-ब-यक कुंदनी बाहें भी उठीं चीख़ के साथकाँपते आए नज़र फूल से मेहंदी भरे हाथएक ने बढ़ के वहीं आग पे डाला पानीआग यूँ पानी की शह पाए तो दोज़ख़ न बनेजीते-जी अश्कों से क्या दिल की लगी बुझती थीआग पानी में लड़ाई जो चिता पर भी ठनेख़ाक डाली तो हुईं फिर कहीं मद्धम आँचेंबख़्त रुस्वा हो तो रुस्वाई बिना कैसे मनेपूछो जलने की तो जाने वही जिस तन लागेचीख़ें सुन सुन के
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