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नज़्म
बात सच ये है कि हम थे जिस ज़माने में जवाँ
ख़ानदानी क़सम की मंसूबा-बंदी थी कहाँ
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
इस का फिर विर्से में मिलना भी तअज्जुब-ख़ेज़ है
ख़ानदानी क़िस्म का दुख है हज़र-अंगेज़ है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
क्या रेनी ख़ंदक़ रन्द बड़े क्या ब्रिज कंगूरा अनमोला
गढ़ कोट रहकला तोप क़िला क्या शीशा दारू और गोला
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़ुशनुमा शहरों का बानी राज़-ए-फ़ितरत का सुराग़
ख़ानदान-ए-तेग़-ए-जौहर-दार का चश्म-ओ-चराग़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मगर मैं घर से ख़ानदान भर ख़ुशियों के लिए निकला हूँ
और वहाँ मेरा इंतिज़ार किया जा रहा है
सरवत हुसैन
नज़्म
फ़लक को क्या ख़बर ये ख़ाक-दाँ किस का नशेमन है
ग़रज़ अंजुम से है किस के शबिस्ताँ की निगहबानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मोहब्बत जब चमक उठती थी उस की चश्म-ए-ख़ंदाँ में
ख़मिस्तान-ए-फ़लक से नूर की सहबा छलकती थी