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नज़्म
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
ख़स्ता किरदारों का कुछ चूरा सा रह जाता है तह में
कोई नोकीला सा किरदार गुज़रता है रगों से तो ख़राशों
गुलज़ार
नज़्म
फ़ना में हुज़्न-दीदा ज़िंदगी ज़म होती जाती है
थकी नब्ज़ों की ख़स्ता ज़र्ब मद्धम होती जाती है
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
''एक सौत-ए-ख़स्ता-ओ-मौहूम साज़-ए-ज़ौक़ की''
''मुर्तइश सी एक आवाज़'' इंतिहा-ए-शौक़ की
जोश मलीहाबादी
नज़्म
शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं
हमारा जुर्म इतना है हवा-ख़्वाह-ए-चमन हम हैं