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नज़्म
मैं ने हर चंद ग़म-ए-इश्क़ को खोना चाहा
ग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दुनिया में समोना चाहा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
शेर की ख़ल्वत-ए-रंगीं थी परी-ख़ाना तिरा
मस्त ख़्वाबों के जज़ीरों में था काशाना तिरा
अख़्तर शीरानी
नज़्म
न जाए दिया मुझे इस नरक से बाहर न बनने दी कोई पहचान
उन के दबाव में ही तो मुझे खोना पड़ा मेरा ईमान