aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "lai"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
तुम अपने अक़ीदों के नेज़ेहर दिल में उतारे जाते होहम लोग मोहब्बत वाले हैंतुम ख़ंजर क्यूँ लहराते होइस शहर में नग़्मे बहने दोबस्ती में हमें भी रहने दोहम पालनहार हैं फूलों केहम ख़ुश्बू के रखवाले हैंतुम किस का लहू पीने आएहम प्यार सिखाने वाले हैंइस शहर में फिर क्या देखोगेजब हर्फ़ यहाँ मर जाएगाजब तेग़ पे लय कट जाएगीजब शेर सफ़र कर जाएगाजब क़त्ल हुआ सुर साज़ों काजब काल पड़ा आवाज़ों काजब शहर खंडर बन जाएगाफिर किस पर संग उठाओगेअपने चेहरे आईनों मेंजब देखोगे डर जाओगे
तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेतू किसी और ही मंज़र की महक लाई थीडर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मिरेऔर तू मुट्ठियाँ भर भर के नमक लाई थीऔर ही तरह की आँखें थीं तिरे चेहरे परतू किसी और सितारे से चमक लाई थीतेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँक्या करूँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेतेरी चुप से ही ये महसूस किया था मैं नेजीत जाएगा किसी रोज़ तिरा ग़म मुझ सेशहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थीये त'अल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थीवही अंजाम था जो 'इश्क़ का आग़ाज़ से हैतुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना थाचली आती है यही रस्म कई सदियों सेयही होता है यही होगा यही होना था
चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनायानानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गायातातारियों ने जिस को अपना वतन बनायाजिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ायामेरा वतन वही है मेरा वतन वही हैयूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया थासारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया थामिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया थातुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया थामेरा वतन वही है मेरा वतन वही हैटूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ सेफिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ सेवहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ सेमीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ सेमेरा वतन वही है मेरा वतन वही हैबंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीनानूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीनारिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीनाजन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीनामेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थीफिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई हैऔर नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाबमेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है
तुम रूठ चुके दिल टूट चुका अब याद न आओ रहने दोइस महफ़िल-ए-ग़म में आने की ज़हमत न उठाओ रहने दोये सच कि सुहाने माज़ी के लम्हों को भुलाना खेल नहींये सच कि भड़कते शोलों से दामन को बचाना खेल नहींरिसते हुए दिल के ज़ख़्मों को दुनिया से छुपाना खेल नहींऔराक़-ए-नज़र से जल्वों की तहरीर मिटाना खेल नहींलेकिन ये मोहब्बत के नग़्मे इस वक़्त न गाओ रहने दोजो आग दबी है सीने में होंटों पे न लाओ रहने दोजारी हैं वतन की राहों में हर सम्त लहू के फ़व्वारेदुख-दर्द की चोटें खा खा कर लर्ज़ां हैं दिलों के गहवारेअंगुश्त ब-लब हैं शम्स ओ क़मर हैरान ओ परेशाँ हैं तारेहैं बाद-ए-सहर के झोंके भी तूफ़ान-ए-मुसलसल के धारेअब फ़ुर्सत-ए-नाव-नोश कहाँ अब याद न आओ रहने दोतूफ़ान में रहने वालों को ग़ाफ़िल न बनाओ रहने दोमाना कि मोहब्बत की ख़ातिर हम तुम ने क़सम भी खाई थीये अम्न-ओ-सुकूँ से दूर फ़ज़ा पैग़ाम-ए-सुकूँ भी लाई थीवो दौर भी था जब दुनिया की हर शय पे जवानी छाई थीख़्वाबों की नशीली बद-मस्ती मासूम दिलों पर छाई थीलेकिन वो ज़माना दूर गया अब याद न आओ रहने दोजिस राह पे जाना लाज़िम है उस से न हटाओ रहने दोअब वक़्त नहीं उन नग़्मों का जो ख़्वाबों को बेदार करेंअब वक़्त है ऐसे नारों का जो सोतों को होश्यार करेंदुनिया को ज़रूरत है उन की जो तलवारों को प्यार करेंजो क़ौम ओ वतन के क़दमों पर क़ुर्बानी दें ईसार करेंरूदाद-ए-मोहब्बत फिर कहना अब मान भी जाओ रहने दोजादू न जगाओ रहने दो फ़ित्ने न उठाओ रहने दोमैं ज़हर-ए-हक़ीक़त की तल्ख़ी ख़्वाबों में छुपाऊँगा कब तकग़ुर्बत के दहकते शोलों से दामन को बचाऊँगा कब तकआशोब-ए-जहाँ की देवी से यूँ आँख चुराऊँगा कब तकजिस फ़र्ज़ को पूरा करना है वो फ़र्ज़ भुलाऊँगा कब तकअब ताब नहीं नज़्ज़ारे की जल्वे न दिखाओ रहने दोख़ुर्शीद-ए-मोहब्बत के रुख़ से पर्दे न उठाओ रहने दोमुमकिन है ज़माना रुख़ बदले ये दौर-ए-हलाकत मिट जाएये ज़ुल्म की दुनिया करवट ले ये अहद-ए-ज़लालत मिट जाएदौलत के फ़रेबी बंदों का ये किब्र और नख़वत मिट जाएबर्बाद वतन के महलों से ग़ैरों की हुकूमत मिट जाएउस वक़्त ब-नाम-ए-अहद-ए-वफ़ा मैं ख़ुद भी तुम्हें याद आऊँगामुँह मोड़ के सारी दुनिया से उल्फ़त का सबक़ दुहराऊँगा
ऐ देखने वालोइस हुस्न को देखोइस राज़ को समझोये नक़्श-ए-ख़यालीये फ़िक्रत-ए-आलीये पैकर-ए-तनवीरये कृष्ण की तस्वीरमअनी है कि सूरतसनअ'त है कि फ़ितरतज़ाहिर है कि मस्तूरनज़दीक है या दूरये नार है या नूरदुनिया से निरालाये बाँसुरी वालागोकुल का ग्वालाहै सेहर कि एजाज़खुलता ही नहीं राज़क्या शान है वल्लाहक्या आन है वल्लाहहैरान हूँ क्या हैइक शान-ए-ख़ुदा हैबुत-ख़ाने के अंदरख़ुद हुस्न का बुत-गरबुत बन गया आ करवो तुर्फ़ा नज़्ज़ारेयाद आ गए सारेजमुना के किनारेसब्ज़े का लहकनाफूलों का महकनाघनघोर घटाएँसरमस्त हवाएँमासूम उमंगेंउल्फ़त की तरंगेंवो गोपियों के साथहाथों में दिए हाथरक़्साँ हुआ ब्रिजनाथबंसी में जो लय हैनश्शा है न मय हैकुछ और ही शय हैइक रूह है रक़्साँइक कैफ़ है लर्ज़ांएक अक़्ल है मय-नोशइक होश है मदहोशइक ख़ंदा है सय्यालइक गिर्या है ख़ुश-हालइक इश्क़ है मग़रूरइक हुस्न है मजबूरइक सेहर है मसहूरदरबार में तन्हालाचार है कृष्णाआ श्याम इधर आसब अहल-ए-ख़ुसूमतहैं दर पए इज़्ज़तये राज दुलारेबुज़दिल हुए सारेपर्दा न हो ताराजबेकस की रहे लाजआ जा मेरे कालेभारत के उजालेदामन में छुपा लेवो हो गई अन-बनवो गर्म हुआ रनग़ालिब है दुर्योधनवो आ गए जगदीशवो मिट गई तशवीशअर्जुन को बुलायाउपदेश सुनायाग़म-ज़ाद का ग़म क्याउस्ताद का ग़म क्यालो हो गई तदबीरलो बन गई तक़दीरलो चल गई शमशीरसीरत है अदू-सोज़सूरत नज़र-अफ़रोज़दिल कैफ़ियत-अंदोज़ग़ुस्से में जो आ जाएबिजली ही गिरा जाएऔर लुत्फ़ पर आएतो घर भी लुटा जाएपरियों में है गुलफ़ामराधा के लिए श्यामबलराम का भय्यामथुरा का बसय्याबिंद्रा में कन्हैय्याबन हो गए वीराँबर्बाद गुलिस्ताँसखियाँ हैं परेशाँजमुना का किनारासुनसान है सारातूफ़ान हैं ख़ामोशमौजों में नहीं जोशलौ तुझ से लगी हैहसरत ही यही हैऐ हिन्द के राजाइक बार फिर आ जादुख दर्द मिटा जाअब्र और हवा सेबुलबुल की सदा सेफूलों की ज़िया सेजादू-असरी गुमशोरीदा-सरी गुमहाँ तेरी जुदाईमथुरा को न भाईतू आए तो शान आएतू आए तो जान आएआना न अकेलेहों साथ वो मेलेसखियों के झमेले
ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने कीमैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँगई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगरजहान भर की उदासी समेट लाई हूँ
जहाँ-ज़ादवो हल्ब की कारवाँ-सरा का हौज़, रात वो सुकूतजिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहेमुहीत जिस तरह हो दाएरे के गिर्द हल्क़ा-ज़नतमाम रात तैरते रहे थे हमहम एक दूसरे के जिस्म ओ जाँ से लग केतैरते रहे थे एक शाद-काम ख़ौफ़ सेकि जैसे पानी आँसुओं में तैरता रहेहम एक दूसरे से मुतमइन ज़वाल-ए-उम्र के ख़िलाफ़तैरते रहेतू कह उठी 'हसन यहाँ भी खींच लाईजाँ की तिश्नगी तुझे!'(लो अपनी जाँ की तिश्नगी को याद कर रहा था मैंकि मेरा हल्क़ आँसुओं की बे-बहा सख़ावतोंसे शाद-काम हो गया!)मगर ये वहम दिल में तैरने लगा कि हो न होमिरा बदन कहीं हलब के हौज़ ही में रह गयानहीं, मुझे दुई का वाहिमा नहींकि अब भी रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ का ए'तिबार है मुझेयही वो ए'तिबार थाकि जिस ने मुझ को आप में समो दियामैं सब से पहले 'आप' हूँअगर हमीं हों तू हो और मैं हूँ फिर भी मैंहर एक शय से पहले आप हों!अगर मैं ज़िंदा हूँ तो कैसे आप से दग़ा करूँ?कि तेरे जैसी औरतें, जहाँ-ज़ाद,ऐसी उलझनें हैंजिन को आज तक कोई नहीं 'सुलझ' सकाजो मैं कहूँ के मैं 'सुलझ' सका तो सर-ब-सरफ़रेब अपने आप से!कि औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने-आप परजवाब जिस का हम नहीं(लबीब कौन है? तमाम रात जिस का ज़िक्रतेरे लब पे थावो कौन तेरे गेसुओं को खींचता रहालबों को नोचता रहाजो मैं कभी न कर सकानहीं ये सच है मैं हूँ या लबीब होरक़ीब हो तो किस लिए तिरी ख़ुद-आगही की बे-रिया नशात-ऐ-नाब काजो सद-नवा ओ यक-नवा खिराम-ऐ-सुब्ह की तरहलबीब हर नवा-ऐ-साज़-गार की नफ़ी सही!)मगर हमारा राब्ता विसाल-ए-आब-ओ-गिल नहीं, न था कभीवजूद-ए-आदमी से आब-ओ-गिल सदा बरूँ रहेन हर विसाल-ए-आब-ओ-गिल से कोई जाम या सुबू ही बन सकाजो इन का एक वाहिमा ही बन सके तो बन सके!
ज़ख़्म-ख़ुर्दा हैं तख़य्युल की उड़ानें तेरीतेरे गीतों में तिरी रूह के ग़म पलते हैंसुर्मगीं आँखों में यूँ हसरतें लौ देती हैंजैसे वीरान मज़ारों पे दिए जुलते हैं
इक नन्ही मुन्नी सी पुजारनपतली बाँहें पतली गर्दनभोर भए मंदिर आई हैआई नहीं है माँ लाई हैवक़्त से पहले जाग उठी हैनींद अभी आँखों में भरी हैठोड़ी तक लट आई हुई हैयूँही सी लहराई हुई हैआँखों में तारों की चमक हैमुखड़े पे चाँदी की झलक हैकैसी सुंदर है क्या कहिएनन्ही सी इक सीता कहिएधूप चढ़े तारा चमका हैपत्थर पर इक फूल खिला हैचाँद का टुकड़ा फूल की डालीकम-सिन सीधी भोली भालीहाथ में पीतल की थाली हैकान में चाँदी की बाली हैदिल में लेकिन ध्यान नहीं हैपूजा का कुछ ज्ञान नहीं हैकैसी भोली छत देख रही हैमाँ बढ़ कर चुटकी लेती हैचुपके चुपके हँस देती हैहँसना रोना उस का मज़हबउस को पूजा से क्या मतलबख़ुद तो आई है मंदिर मेंमन उस का है गुड़िया-घर में
वो मेरा शेर जब मेरी ही लय में गुनगुनाती थीमनाज़िर झूमते थे बाम-ओ-दर को वज्द आता थामिरी आँखों में आँखें डाल कर जब मुस्कुराती थीमिरे ज़ुल्मत-कदे का ज़र्रा ज़र्रा जगमगाता था
आया हमारे देस में इक ख़ुश-नवा फ़क़ीरआया और अपनी धुन में ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़र गयासुनसान राहें ख़ल्क़ से आबाद हो गईंवीरान मय-कदों का नसीबा सँवर गयाथीं चंद ही निगाहें जो उस तक पहुँच सकींपर उस का गीत सब के दिलों में उतर गयाअब दूर जा चुका है वो शाह-ए-गदा-नुमाऔर फिर से अपने देस की राहें उदास हैंचंद इक को याद है कोई उस की अदा-ए-ख़ासदो इक निगाहें चंद अज़ीज़ों के पास हैंपर उस का गीत सब के दिलों में मुक़ीम हैऔर उस के लय से सैकड़ों लज़्ज़त-शनास हैं
किस ज़बाँ से कह रहे हो आज तुम सौदागरोदहर में इंसानियत के नाम को ऊँचा करोजिस को सब कहते हैं हिटलर भेड़िया है भेड़ियाभेड़िये को मार दो गोली पए-अम्न-ओ-बक़ाबाग़-ए-इंसानी में चलने ही पे है बाद-ए-ख़िज़ाँआदमिय्यत ले रही है हिचकियों पर हिचकियाँहाथ है हिटलर का रख़्श-ए-ख़ुद-सरी की बाग परतेग़ का पानी छिड़क दो जर्मनी की आग परसख़्त हैराँ हूँ कि महफ़िल में तुम्हारी और ये ज़िक्रनौ-ए-इंसानी के मुस्तक़बिल की अब करते हो फ़िक्रजब यहाँ आए थे तुम सौदागरी के वास्तेनौ-इंसानी के मुस्तक़बिल से किया वाक़िफ़ न थेहिन्दियों के जिस्म में क्या रूह-ए-आज़ादी न थीसच बताओ क्या वो इंसानों की आबादी न थीअपने ज़ुल्म-ए-बे-निहायत का फ़साना याद हैकंपनी का फिर वो दौर-ए-मुजरिमाना याद हैलूटते फिरते थे जब तुम कारवाँ-दर-कारवाँसर-बरहना फिर रही थी दौलत-ए-हिन्दोस्ताँदस्त-कारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुमसर्द लाशों से गढों को पाटते फिरते थे तुमसनअत-ए-हिन्दोस्ताँ पर मौत थी छाई हुईमौत भी कैसी तुम्हारे हात की लाई हुईअल्लाह अल्लाह किस क़दर इंसाफ़ के तालिब हो आजमीर-जाफ़र की क़सम क्या दुश्मन-ए-हक़ था 'सिराज'क्या अवध की बेगमों का भी सताना याद हैयाद है झाँसी की रानी का ज़माना याद हैहिजरत-ए-सुल्तान-ए-देहली का समाँ भी याद हैशेर-दिल 'टीपू' की ख़ूनीं दास्ताँ भी याद हैतीसरे फ़ाक़े में इक गिरते हुए को थामनेकस के तुम लाए थे सर शाह-ए-ज़फ़र के सामनेयाद तो होगी वो मटिया-बुर्ज की भी दास्ताँअब भी जिस की ख़ाक से उठता है रह रह कर धुआँतुम ने क़ैसर-बाग़ को देखा तो होगा बारहाआज भी आती है जिस से हाए 'अख़्तर' की सदासच कहो क्या हाफ़िज़े में है वो ज़ुल्म-ए-बे-पनाहआज तक रंगून में इक क़ब्र है जिस की गवाहज़ेहन में होगा ये ताज़ा हिन्दियों का दाग़ भीयाद तो होगा तुम्हें जलियानवाला-बाग़ भीपूछ लो इस से तुम्हारा नाम क्यूँ ताबिंदा है'डायर'-ए-गुर्ग-ए-दहन-आलूद अब भी ज़िंदा हैवो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद हैउस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद हैअहल-ए-आज़ादी रहा करते थे किस हंजार सेपूछ लो ये क़ैद-ख़ानों के दर-ओ-दीवार सेअब भी है महफ़ूज़ जिस पर तनतना सरकार काआज भी गूँजी हुई है जिन में कोड़ों की सदाआज कश्ती अम्न के अमवाज पर खेते हो क्यूँसख़्त हैराँ हूँ कि अब तुम दर्स-ए-हक़ देते हो क्यूँअहल-ए-क़ुव्वत दाम-ए-हक़ में तो कभी आते नहीं''बैंकी'' अख़्लाक़ को ख़तरे में भी लाते नहींलेकिन आज अख़्लाक़ की तल्क़ीन फ़रमाते हो तुमहो न हो अपने में अब क़ुव्वत नहीं पाते हो तुमअहल-ए-हक़ रोशन-नज़र हैं अहल-ए-बातिन कोर हैंये तो हैं अक़वाल उन क़ौमों के जो कमज़ोर हैंआज शायद मंज़िल-ए-क़ुव्वत में तुम रहते नहींजिस की लाठी उस की भैंस अब किस लिए कहते नहींक्या कहा इंसाफ़ है इंसाँ का फ़र्ज़-ए-अव्वलींक्या फ़साद-ओ-ज़ुल्म का अब तुम में कस बाक़ी नहींदेर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव मेंक्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव मेंगूँज टापों की न आबादी न वीराने में हैख़ैर तो है अस्प-ए-ताज़ी क्या शिफ़ा-ख़ाने में हैआज कल तो हर नज़र में रहम का अंदाज़ हैकुछ तबीअत क्या नसीब-ए-दुश्मनाँ ना-साज़ हैसाँस क्या उखड़ी कि हक़ के नाम पर मरने लगेनौ-ए-इंसाँ की हवा-ख़्वाही का दम भरने लगेज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगेलग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगेमुजरिमों के वास्ते ज़ेबा नहीं ये शोर-ओ-शैनकल 'यज़ीद' ओ 'शिम्र' थे और आज बनते हो 'हुसैन'ख़ैर ऐ सौदागरो अब है तो बस इस बात मेंवक़्त के फ़रमान के आगे झुका दो गर्दनेंइक कहानी वक़्त लिक्खेगा नए मज़मून कीजिस की सुर्ख़ी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून कीवक़्त का फ़रमान अपना रुख़ बदल सकता नहींमौत टल सकती है अब फ़रमान टल सकता नहीं
फिर चली है रेल स्टेशन से लहराती हुईनीम-शब की ख़ामुशी में ज़ेर-ए-लब गाती हुईडगमगाती झूमती सीटी बजाती खेलतीवादी ओ कोहसार की ठंडी हवा खाती हुईतेज़ झोंकों में वो छम छम का सुरूद-ए-दिल-नशींआँधियों में मेंह बरसने की सदा आती हुईजैसे मौजों का तरन्नुम जैसे जल-परियों के गीतएक इक लय में हज़ारों ज़मज़मे गाती हुईनौनिहालों को सुनाती मीठी मीठी लोरियाँनाज़नीनों को सुनहरे ख़्वाब दिखलाती हुईठोकरें खा कर लचकती गुनगुनाती झूमतीसरख़ुशी में घुँगरुओं की ताल पर गाती हुईनाज़ से हर मोड़ पर खाती हुई सौ पेच-ओ-ख़मइक दुल्हन अपनी अदा से आप शरमाती हुईरात की तारीकियों में झिलमिलाती काँपतीपटरियों पर दूर तक सीमाब झलकाती हुईजैसे आधी रात को निकली हो इक शाही बरातशादयानों की सदा से वज्द में आती हुईमुंतशिर कर के फ़ज़ा में जा-ब-जा चिंगारियाँदामन-ए-मौज-ए-हवा में फूल बरसाती हुईतेज़-तर होती हुई मंज़िल-ब-मंज़िल दम-ब-दमरफ़्ता रफ़्ता अपना असली रूप दिखलाती हुईसीना-ए-कोहसार पर चढ़ती हुई बे-इख़्तियारएक नागन जिस तरह मस्ती में लहराती हुईइक सितारा टूट कर जैसे रवाँ हो अर्श सेरिफ़अत-ए-कोहसार से मैदान में आती हुईइक बगूले की तरह बढ़ती हुई मैदान मेंजंगलों में आँधियों का ज़ोर दिखलाती हुईरासा-बर-अंदाम करती अंजुम-ए-शब-ताब कोआशियाँ में ताइर-ए-वहशी को चौंकाती हुईयाद आ जाए पुराने देवताओं का जलालउन क़यामत-ख़ेज़ियों के साथ बल खाती हुईएक रख़्शर-ए-बे-अनाँ की बर्क़-रफ़्तारी के साथख़ंदक़ों को फाँदती टीलों से कतराती हुईमुर्ग़-ज़ारों में दिखाती जू-ए-शीरीं का ख़िरामवादियों में अब्र के मानिंद मंडलाती हुईइक पहाड़ी पर दिखाती आबशारों की झलकइक बयाबाँ में चराग़-ए-तूर दिखलाती हुईजुस्तुजू में मंज़िल-ए-मक़्सूद की दीवाना-वारअपना सर धुनती फ़ज़ा में बाल बिखराती हुईछेड़ती इक वज्द के आलम में साज़-ए-सरमदीग़ैज़ के आलम में मुँह से आग बरसाती हुईरेंगती मुड़ती मचलती तिलमिलाती हाँफतीअपने दिल की आतिश पिन्हाँ को भड़काती हुईख़ुद-ब-ख़ुद रूठी हुई बिफरी हुई बिखरी हुईशोर-ए-पैहम से दिल-ए-गीती को धड़काती हुईपुल पे दरिया के दमा-दम कौंदती ललकारतीअपनी इस तूफ़ान-अंगेज़ी पे इतराती हुईपेश करती बीच नद्दी में चराग़ाँ का समाँसाहिलों पर रेत के ज़र्रों को चमकाती हुईमुँह में घुसती है सुरंगों के यकायक दौड़ करदनदनाती चीख़ती चिंघाड़ती गाती हुईआगे आगे जुस्तुजू-आमेज़ नज़रें डालतीशब के हैबतनाक नज़्ज़ारों से घबराती हुईएक मुजरिम की तरह सहमी हुई सिमटी हुईएक मुफ़लिस की तरह सर्दी में थर्राती हुईतेज़ी-ए-रफ़्तार के सिक्के जमाती जा-ब-जादश्त ओ दर में ज़िंदगी की लहर दौड़ाती हुईडाल कर गुज़रे मनाज़िर पर अंधेरे का नक़ाबइक नया मंज़र नज़र के सामने लाती हुईसफ़्हा-ए-दिल से मिटाती अहद-ए-माज़ी के नुक़ूशहाल ओ मुस्तक़बिल के दिलकश ख़्वाब दिखलाती हुईडालती बे-हिस चटानों पर हक़ारत की नज़रकोह पर हँसती फ़लक को आँख दिखलाती हुईदामन-ए-तीरीकी-ए-शब की उड़ाती धज्जियाँक़स्र-ए-ज़ुल्मत पर मुसलसल तीर बरसाती हुईज़द में कोई चीज़ आ जाए तो उस को पीस करइर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी के राज़ बतलाती हुईज़ोम में पेशानी-ए-सहरा पे ठोकर मारतीफिर सुबुक-रफ़्तारियों के नाज़ दिखलाती हुईएक सरकश फ़ौज की सूरत अलम खोले हुएएक तूफ़ानी गरज के साथ डराती हुईएक इक हरकत से अंदाज़-ए-बग़ावत आश्कारअज़्मत-ए-इंसानियत के ज़मज़मे गाती हुईहर क़दम पर तोप की सी घन-गरज के साथ साथगोलियों की सनसनाहट की सदा आती हुईवो हवा में सैकड़ों जंगी दुहल बजते हुएवो बिगुल की जाँ-फ़ज़ाँ आवाज़ लहराती हुईअल-ग़रज़ उड़ती चली जाती है बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरशाइर-ए-आतिश-नफ़स का ख़ून खौलाती हुई
बच्चे माओं की गोदों में सहमे हुए हैंइस्मतें सर-बरहना परेशान हैंहर तरफ़ शोर-ए-आह-ओ-बुका हैऔर मैं इस तबाही के तूफ़ान मेंआग और ख़ूँ के हैजान मेंसर-निगूँ और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों परअपने नग़्मों की झोली पसारेदर-ब-दर फिर रहा हूँमुझ को अम्न और तहज़ीब की भीक दोमेरे गीतों की लय मेरा सुर मेरी नयमेरे मजरूह होंटों को फिर सौंप दोसाथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिएइंक़लाब और बग़ावत के नग़्मे अलापेअजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव मेंसरफ़रोशी के ख़्वाबीदा जज़्बे उभारेऔर उस सुब्ह की राह देखीजिस में इस मुल्क की रूह आज़ाद होआज ज़ंजीर-ए-महकूमियत कट चुकी हैऔर इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दरअजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैंखेत सोना उगलने को बेचैन हैंवादियाँ लहलहाने को बेताब हैंकोहसारों के सीने में हैजान हैसंग और ख़िश्त बे-ख़्वाब व बेदार हैंउन की आँखों में तामीर के ख़्वाब हैंउन के ख़्वाबों को तकमील का रूप दोमुल्क की वादियाँ घाटियाँ खेतियाँऔरतें बच्चियांहाथ फैलाए ख़ैरात की मुंतज़िर हैंइन को अम्न और तहज़ीब की भीक दोमाओं को उन के होंटों की शादाबियाँनन्हे बच्चों को उन की ख़ुशी बख़्श दोमुल्क की रूह को ज़िंदगी बख़्श दोमुझ को मेरा हुनर मेरी लय बख़्श दोआज सारी फ़ज़ा है भिकारीऔर मैं इस भिकारी फ़ज़ा मेंअपने नग़्मों की झोली पसारेदर-ब-दर फिर रहा हूँमुझ को फिर मेरा खोया हुआ साज़ दोमैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिएजब भी आया नए गीत लाता रहूँगा
एक शाएर की तमन्नाओं को धोका दे करउस ने तोड़ी है अगर प्यार भरे गीत की लयइस पे अफ़्सोस है क्यूँ इस पे तअ'ज्जुब कैसाये मोहब्बत भी तो एहसास का इक धोका है
काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहनातुझ को लाई है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहनामेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया क्या कहनाआज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा
कलाई में तो चौड़ी का खनकनाग़रज़ में आईना तो है सँवरनामैं जैसे दश्त में हूँ राह कोईतो इस पर इक मुसाफ़िर का गुज़रनामैं जैसे ताल देता साज़ कोईतो रक़्क़ासा का इस लय पर थिरकनामैं हूँ बे-नूर सी इक झील और तूहै इस पर माह-ए-कामिल का उतरनातू चेहरा ख़ूबसूरत मैं हूँ पर्दामेरा मक़्सद तुझे महफ़ूज़ रखनातेरी ज़ीनत का पहरे-दार हूँ मैंतुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ मैं
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