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नज़्म
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अगर पूछे कोई क्या क़ाफ़िया है आप का दादी
तो मलमल फेंक देना ओढ़ लेना सर पे तुम खादी
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
कि जैसे कोई काँटे-दार झाड़ी पर महीन मलमल को बेदर्दी से खींचे
और तार-ओ-तार कर डाले