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नज़्म
ये धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा-खींच घसीटी पर भड़वे रंडी का फक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
देर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव में
क्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हैं चर्चे होते फ़रहत के और इशरत की भी धूम मची
ख़ूबाँ के रंगीं चेहरों पर हर आन निगाहें हैं लड़ती
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
टीचरज़ डे में अब के वो बन गईं प्रिंसिपल
क्या यादगार दिन था कैसी मची थी हलचल