aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "nuqoosh"
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूशवही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़रवही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़मवही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर
तेरे सब रंग हयूले के ये बे-जान नुक़ूशजैसे मरबूत ख़यालात के ताने-बानेये तिरी साँवली रंगत ये परेशान ख़ुतूतबारहा जैसे मिटाया हो इन्हें दुनिया नेरेशा-ए-संग से खींची हुई ज़ुल्फ़ें जैसेरास्ते सीना-ए-कोहसार पे बल खाते हैंअब्रूओं की झुकी मेहराबों में जामिद पलकेंजिस तरह तीर कमानों में उलझ जाते हैं
वो कहाँ और कहाँ काहिश-ए-ग़म, सोज़िश-ए-जाँउस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमाँउस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमाँत'अना-ज़न एक ज़माना नज़र आया होगा
सामने ताक़ पे रक्खी हुई दो तस्वीरेंअक्सर औक़ात मुझे प्यार से यूँ तकती हैंजैसे मैं दूर किसी देस का शहज़ादा हूँमेरा कमरा मिरे माज़ी का हक़ीक़ी मूनिसआज हर फ़िक्र हर एहसास से बेगाना हैअपने हमराज़ किवाड़ों के अहाते के एवज़आज मैं जैसे मज़ारों पे चला आया हूँगर्द-आलूदा कैलेंडर पे अजंता के नुक़ूशमेरे चेहरे की लकीरों की तरफ़ देखते हैंजैसे इक लाश की फैली हुई बे-बस आँखेंअपने मजबूर अज़ीज़ों को तका करती हैं
तेरे चेहरे के ये सादा से अछूते से नुक़ूशमेरी तख़्ईल को क्या रंग अता करते हैंतेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे आरिज़ तिरे होंटकैसी अन-जानी सी मासूम ख़ता करते हैं
हमारी धड़कनें तेरे ही बाम-ओ-दर में पिन्हाँ हैंतिरे माहौल में हम सब के महसूसात ग़लताँ हैंहमारी आरज़ुएँ तेरे दालानों में रक़्साँ हैंनुक़ूश-ए-अहद-ए-रफ़्ता तेरे माथे पर नुमायाँ हैं
फिर चली है रेल स्टेशन से लहराती हुईनीम-शब की ख़ामुशी में ज़ेर-ए-लब गाती हुईडगमगाती झूमती सीटी बजाती खेलतीवादी ओ कोहसार की ठंडी हवा खाती हुईतेज़ झोंकों में वो छम छम का सुरूद-ए-दिल-नशींआँधियों में मेंह बरसने की सदा आती हुईजैसे मौजों का तरन्नुम जैसे जल-परियों के गीतएक इक लय में हज़ारों ज़मज़मे गाती हुईनौनिहालों को सुनाती मीठी मीठी लोरियाँनाज़नीनों को सुनहरे ख़्वाब दिखलाती हुईठोकरें खा कर लचकती गुनगुनाती झूमतीसरख़ुशी में घुँगरुओं की ताल पर गाती हुईनाज़ से हर मोड़ पर खाती हुई सौ पेच-ओ-ख़मइक दुल्हन अपनी अदा से आप शरमाती हुईरात की तारीकियों में झिलमिलाती काँपतीपटरियों पर दूर तक सीमाब झलकाती हुईजैसे आधी रात को निकली हो इक शाही बरातशादयानों की सदा से वज्द में आती हुईमुंतशिर कर के फ़ज़ा में जा-ब-जा चिंगारियाँदामन-ए-मौज-ए-हवा में फूल बरसाती हुईतेज़-तर होती हुई मंज़िल-ब-मंज़िल दम-ब-दमरफ़्ता रफ़्ता अपना असली रूप दिखलाती हुईसीना-ए-कोहसार पर चढ़ती हुई बे-इख़्तियारएक नागन जिस तरह मस्ती में लहराती हुईइक सितारा टूट कर जैसे रवाँ हो अर्श सेरिफ़अत-ए-कोहसार से मैदान में आती हुईइक बगूले की तरह बढ़ती हुई मैदान मेंजंगलों में आँधियों का ज़ोर दिखलाती हुईरासा-बर-अंदाम करती अंजुम-ए-शब-ताब कोआशियाँ में ताइर-ए-वहशी को चौंकाती हुईयाद आ जाए पुराने देवताओं का जलालउन क़यामत-ख़ेज़ियों के साथ बल खाती हुईएक रख़्शर-ए-बे-अनाँ की बर्क़-रफ़्तारी के साथख़ंदक़ों को फाँदती टीलों से कतराती हुईमुर्ग़-ज़ारों में दिखाती जू-ए-शीरीं का ख़िरामवादियों में अब्र के मानिंद मंडलाती हुईइक पहाड़ी पर दिखाती आबशारों की झलकइक बयाबाँ में चराग़-ए-तूर दिखलाती हुईजुस्तुजू में मंज़िल-ए-मक़्सूद की दीवाना-वारअपना सर धुनती फ़ज़ा में बाल बिखराती हुईछेड़ती इक वज्द के आलम में साज़-ए-सरमदीग़ैज़ के आलम में मुँह से आग बरसाती हुईरेंगती मुड़ती मचलती तिलमिलाती हाँफतीअपने दिल की आतिश पिन्हाँ को भड़काती हुईख़ुद-ब-ख़ुद रूठी हुई बिफरी हुई बिखरी हुईशोर-ए-पैहम से दिल-ए-गीती को धड़काती हुईपुल पे दरिया के दमा-दम कौंदती ललकारतीअपनी इस तूफ़ान-अंगेज़ी पे इतराती हुईपेश करती बीच नद्दी में चराग़ाँ का समाँसाहिलों पर रेत के ज़र्रों को चमकाती हुईमुँह में घुसती है सुरंगों के यकायक दौड़ करदनदनाती चीख़ती चिंघाड़ती गाती हुईआगे आगे जुस्तुजू-आमेज़ नज़रें डालतीशब के हैबतनाक नज़्ज़ारों से घबराती हुईएक मुजरिम की तरह सहमी हुई सिमटी हुईएक मुफ़लिस की तरह सर्दी में थर्राती हुईतेज़ी-ए-रफ़्तार के सिक्के जमाती जा-ब-जादश्त ओ दर में ज़िंदगी की लहर दौड़ाती हुईडाल कर गुज़रे मनाज़िर पर अंधेरे का नक़ाबइक नया मंज़र नज़र के सामने लाती हुईसफ़्हा-ए-दिल से मिटाती अहद-ए-माज़ी के नुक़ूशहाल ओ मुस्तक़बिल के दिलकश ख़्वाब दिखलाती हुईडालती बे-हिस चटानों पर हक़ारत की नज़रकोह पर हँसती फ़लक को आँख दिखलाती हुईदामन-ए-तीरीकी-ए-शब की उड़ाती धज्जियाँक़स्र-ए-ज़ुल्मत पर मुसलसल तीर बरसाती हुईज़द में कोई चीज़ आ जाए तो उस को पीस करइर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी के राज़ बतलाती हुईज़ोम में पेशानी-ए-सहरा पे ठोकर मारतीफिर सुबुक-रफ़्तारियों के नाज़ दिखलाती हुईएक सरकश फ़ौज की सूरत अलम खोले हुएएक तूफ़ानी गरज के साथ डराती हुईएक इक हरकत से अंदाज़-ए-बग़ावत आश्कारअज़्मत-ए-इंसानियत के ज़मज़मे गाती हुईहर क़दम पर तोप की सी घन-गरज के साथ साथगोलियों की सनसनाहट की सदा आती हुईवो हवा में सैकड़ों जंगी दुहल बजते हुएवो बिगुल की जाँ-फ़ज़ाँ आवाज़ लहराती हुईअल-ग़रज़ उड़ती चली जाती है बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरशाइर-ए-आतिश-नफ़स का ख़ून खौलाती हुई
अलविदा'अकैसे माह-ओ-साल गुज़रेअब न कुछ भी याद हैसिर्फ़ हैं धुँदले नुक़ूशया बसारत की कमी हैकुछ नज़र आता नहींबस किताबों और फिल्मों में रहीइक बसीरत की तलाशकुछ न कुछ रोटी की भी थी जुस्तुजूजाने किस मंज़िल की थी वो आरज़ूबे-सबब लोगों से याराना रहाऔर फिर तन्हा रहा बरसों तलकसब थे क़ैदी अपने अपने जाल केतमन्नाओं की दलदल में पड़ेकिस में हिम्मत थी कि बदले ज़िंदगानी के पुराने ख़ोल कोहम से सरकश को दिया करते थे नामऔर हँस कर ख़ुश हुआ करते सारे अजनबीकौन समझाए कि हम महकूम हैं मज़लूम हैंबेबसी कैसे मुक़द्दर बन गईबोलेगा कौनख़ौफ़ ऐसा है कि कोई शख़्स कुछ कहता नहींजाने किस तूफ़ान के सब मुंतज़िर हैंबुत बनेकैसे चिल्लाऊँ कि अपना हम-नवा कोई नहींअलविदा'अ ख़ुद अपने साए को मगरकहना पड़ा
मेरे अज्दाद का वतन ये शहरमेरी ता'लीम का जहाँ ये मक़ाममेरे बचपन की दोस्त ये गलियाँजिन में रुस्वा हुआ शबाब का नामयाद आते हैं इन फ़ज़ाओं मेंकितने नज़दीक और दूर के नामकितने ख़्वाबों के मल्गजे चेहरेकितनी यादों के मरमरीं अज्सामकितने हंगामे कितनी तहरीकेंकितने नारे जो थे ज़बाँ ज़द-ए-आममैं यहाँ जब शुऊ'र को पहुँचाअजनबी क़ौम की थी क़ौम ग़ुलामयूनियन जैक दरस-गाह पे थाऔर वतन में था सामराजी निज़ामइसी मिट्टी को हाथ में ले करहम बने थे बग़ावतों के इमामयहीं जाँचे थे धर्म के विश्वासयहीं परखे थे दीन के औहामहैं मुंकिर बने रिवायत केयहीं तोड़े रिवाज के असनामयहीं निखरा था ज़ौक़-ए-नग़्मा-गरीयहीं उतरा था शे'र का इल्हाममैं जहाँ भी रहा यहीं का रहामुझ को भूले नहीं हैं ये दर-ओ-बामनाम मेरा जहाँ जहाँ पहुँचासाथ पहुँचा है इस दयार का नाममैं यहाँ मेज़बाँ भी मेहमाँ भीआप जो चाहें दीजिए मुझे नामनज़्र करता हूँ उन फ़ज़ाओं कीअपना दिल अपनी रूह अपना कलामऔर फ़ैज़ान-ए-इल्म जारी होऔर ऊँचा हो इस दयार का नामऔर शादाब हो ये अर्ज़-ए-हसींऔर महके ये वादी-ए-गुलफ़ामऔर उभरें सनम-गरी के नुक़ूशऔर छल्कें मय-ए-सुख़न के जामऔर निकलें वो बे-नवा जिन कोअपना सब कुछ कहें वतन के अवामक़ाफ़िले आते जाते रहते हैंकब हुआ है यहाँ किसी का क़यामनस्ल-दर-नस्ल काम जारी हैकार-ए-दुनिया कभी हुआ न तमामकल जहाँ मैं था आज तू है वहाँऐ नई नस्ल तुझ को मेरा सलाम
वो एक आम सी लड़की है जिस के सादा नुक़ूशचमक उट्ठेंगे मोहब्बत की सर्द आहों सेजहाँ पे फूल तो क्या दिल बुझे हुए होंगेगुज़रने वाली है वो इन हसीन राहों सेअभी तो ख़ैर से मासूमियत टपकती हैमगर शराब भी टपकेगी उन निगाहों सेवो एक आम सी लड़की है जिस के बारे मेंन जाने ज़ेहन में आते हैं क्यूँ ख़याल कईमगर बड़े ही तहय्युर से आज सुबह के वक़्तसुनी है मैं ने मोहल्ले में एक बात नईगुज़िश्ता शब को वही एक आम सी लड़कीख़ुद अपने घर के मुलाज़िम के साथ भाग गई
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई कोइशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता हैवो देखो गाँव के सीने पे सर रक्खे हुए सरसोंतुम्हारी कम-सिनी खेली है जिस की गोद में बरसोंनुक़ूश-ए-पा से अब तक हर गली की माँग रौशन हैअभी तक गोद फैलाए हुए डेरे का आँगन हैरसीली जामुनों के पेड़ की कमज़ोर शाख़ों नेतुम्हारी उँगलियों का हर निशाँ महफ़ूज़ रक्खा हैलबों पर झील की गहराइयों के है बस इक शिकवाकि जब से तुम गए हो कोई भी हम तक नहीं पहुँचाकिनारे झील के वो पेड़ अब तक मुंतज़िर सा हैकब आओगे यहाँ कपड़े उतरोगे नहाओगेये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई कोइशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता हैवो देखो गाँव के खलियानों में सोया हुआ जादूनशीली रात की रानी वो लौ देती हुई ख़ुश्बूदियों का धीमी धीमी रौशनी देना धुआँ देनाशिकस्ता झोंपड़ों का ज़िंदगी को लोरियाँ देनाखनकती हैं रसोई घर में अल्हड़ चूड़ियाँ अब तकभरा की पोलियाँ लाती हैं सर पर बूढ़ियाँ अब तकतलैया के किनारे कच्ची ईंटों से बना मंदिरसुलगते कंडों से उठती धुएँ की मल्गजी चादरहरे खेतों की मेंडों पर सुलगते जिस्म के साएलरज़ते होंठ घबराई हुई साँसों के अफ़्सानेलचकती आम की शाख़ों पे बल खाए हुए झूलेकिसी का भागना ये कह के कोई है हमें छू लेये देखो ज़िंदगी कितनी हसीं है कितनी भोली हैउसी आग़ोश में आ जाओ जिस में आँख खोली हैये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये कहता है कि मैं गुज़री हुई बातों में खो जाऊँतुम्हारी ज़ुल्फ़ से महकी हुई रातों में खो जाऊँइसे मैं कैसे समझाऊँ कि अब ये साँस का डोराइक ऐसी धार की तलवार है जिस पर गुज़रना हैमुझे और ज़िंदगी के ज़ख़्म को टाँके लगाना हैंइसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरेंअब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकताअगर रक्खूँ तो नाकारा निकम्मा कह के ये दुनियामुझे ठोकर लगा दे और ख़ुद आगे को बढ़ जाएमिरी पस-मांदगी पर हर नज़र उट्ठे तरस खाएमुझे मुर्दा अजाइब-घर की ऐसी मूर्ती समझेजो सब को इस लिए प्यारी है कि काफ़ी पुरानी हैये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैइसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरेंअब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकता
फिर नया साल दबे पाँव चला आया हैऔर मिटते हुए मद्धम से नुक़ूशदौर-ए-माज़ी की ख़लाओं में नज़र आते हैंजैसे छोड़ी हुई मंज़िल का निशाँजैसे कुछ दूर से आती हुई आवाज़-ए-जरसकौन सहमे हुए मायूस दियों को देखेफिर भी ये मुझ को ख़याल आता हैकितनी नौ-ख़ेज़ उम्मीदों को सहारे न मिलेकितनी डूबी हुई कश्ती को किनारे न मिलेज़ुल्फ़ लहराई पे सावन की घटा बन न सकीसुबह हँसती रही बुझते रहे कितने चेहरेचूड़ियाँ टूट गईं माँग के सिन्दूर उजड़ेगोद वीरान हुईनग़्मे तख़्लीक़ हुए होंट सिलेकितने फ़न-पारों के अम्बार लगेशाह-राहों पे जलाने के लिएआशियाने का तसव्वुर ही अभी आया थाबिजलियाँ कौंद गईंहीरोशीमा चीख़ उठाकितना पुर-हौल समाँकितनी भयानक तारीख़ये मह-ओ-साल के फैले हुए जालफिर नया साल दबे पाँव चला आया हैरोज़-ओ-शब जैसे अँधेरे में लुटेरों के गिरोहअपनी तारीक कमीं गाहों में छप कर बैठेंऔर दामानदा सारा ही कोईअजनबी राहों से डरता हुआ घबराया हुआअपनी कोई हुई मंज़िल की तरफ़ जाता होऔर लुटेरे इसे तन्हा पा करउस के सीने का लहू ले लें उम्मीदों के दिए बुझ जाएँकौन लेकिन दिल इंसाँ की तपिश छीन सकेफिर नया साल दबे पाँव चला आया हैकितनी बारीक है ये सुब्ह की पहली किरनकौन जाने कि नई दाम भी क्या लाएगीकान में आज भी मानूस सदा आती हैवही डॉलर का तिलिस्मवही तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के पुराने दा'वेवही पसमाँदा ममालिक की तरक़्क़ी का फ़रेबवही तारीख़ सियासत के पुराने शातिरएटमी जंग का एलान किया करते हैंकौन लेकिन दिल-ए-इंसाँ की तपिश छीन सकेइर्तिक़ा आहन-ओ-फ़ौलाद से किस तरह रुकेटूट जाएँगे मह-ओ-साल के फैले हुए जालफिर नया साल दबे पाँव चला आता हैजाओ तारीक मकानों में चराग़ाँ कर दोआज ज़ंजीर की इक और कड़ी टूट गईआज दुनिया के अवामअपने सीने से लगाए हुए अपनी तारीख़अपने हाथों में नए अहद का फ़रमान लिएइक नई राह पे बढ़ते ही चले जाते हैंरोज़-ओ-शब जैसे अँधेरे में लुटेरों के गिरोहहाथ बाँधे हुए क़दमों पे जबीनें रख देंफिर नया साल दबे पाँव चला आया हैजाओ तारीक मकानों में चराग़ाँ कर दो
1यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैंज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं नेशम्अ जलती है पर इक रात में जल जाती हैयाँ तो एक उम्र इसी तरह से जलते गुज़रीकौन सी ख़ाक है ये जाने कहाँ का है ख़मीरइक नए साँचे में हर रोज़ ही ढलते गुज़रीकिस तरह मैं ने गुज़ारी हैं ये ग़म की घड़ियाँकाश मैं ऐसी कहानी को सुना भी सकतातअ'ना-ज़न हैं जो मिरे हाल पे अरबाब-ए-नशातउन को इक बार मैं ऐ काश रुला भी सकतामैं कि शाएर हूँ मैं पैग़ामबर-ए-फ़ितरत हूँमेरी तख़्ईल में है एक जहान-ए-बेदारदस्तरस में मिरी नज़्ज़ारा-ए-गुल-हा-ए-चमनमेरे इदराक में हैं कुन-फ़यकूँ के असरारमिरे अशआ'र में है क़ल्ब-ए-हज़ीं की धड़कनमेरी नज़्मों में मिरी रूह की दिल-दोज़ पुकारफिर भी रह रह के खटकती है मिरे दिल में ये बातकि मिरे पास तो अल्फ़ाज़ का इक पर्दा हैसिर्फ़ अल्फ़ाज़ से तस्वीर नहीं बन सकतीसिर्फ़ एहसास में हालात की तफ़्सीर कहाँसिर्फ़ फ़रियाद में ज़ख़्मों की वो ज़ंजीर कहाँऐसी ज़ंजीर कि एक एक कड़ी में जिस कीकितनी खोई हुई ख़ुशियों के मनाज़िर पिन्हाँकितनी भूली हुई यादों के पुर-असरार खंडरकितने उजड़े हुए लूटे हुए सुनसान नगरकितने आते हुए जाते हुए चेहरों के नुक़ूशकितने बनते हुए मिटते हुए लम्हात का राज़कितनी उलझी हुई राहों के नशेब और फ़राज़2क्या कहूँ मुझ को कहाँ लाई मिरी उम्र-ए-रवाँआँख खोली तो हर इक सम्त अँधेरों का समाँरेंगती ऊँघती मग़्मूम सी इक राहगुज़ारगर्द-ए-आलाम में खोया हुआ मंज़िल का निशाँगेसू-ए-शाम से लिपटी हुई ग़म की ज़ंजीरसीना-ए-शब से निकलती हुई फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँठंडी ठंडी सी हवाओं में वो ग़ुर्बत की थकनदर-ओ-दीवार पे तारीक से साए लर्ज़ांकितनी खोई हुई बीमार ओ फ़सुर्दा आँखेंटिमटिमाते से दिए चार तरफ़ नौहा-कुनाँमुज़्महिल चेहरे मसाइब की गिराँ-बारी सेदिल-ए-मजरूह से उठता हुआ ग़मनाक धुआँयही तारीकी-ए-ग़म तो मिरा गहवारा हैमैं इसी कोख में था नूर-ए-सहर के मानिंदहर तरफ़ सोग में डूबा हुआ मेरा माहौलमेरा उजड़ा हुआ घर 'मीर' के घर के मानिंदइक तरफ़ अज़्मत-ए-अस्लाफ़ का माथे पे ग़ुरूरऔर इक सम्त वो इफ़्लास के फैले हुए जालभूक की आग में झुलसे हुए सारे अरमाँक़र्ज़ के बोझ से जीने की उमंगें पामालवक़्त की धुँद में लिपटे हुए कुछ प्यार के गीतमेहर ओ इख़्लास ज़माने की जफ़ाओं से निढालभाई भाई की मोहब्बत में निराले से शुकूकनिगह-ए-ग़ैर में जिस तरह अनोखे से सवाल''एक हंगामे पे मौक़ूफ़ थी घर की रौनक़''मुफ़्लिसी साथ लिए आई थी इक जंग-ओ-जिदालफ़ाक़ा-मस्ती में बिखरते हुए सारे रिश्तेतंग-दस्ती के सबब सारी फ़ज़ाएँ बेहालइक जहन्नम की तरह था ये मिरा गहवाराइस जहन्नम में मेरे बाप ने दम तोड़ दियाटूट कर रह गए बचपन के सुहाने सपनेमुझ से मुँह फेर लिया जैसे मिरी शोख़ी नेमेरे हँसते हुए चेहरे पे उदासी छाईजैसे इक रात भयानक मिरे सर पर आईराहें दुश्वार मगर राह-नुमा कोई न थासामने वुसअ'त-ए-अफ़्लाक ख़ुदा कोई न थामेरे अज्दाद की मीरास ये वीरान सा घरजिस को घेरे हुए हर सम्त तबाही के भँवरजिस की छत गिरती हुई टूटा हुआ दरवाज़ाहर तरफ़ जैसे बिखरता हुआ इक शीराज़ान कहीं अतलस-ओ-कमख़्वाब न दीबा-ओ-हरीरहर तरफ़ मुँह को बसोरे हुए जैसे तक़दीरमुझ को उस घर से मोहब्बत तो भला क्या होतीयाँ अगर दिल में न जीने की तमन्ना होतीये समझ कर कि यही है मिरी क़िस्मत का लिखाउस की दीवार के साए में लिपटा रहतालेकिन इस दिल की ख़लिश ने मुझे बेदार कियामुझ को हालात से आमादा-ए-पैकार कियाबे-कसी रख़्त-ए-सफ़र बन कर मिरे साथ चलीयाद आई थी मुझे गाँव की एक एक गलीलहलहाती हुई फ़सलें वो मिरे आम के बाग़वो मकानों में लरज़ते हुए धुँदले से चराग़दूर तक पानी में फैले हुए वो धान के खेतऔर तालाब-किनारे वो चमकती हुई रेतमेरे हम-उम्र वो साथी वो मिरे हम-जोलीमेरे स्कूल के वो दोस्त मिरी वो टोलीएक बार उन की निगाहों ने मुझे देखा थाजैसे इक बार मिरे दिल ने भी कुछ सोचा था''मैं ने जब वादी-ए-ग़ुर्बत में क़दम रक्खा थादूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को''
रुख़्सार पे मौज-ए-रंगीनीकच्ची चाँदी सच्ची चीनीआँखों में नुक़ूश-ए-ख़ुद-बीनीमुखड़े पे सहर की शीरीनीये कौन उठा है शरमाता
अज़ीज़ माँ मिरी हँसमुख मिरी बहादुर माँतमाम जौहर-ए-फ़ितरत जगा दिए तू नेमोहब्बत अपने चमन से गुलों से ख़ारों सेमोहब्बतों के ख़ज़ाने लुटा दिए तू नेबना बना के मिटाए गए नुक़ूश-ए-अमलतिरे बग़ैर मुकम्मल न हो सकी तस्वीरवो ख़्वाब झांसी की रानी को जिस ने चौंकायातिरा जिहाद-ए-मुसलसल उसी की है ता'बीरउसे हयात का सोला सिंगार कहते हैंतिरी जबीं पे हैं कुछ सिलवटें भी टीका भीनज़र में जज़्ब-ए-यक़ीं दिल में सोज़-ए-आज़ादीदहकता फूल भी है तू महकता शो'ला भीज़रा ज़मीन को मेहवर पे घूम लेने देसमाज तुझ से तिरा सोज़-ओ-साज़ मांगेगीजमाल सीखेगा ख़ुद-ए'तिमादियाँ तुझ सेहयात-ए-नौ तिरे दिल का गुदाज़ मांगेगी
अब गवारा हुई क्यूँ ग़ैर की सोहबत तुझ कोक्यूँ पसंद आ गई ना-जिंस की शिरकत तुझ कोऔज-ए-तक़्दीस को पस्ती की अदा भा गई क्यूँतेरी तन्हाई की जन्नत पे ख़िज़ाँ छा गई क्यूँशेर ओ रूमान के वो ख़्वाब कहाँ हैं तेरेवो नुक़ूश-ए-गुल-ओ-महताब कहाँ हैं तेरेकौन सी तुर्फ़ा अदा भा गई इस दुनिया मेंख़ुल्द को छोड़ के क्यूँ आ गई इस दुनिया मेंहो गई आम तू नूर-ए-मह-ए-ताबाँ की तरहआह क्यूँ जल न बुझी शम-ए-शबिस्ताँ की तरहअपनी दोशीज़ा बहारों को न खोना था कभीवो कली थी तू जिसे फूल न होना था कभीइफ़्फ़तें मिट के जवानी को मिटा जाती हैंफूल कुम्हलाते हैं कलियाँ कहीं कुम्हलाती हैंबुलबुल-ए-मस्त-नवा दश्त में क्यूँ रहने लगीनग़्म-ए-तर की जगह मर्सिया क्यूँ कहने लगीहवस-आलूदा हुई पाक जवानी तेरीग़ैर की रात है अब और कहानी तेरीकिस को मालूम था तू इस क़दर अर्ज़ां होगीज़ीनत-ए-महफ़िल ओ पामाल-ए-शबिस्ताँ होगीजज़्ब-ए-इफ़्फ़त का मयस्सर था जो इरफ़ाँ तुझ कोक्यूँ न मर्ग़ूब हुआ शेवा-ए-जानाँ तुझ कोतीरगी हिर्स की हूरों को भी बहका ही गईतेरे बिस्तर पे भी आख़िर को शिकन आ ही गईअब नहीं तुझ में वो हूरों की सी इफ़्फ़त बाक़ीहूर थी तुझ में, गई, रह गई औरत बाक़ीहाँ वो औरत जिसे बच्चों का फ़साना कहिएबरबत-ए-नफ़्स का इक फ़ुहश तराना कहिएजिस में है ज़हर उफ़ूनत का वो पैमाना कहेंइक गुनाहों का भभकता हुआ मय-ख़ाना कहेंनौहा-ख़्वाँ अपनी जवाँ मौत का होने दे मुझेमुस्कुरा तू मगर इस हाल पे रोने दे मुझे
नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठनामिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना
ख़्वाब अब हुस्न-ए-तसव्वुर के उफ़ुक़ से हैं परेदिल के इक जज़्बा-ए-मासूम ने देखे थे जो ख़्वाबऔर ताबीरों के तपते हुए सहराओं मेंतिश्नगी आबला-पा शोला-ब-कफ़ मौज-ए-सराबये तो मुमकिन नहीं बचपन का कोई दिन मिल जाएया पलट आए कोई साअत-ए-नायाब-ए-शबाबफूट निकले किसी अफ़्सुर्दा तबस्सुम से किरनया दमक उट्ठे किसी दस्त-ए-बुरीदा में गुलाबआह पत्थर की लकीरें हैं कि यादों के नुक़ूशकौन लिख सकता है फिर उम्र-ए-गुज़िश्ता की किताबबीते लम्हात के सोए हुए तूफ़ानों मेंतैरते फिरते हैं फूटी हुई आँखों के हुबाबताबिश-ए-रंग-ए-शफ़क़ आतिश-ए-रू-ए-ख़ुर्शीदमिल के चेहरे पे सहर आई है ख़ून-ए-अहबाबजाने किस मोड़ पे किस राह में क्या बीती हैकिस से मुमकिन है तमन्नाओं के ज़ख़्मों का हिसाबआस्तीनों को पुकारेंगे कहाँ तक आँसूअब तो दामन को पकड़ते हैं लहू के गिर्दाबदेखती फिरती है एक एक मुँह ख़ामोशीजाने क्या बात है शर्मिंदा है अंदाज़-ए-ख़िताबदर-ब-दर ठोकरें खाते हुए फिरते हैं सवालऔर मुजरिम की तरह उन से गुरेज़ाँ है जवाबसरकशी फिर मैं तुझे आज सदा देता हूँमैं तिरा शाइर-ए-आवरा ओ बे-बाक-ओ-ख़राबफेंक फिर जज़्बा-ए-बे-ताब की आलम पे कमंदएक ख़्वाब और भी ऐ हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
क़ैद है क़ैद की मीआद नहींजौर है जौर की फ़रियाद नहीं दाद नहींरात है रात की ख़ामोशी है तन्हाई हैदूर महबस की फ़सीलों से बहुत दूर कहींसीना-ए-शहर की गहराई से घंटों की सदा आती हैचौंक जाता है दिमाग़झिलमिला जाती है अन्फ़ास की लौजाग उठती है मिरी शम-ए-शबिस्तान-ए-ख़यालज़िंदगानी की एक इक बात की याद आती हैशाह-राहों में गली कूचों में इंसानों की भीड़उन के मसरूफ़ क़दमउन के माथे पे तरद्दुद के नुक़ूशउन की आँखों में ग़म-ए-दोश और अंदेशा-ए-फ़र्दा का ख़यालसैकड़ों लाखों क़दमसैकड़ों लाखों क़दमसैकड़ों लाखों धड़कते हुए इंसानों के दिलजौर-ए-शाही से ग़मीं जब्र-ए-सियासत से निढालजाने किस मोड़ पे ये धन से धमाका हो जाएँसालहा-साल की अफ़्सुर्दा ओ मजबूर जवानी की उमंगतौक़ ओ ज़ंजीर से लिपटी हुई सो जाती हैकरवटें लेने में ज़ंजीर की झंकार का शोरख़्वाब में ज़ीस्त की शोरिश का पता देता हैमुझे ग़म है कि मिरा गंज-ए-गिराँ-माया-ए-उम्रनज़्र-ए-ज़िन्दाँ हुआनज़्र-ए-आज़ादी-ए-ज़िन्दान-ए-वतन क्यूँ न हुआ
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