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नज़्म
हज़ारों ज़ुल्फ़-ए-परी-वश के याँ थे सौदाई
हज़ारों मय-कश-ओ-मय-ख़्वार-ओ-मस्त-ओ-सहबाई
मोहम्मद अली तिशना
नज़्म
यहाँ तक टूट कर बरसें कि पानी
वस्ल की मिट्टी में ख़ुश्बू गूँध ले और फिर सरों तक से गुज़र जाए
नोशी गिलानी
नज़्म
धीमी धीमी बहने वाली एक नहर-ए-दिल-नशीं
आब-ए-जू छोटी सी इक नाज़ुक ख़िराम-ओ-नाज़नीं
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
हक़ीक़ी दुश्मनी को दोस्ती के मक्र पर वर पैरहन पर
ख़्वाह इस में फ़ाएदा ही क्यूँ न हो