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नज़्म
संगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैं
और आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बे-जान रिदाएँ मत डालो
सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं