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नज़्म
कुछ तिनके शोख़ी करते हैं सैलाब के सरकश धारे से
मिंदील सरों से गिरती है और पाँव से रौंदी जाती है
जमील मज़हरी
नज़्म
रौंदी कुचली आवाज़ों के शोर से धरती गूँज उठी है
दुनिया के ईना-ए-नगर में हक़ की पहली गूँज उठी है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जहाँ अरमाँ भरे दिल ख़ून के आँसू न रोते हों
जहाँ रौंदी न जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
ये सुन के उन से हँस हँस कहती है शोख़ रंडी