aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "rome"
रोम के बुत हों कि पैरिस की हो मोनालीज़ाकीट्स की क़ब्र हो या तुर्बत-ए-फ़िरदौसी होक़र्तबा हो कि अजंता कि मोहनजोदाड़ोदीदा-ए-शौक़ न महरूम-ए-नज़र-बोसी हो
मैं जानना चाहता हूँजब रोम जल रहा थातब वहाँ कौन कौन लोग मौजूद थेकिस शख़्स के कान बाँसुरी की आवाज़ पर लगे हुए थेऔर किस शख़्स की आँखेंआग की रौशनी में चमक रही थीं
यहाँ गोरीच चलती हैतो जैसे रूह छिलती हैज़मिस्ताँ आ के रुकता हैतो इक इक रोम दिखता हैतअ'ज्जुब है मुझे पल पलकि अब के साल वादी मेंहमारी शाल वादी मेंसुनहरी धूप अब तक पर्बतों पर रक़्स करती हैअभी तक साँस की हिद्दत लबों को गर्म रखती हैरगों में ख़ून का दौरान अब तक है दोपहरों साख़िज़ाँ के ज़र्द चेहरे पर शरारत अब भी बाक़ी हैअभी पत्तों ने अपने अतलसी जामे नहीं बदलेसिसकती और डरती शामें अब तक मुस्कुराती हैंक्यूँ अब तक तितलियाँ फूलों पे आ कि खिलखिलाती हैंअभी नीलाहटें बादल के धोके में नहीं आईंअभी तक नद्दियाँ कोहरे के क़ब्ज़े में नहीं आईंगुज़िश्ता सब महीनों कोयहाँ सारे मकीनों कोअजब ये फ़िक्र लाहिक़ हैये अपने सर्द लहजे में अभी तक क्यूँ नहीं बोलाये उस बे-दर्द लहजे में अभी तक क्यूँ नहीं बोलादिसम्बर आ गया है क्या
ज़मीनमिरी नज़रों में ऐ मिर्रीख़ तेरा दर्जा आ'ला हैबुलंदी पर तू रहता है तिरी क़िस्मत भी बाला हैमिर्रीख़बुलंदी और पस्ती का कभी धोका नहीं खाएँज़मीं ऊपर दिखाई दे अगर मिर्रीख़ पर आएँज़मीनतुझे माना है देवता जंग का नादान लोगों नेतबाही का दिया इल्ज़ाम तुझ को रोम वालों नेतुझे भारत के दानिश-वर सदा मनहूस कहते हैंतुझे कहते रहे मंगल कभी जल्लाद कहते हैंबता ऐ सुर्ख़ सय्यारे तिरे हालात कैसे हैंतिरे तालाब कैसे हैं तिरे बाग़ात कैसे हैंतिरे पाकीज़ा दामन में मनाज़िर कैसे कैसे हैंतिरी आग़ोश के अंदर नवादिर कैसे कैसे हैंमिर्रीख़नहीं मिर्रीख़ पर झीलें न चश्मा ही उबलता हैसमुंदर है न दरिया है न कोई मोती मिलता हैन बुलबुल के तराने हैं न कोई गुल महकता हैपरिंदा भी नहीं कोई ख़ुशी से जो चहकता हैयहाँ जुगनू नहीं कोई जो ज़ुल्मत में चमकता हैन हीरा और नीलम है हमेशा जो दमकता हैहवा का कोई झोंका है न सब्ज़ा लहलहाता हैन बत्तखों की क़तारें हैं न ताइर चहचहाता हैनसीम-ए-सुब्ह चलती है न बादल और पानी हैन गुलशन है यहाँ कोई न मौजों की रवानी हैमिरे क़ुतबैन को देखो वहाँ यख़-बस्ता पानी हैयही पानी यहाँ पर ज़िंदगानी की निशानी हैज़मीं के लोग कहते हैं कि नहरों की रवानी हैहक़ीक़त में नहीं ऐसा फ़क़त झूटी कहानी हैयहाँ सूरत नज़र आती है आबशारों कीनज़र आती है कसरत हर तरफ़ संगलाख़ ग़ारों कीयहाँ है गहरा सन्नाटा ख़मोशी की हुकूमत हैफ़ज़ा भी ख़ुश्क है मेरी नहीं कोई रतूबत हैज़मीनशरीक-ए-बज़्म हो मिस्टर अतारिद तुम भी कुछ बोलोज़बाँ पर लग गया ताला तो इस महफ़िल में तुम खोलोअतारदपड़ोसी हूँ मैं सूरज का नमूना हूँ जहन्नुम कायहाँ शिद्दत की गर्मी है तो मुमकिन ही नहीं जीनाज़मीनमिरे नज़दीक हो ज़ोहरा बहुत रख़्शंदा सय्यारायहाँ सब लोग कहते हैं कि तुम हो सुब्ह का ताराज़ोहरामुनव्वर मेरा चेहरा है मैं गर्मी का मारा हूँज़मीं है मुझ को प्यारी मैं ज़मीं वालों का प्यारा हूँज़मीनअज़ीमुश्शान जुस्सा है हमारी मंत्री तुम होजिसे ज़ेबा है सरदारी वो बे-शक मुश्तरी तुम होमुश्तरीबड़ा है जिस्म मेरा और ज़ीनत कुछ नहीं मुझ मेंबड़ा सा गोल-गप्पा हूँ सबाहत कुछ नहीं मुझ मेंज़मीनहमारी अंजुमन में ऐ ज़ुहल तुम ही निराले होतुम्हारे गिर्द हल्क़ा है अनोखी शक्ल वाले होज़ुहलगले में तौक़ है मेरे मिरी सूरत निराली हैअगर नज़दीक से देखें तो ये शय तेज़ आँधी हैनज़र आता है जो हल्क़ा वो हैं छोटे बड़े पत्थरलगाते हैं बड़ी तादाद में चारों तरफ़ चक्करज़मीनमिरे दो भाई हैं आगे तुम्हारा हाल कैसा हैवहाँ है कैफ़ियत कैसी वहाँ माहौल कैसा हैयूरेनसयहाँ शिद्दत की सर्दी है लिहाज़ा मैं भी ठंडा हूँज़रा मेरी तरफ़ देखो बड़ा सा गोला गंडा हूँनेपचूनमुझे नेपचून कहते हैं उसी कुँबे का हूँ मेम्बरबहुत दूरी है सूरज से लगाता हूँ बड़ा चक्करमिर्रीख़मैं पहुँचा इस नतीजे पर ज़मीं पर ख़ुश-नुमाई हैख़ुदा ने फूल और पौदों से ये दुनिया सजाई हैज़मीं पर ज़िंदगी है हुस्न है और दिलरुबाई हैमुझे उल्फ़त ज़मीं से है वही दिल में समाई हैवहाँ आबाद हैं इंसाँ वहाँ शान-ए-ख़ुदाई हैहमारी कहकशाँ में ऐसी क़िस्मत किस ने पाई है
मैं तड़पता हूँमैं बहुत तड़पता हूँकि वहाँ लौट जाऊँ जहाँ से मेरी उम्र शुरूअ' हुई थीजहाँ मेरे दिन रात मेरी मिट्टी की महक से महकते थेज़मीन भर की धूप में से मेरे हिस्से की धूपमेरे रोम रोम को सेंकती थीसितारों भरे आसमान में से मेरे नाम का सिताराबदन की अग्नी बन के मेरे हिस्से की दुल्हन कोनदी के पानी से बनी हुई सेज पे उतारता थाऔर अन-देखी तह में तैरती मछलियों की साँस को संगीत कर देता थारात में छुपे हुए दिन कोऔर दिन में छुपी हुई रात कोएक दूसरे के पास ला के ख़ुद कहीं छुप जाता थाफिर झाग से झाग निकलता थाऔर झाग से अन-गिनत मूर्तियाँ बनती थींतब उन्हें पूजने की तिजारत ईजाद नहीं हुई थीतब आग हरी घास को नहीं जलाती थीसिवाए इस के कि पाँव पर रेंगती हुई च्यूँटी हाथ की पकड़ में आ जाती थीकाएनात भर की भूक और प्यास कीसींचाई करते हुए किसान और खुदाई करते हुए मज़दूरअभी खेत और फ़स्ल और कच्चे पक्के घर और दीवारों और जीवन मरनऔर शमशान भूम और क़ब्रों से पहचाने तो जाते थेअभी बाज़ारों में घूमते फिरते नंगे पागलोंऔर उन के हिस्से की गालियों और पत्थरों की पहचान से ज़िंदगी की पहचान तो होती थीअभी रात के सफ़र में किसी अन-देखे जहान सेमेरी दुनिया के जंगलों में उतरते जुगनुओं के झुण्ड चहक चहक केसुधारी हुई रूहों का अता पता बताते थेअफ़्सोस अब मैं वहाँ लौटना चाहूँ भीतो ख़ुद पर इतना गुज़र चुका हूँ कि लौट नहीं सकता
सवेरे ऐसा लगाजैसे कोई दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हैउठ कर देखा तो कोई नहीं थाखट खट की आवाज़ पर ध्यान दियातो खिड़की के पट पर बैठा नज़र आया एक परिंदाचोंच से बना रहा था नक़्श-ओ-निगारक्यों भई मैं ने पूछा तो कहने लगाकिराए पर चाहिए एक टहनी जिस पर बना सकूँ अपना घोंसलाअपनी तो जैसे-तैसे कट ही जाएगीलेकिन बाल-बच्चों का क्या होगाआप के भाई बंदों ने काट डाले जंगलऔर दे दिया देस निकालासवाब की निय्यत से भले आदमी दालान में रख देते हैं पानी की कटोरी और दानापेट की आग बुझाने को थोड़ा सा खा पी लेते हैंछत भले न हो खाना तो चाहिए हीकभी लगता है बिजली के तार छू कर ख़ुद-कुशी कर लूँया ऊँचे मोबाइल टॉवरों से टकरा कर जान दे दूँजैसे किसानों को ख़ुद-कुशी के बाद सरकार कुछ इमदाद दे देती हैशायद कोई गोशा हमें भी अलॉट कर दे बच्चों के लिएये सुन कर मैं तो चकरा गयाइस तरफ़ तो सच-मुच मैं ने कोई ध्यान नहीं दिया थाजंगलों को काटते समय किस ने सोचा होगा किये बे-ज़बान कहाँ जाएँगेमैं ने हाथ जोड़ कर कहाइन ज़ालिमों की तरफ़ से मैं मुआ'फ़ी माँगता हूँख़ुदा के वास्ते ख़ुद-कुशी का ख़याल दिल में न लानाजब तक जी चाहे मेरी कुंडी में लगे वन रोम किचन ही में गुज़ारा कर लोकुछ तंगी सही लेकिन इंतिज़ाम हो जाएगाउस ने कहामेहरबानी मगर मैं किराया अदा करने का अहल नहींमैं ने कहा सुब्ह-शाम अपनी मीठी बोली सुना दिया करना बसमुझे और कुछ नहीं चाहिएउस ने कहामेरे धन्य भाग कि आप जैसे हमदर्द इंसान से मुलाक़ात हो गईलेकिन हर कोई तो आप जैसा नहींऔर फिर मेरे बाक़ी हम-जिंसों का क्या होगामैं ने कहाउन्हें भी कहीं न कहीं सर छुपाने को जगह मिल जाएगीमगर ख़ुदारा तुम ख़ुद-कुशी का इरादा तर्क कर दोहम झाड़ लगाएँगे और उन की हिफ़ाज़त भी करेंगेये सुनते ही वो ख़ुशी ख़ुशी तिनके जम्अ करने में मगन हो गयाऔरमैं घर में आप को ये सारा माजरा सुनाने चला आयाइस नन्हे से परिंदे की खट खट ने गोया मेरे दिल-ओ-दिमाग़ केदरवाज़े खोल दिएये सुन कर या पढ़ कर आप भी अपने आँगन में एक झाड़ तोलगाएँगे नाया कुंडी में एक बीज तो बोएँगे नाकम-अज़-कम एक बीज
तुम नहीं हो मिटने वाली नहींपाती हो जनम तुम नए नएहर नई बहार के फूलों मेंमानिंद-ए-हयात तुम्हारे पत्ते भी पीले पड़ जाते हैंमानिंद-ए-हयात तुम्हें भी ढक देती है बर्फ़पर तुम्हारी मिट्टी में प्रीतिपक्के बचनों के बीज दबे हैंपूरा होना है जिन को बसर अवे में भीपीत न करने की ये धुन बे-कार हैये महकार भरा झोंकालौट आता है एक न एक दिनआत्म नगर मेंजैसे रात सितारों भरीऔर समाने लगती हो तुम रोम रोम में प्रीतिपहले से पाकीज़ातुम पाक हो और इसी कारन हुआ अमरजब तुम होती हो तब नीलाहट सेझुण्ड के झुण्ड सफ़ेद मुलाएम हंसों केजिन को हम मरे-खपे समझे थेलौट आते हैंफूल फूल से पत्तियाँ खिलाती रहती हो तुम नई नईतुम सदा सदा के नूर को राग बना देती होनई नई आवाज़ों से जन्मा हुआ रागतुम अमर हो प्रीतिजैसे बहार
किसी रोज़ मैं शहर के पागलों को डिनर पर बुलाऊँगाअन से कहूँगा किऐ दोस्तो, दुश्मनों, मेहरबानो, कमीनोये माना कि तुम कहकशाँ के जरासीम होऔर सब रास्ते रोम ही को गए हैंमगर अबइटाली से आती हुई इक सड़क के सिपाही की सीटी सुनोजो कहती है तुम मर चुके होनहीं तो मैं चलती हुई कार से कूद कर अपने बत्तीस दाँतोंको फ़ुट-पाथ परडॉक्टर फ़ानचो के हवाले करदूंगा
2उधर जब वक़्त का सय्याल धाराएक दो लम्हों को रुकता हैन जाने क्यूँ मिरे अंदर लहू का तेज़-तर हो करहरीम-ए-दिल की दीवारों से अपना सर पटकता हैये पीर-ए-रोम के मरक़द पे रक़्साँउन ख़ुदा-आगाह दरवेशों की सूरत रक़्स करता हैजिन्हें ख़ुद अपने तन-मन की कोई सुध-बुध नहीं रहतीवो सर-ता-पा फ़क़त रूह-ए-ताम की तमसील लगते हैंकिसी ऐसे अबद लम्हे में जिस्म-ओ-जाँ की इस वहदत का कोई नाम तो होगासरापा रक़्स की उस हालत-ए-बे-नाम का अंजाम तो होगातुम्ही बोलो कि उस का नाम क्या अंजाम क्या हैहाँ तुम्ही बोलो गिरह खोलो
ईश्वर की हत्या करने के बा'दएक बे-कोहान लंगड़े ऊँट परहर उजाला और अँधेरा फाँदतासौर-मण्डल के मरुस्थल मेंहिरासाँ भागता हूँमेरे पीछे आने वालाचीख़ते चिंघाड़ते बिछड़े गजों का ग़ोलमुझ कोज़द से बाहर देखवापस जा रहा हैऔर मक़्तूल ईश्वर कीआत्मा कीविश बुझी कुछ सूइयाँ सीरोम छिद्रों में मुसलसल चुभ रही हैंऔर सारे जिस्म मेंख़ौफ़ घुलता जा रहा है
बताऊँ किस से कि मैं मुंतज़िर हूँ जिस दिन कावो शायद अब न कभी आएगा ज़माने मेंकहाँ पे है मिरा गोडो मुझे ख़बर ही नहींउसे मैं ढूँड चुका रोम और लंदन मेंन मास्को में मिला और न चीन ओ पैरिस मेंभला मिलेगा कहाँ बम्बई की गलियों में
अगली शामवो मुझे एरोज़न के मा'बद में मिलीजिस के चारों ओरसियाह जंगल की बाढ़ थीउस मा'बद को सारा रोमउम्मीद भरी नज़रों से देखता था
‘अहद-ए-पारीना में भीज़ीस्त पर था वहम का कितना असरएक ओरेकल की तलक़ीं मान करशाह आगस्तस की बीवी लीवियाअपनी अंगिया की फ़ज़ा-ए-गर्म में रखती थी इक मुर्ग़ी का अण्डा रोज़-ओ-शबउस को ये विश्वास थाउस के होने वाले बच्चे और उस चूज़े की जिंसएक हो गई आख़िरश यूँही हुआआशियान-ए-गर्म-ओ-शोख़-ओ-नर्म सेएक नर निकला तो उस की कोख से भी एक नर पैदा हुआ टाएबेरियसऔर फिर इस इत्तिफ़ाक़ी वाक़'ए ने तो ज़बान-ए-रोम में'आम कर दी बैज़ा-ए-महरम की तर्बिय्यत की रस्म
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन केअश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैंना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाबबाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
हमारा फ़ख़्र था फ़क़्र और दानिश अपनी पूँजी थीनसब-नामों के हम ने कितने ही परचम लपेटे हैंमिरे हम-शहर 'ज़रयून' इक फ़ुसूँ है नस्ल, हम दोनोंफ़क़त आदम के बेटे हैं फ़क़त आदम के बेटे हैंमैं जब औसान अपने खोने लगता हूँ तो हँसता हूँमैं तुम को याद कर के रोने लगता हूँ तो हँसता हूँहमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ख़ुदा हाफ़िज़ख़ुदा हाफ़िज़
हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैंआँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैंऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
जब धरती सहरा सहरा थीहम दरिया दरिया रोए थेजब हाथ की रेखाएँ चुप थींऔर सुर संगीत में सोए थेतब हम ने जीवन-खेती मेंकुछ ख़्वाब अनोखे बोए थे
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
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