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नज़्म
यही वो मंज़िल-ए-मक़्सूद है कि जिस के लिए
बड़े ही अज़्म से अपने सफ़र पे निकले थे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
कि जब खमीर-ए-आब-ओ-गिल से वो जुदा हुए
तो उन को सम्त-ए-राह-ए-नौ की कामरानियाँ मिलें
नून मीम राशिद
नज़्म
फिर आहिस्ता आहिस्ता तारीक होने लगी थी कि अंधा मुसाफ़िर
उछल कर किसी सम्त-ए-बे-नाम को चल दया था