aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "saum"
हो तुझ से तर्क-ए-सौम-ओ-सलात-ओ-ज़कात-ओ-हजकुछ डर नहीं जनाब-ए-रिसालत-पनाह का
कभी नमाज़ियों में सौम और सलात पे नाज़ग़रज़ कि उस को है अपनी हर एक बात पे नाज़
तिरी क़ुर्बत की ‘अजवह गर मयस्सर होतो फिर इफ़्तार-ए-सौम-ए-हिज्र हो जाए
ख़ुद से इस बात पे सौ बार वो उलझा होगाकल वो आएगी तो मैं उस से नहीं बोलूँगा
सुख़न सौ तरह से इक रम्ज़ की रुस्वाई करता हैसुख़न बकवास है बकवास जो ठहरा है फ़न मेरा
बच्चे की सौ भोली सूरतअब तक ज़िद करने की आदत
बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा
ये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौत
ख़ून फिर ख़ून है सौ शक्ल बदल सकता हैऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए न बने
याक़ूत पिघलते रहते हैंअब अपनी गुम-सुम आँखों में
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
नम आँखों सेगुम-सुम मुझ को देख रहे हैं
बोलो तुम को कैसे रोकूँदुनिया सौ इल्ज़ाम धरेगी
सौ ज़ख़्म थे नस नस मेंघायल थे रग-ओ-रेशा
सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थीअब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है
कि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तोकितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैं
सौ बार बसे और उजड़ गएसौ बार लुटे और भर पाया
सब बात समझ रहा है लेकिनगुम-सुम सा मुझ को देखता है
जब आँसुओं को मयस्सर हज़ार शाने थेजब इंतिज़ार न करने के सौ बहाने थे
ला कोई नग़्मा कोई सौत तिरी उम्र दराज़नौहा-ए-ग़म ही सही शोर-ए-शहादत ही सही
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