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नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
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खालिद इरफ़ान
नज़्म
लर्ज़ा-बर-अंदाम है सेहन-ए-ज़मीं का अर्ज़-ओ-तूल
हो रहा है ख़ाक पर नापाक रूहों का नुज़ूल
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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लर्ज़ा-बर-अंदाम है सेहन-ए-ज़मीं का अर्ज़-ओ-तूल
हो रहा है ख़ाक पर नापाक रूहों का नुज़ूल