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नज़्म
आज पैरों में थिरकते हैं तिरे नाज़-ओ-अदा
मेरे नग़्मों को तू पुर-कैफ़ बना देती है
विनोद कुमार त्रिपाठी बशर
नज़्म
जहाँ सर्द पुरवाइयों के थपेड़े थिरकते मिलेंगे
उमूदी ढलानों का इक सिलसिला भी मिलेगा अचानक
अम्बर बहराईची
नज़्म
ग़रीबों का मुक़द्दस ख़ून पी पी कर बहकती है
महल में नाचती है रक़्स-गाहों में थिरकती है