aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "tii.n"
ये तीन कोट हैं पतलून हैं ये टाइयाँ हैंबंधी हुई हैं ये सब तुम को कुछ नहीं करनाये 'वेलियम' है 'ओनटल' है और 'टरपटी-नाल'तुम इन के साथ मिरी जाँ ड्रिंक से डरना
जहाँ-ज़ादएक तू और एक वो और एक मैंये तीन ज़ाविए किसी मुसल्लस-ए-क़दीम केहमेशा घूमते रहेकि जैसे मेरा चाक घूमता रहामगर न अपने-आप का कोई सुराग़ पा सकेमुसल्लस-ए-क़दीम को मैं तोड दूँ, जो तू कहे, मगर नहींजो सेहर मुझ पे चाक का वही है इस मुसल्लस-ए-क़दीम कानिगाहें मेरे चाक की जो मुझ को देखती हैंघूमते हुएसुबू-ओ-जाम पर तिरा बदन तिरा ही रंग तेरी नाज़ुकीबरस पड़ीवो कीमिया-गरी तिरे जमाल की बरस पड़ीमैं सैल-ए-नूर-ए-अंदरूँ से धुल गया!मिरे दरों की ख़ल्क़ यूँ गली गली निकल पड़ीकि जैसे सुब्ह की अज़ाँ सुनाई दी!तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गएनशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गईयही प्याला-ओ-सुराही-ओ-सुबू का मरहला है वोकि जब खमीर-ए-आब-ओ-गिल से वो जुदा हुएतो उन को सम्त-ए-राह-ए-नौ की कामरानियाँ मिलेंमैं इक ग़रीब कूज़ा-गरये इंतिहा-ऐ-मारिफतये हर प्याला-ओ-सुराही-ओ-सुबू की इंतिहा-ए-मारिफतमुझे हो इस की क्या ख़बर?
ज़ालिमजश्न है मातम-ए-उम्मीद का आओ लोगोमर्ग-ए-अम्बोह का त्यौहार मनाओ लोगोअदम-आबाद को आबाद किया है मैं नेतुम को दिन रात से आज़ाद किया है मैं नेजल्वा-ए-सुब्ह से क्या माँगते होबिस्तर-ए-ख़्वाब से क्या चाहते होसारी आँखों को तह-ए-तेग़ किया है मैं नेसारे ख़्वाबों का गला घूँट दिया है मैं नेअब न लहकेगी किसी शाख़ पे फूलों की हिनाफ़स्ल-ए-गुल आएगी नमरूद के अँगार लिएअब न बरसात में बरसेगी गुहर की बरखाअब्र आएगा ख़स-ओ-ख़ार के अम्बार लिएमेरा मस्लक भी नया राह-ए-तरीक़त भी नईमेरे क़ानूँ भी नए मेरी शरीअत भी नईअब फ़क़ीहान-ए-हरम दस्त-ए-सनम चूमेंगेसर्व-क़द मिट्टी के बौनों के क़दम चूमेंगेफ़र्श पर आज दर-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा बंद हुआअर्श पर आज हर इक बाब-ए-दुआ बंद हुआ
आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायदऐसा ही अंदाज़ा है कुछ साइंस काचार एशारिया बिलियन सालों की उम्र तो बीत चुकी हैकितनी देर लगा दी तुम ने आने मेंऔर अब मिल करकिस दुनिया की दुनिया-दारी सोच रही होकिस मज़हब और ज़ात और पात की फ़िक्र लगी हैआओ चलें अबतीन ही बिलियन साल बचे हैं
एक आया गया दूसरा आएगा देर से देखता हूँ यूँही रात उस की गुज़र जाएगीमैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिए मुझ को क्या काम है याद आता नहीं याद भी टिमटिमाताहुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुई और झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा हैमगर मेरे कानों ने कैसे उसे सुन लिया एक आँधी चली चल के मिटभी गई आज तक मेरे कानों में मौजूद है साएँ साएँ मचलती हुई औरउबलती हुई फैलती फैलती देर से मैं खड़ा हूँ यहाँ एक आया गयादूसरा आएगा रात उस की गुज़र जाएगी एक हंगामा बरपा है देखें जिधरआ रहे हैं कई लोग चलते हुए और टहलते हुए और रुकते हुए फिर सेबढ़ते हुए और लपकते हुए आ रहे जा रहे हैं इधर से उधर और उधर सेइधर जैसे दिल में मिरे ध्यान की लहर से एक तूफ़ान है वैसे आँखेंमिरी देखती ही चली जा रही हैं कि इक टिमटिमाते दिए की किरन ज़िंदगी को फिसलतेहुए और गिरते हुए ढब से ज़ाहिर किए जा रही है मुझे ध्यानआता है अब तीरगी इक उजाला बनी है मगर इस उजाले से रिसती चली जा रहीहैं वो अमृत की बूँदें जिन्हें मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहा हूँ हथेलीमगर टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई थी लपक से उजाला हुआ लौ गिरी फिर अंधेरा साछाने लगा बैठता बैठता बैठ कर एक ही पल में उठता हुआ जैसे आँधी केतीखे थपेड़ों से दरवाज़े के ताक़ खुलते रहें बंद होते रहेंफड़फड़ाते हुए ताइर-ए-ज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद मैं देखता ही रहा एक आयागया दूसरा आएगा सोच आई मुझे पाँव बढ़ने से इंकार करतेगए मैं खड़ा ही रहा दिल में इक बूँद ने ये कहा रात यूँही गुज़र जाएगीदिल की इक बूँद को आँख में ले के मैं देखता ही रहा फड़फड़ाते हुए ताइरज़ख़्म-ख़ुर्दा की मानिंद दरवाज़े के ताक़ इक बार जब मिल गए मुझ को आहिस्ता आहिस्ताएहसास होने लगा अब ये ज़ख़्मी परिंदा न तड़पेगा लेकिन मिरे दिल को हर वक़्ततड़पाएगा मैं हथेली पे अपनी सँभाले रहूँगा वो अमृत की बूँदें जिन्हें आँखसे मेरी रिस्ना था लेकिन मिरी ज़िंदगी टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुईऔर झिझकती हुई हर किरन बे-सदा क़हक़हा है कि इस तीरगी में कोई बात ऐसी नहींजिस को पहले अंधेरे में देखा हो मैं ने सफ़र ये उजाले अंधेरे का चलतारहा है तो चलता रहेगा यही रस्म है राह की एक आया गया दूसराआएगा रात ऐसे गुज़र जाएगी टिमटिमाते सितारे बताते थे रस्ते कीनद्दी बही जा रही है बहे जा इस उलझन से ऐसे निकल जा कोई सीधा मंज़िल पे जाताथा लेकिन कई क़ाफ़िले भूल जाते थे अंजुम के दौर-ए-यगाना के मुबहम इशारे मगर वोभी चलते हुए और बढ़ते हुए शाम से पहले ही देख लेते थे मक़्सूद का बंददरवाज़ा खुलने लगा है मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ मुझ को क्या काम है मेरा दरवाज़ाखुलता नहीं है मुझे फैले सहरा की सोई हुई रेग का ज़र्रा ज़र्रा यही कह रहा हैके ऐसे ख़राबे में सूखी हथेली है इक ऐसा तलवा के जिस को किसी ख़ार की नोक चुभने पे भीकह नहीं सकती मुझ को कोई बूँद अपने लहू की पिला दो मगर मैं खड़ा हूँ यहाँ किस लिएकाम कोई नहीं है तो मैं भी इन आते हुए और जाते हुए एक दो तीनलाखों बगूलों में मिल कर यूँही चलते चलते कहीं डूब जाता के जैसे यहाँबहती लहरों में कश्ती हर एक मौज को थाम लेती है अपनी हथेली के फैले कँवलमें मुझे ध्यान आता नहीं है कि इस राह में तो हर इक जाने वाले के बसमें है मंज़िल मैं चल दूँ चलूँ आइए आइए आप क्यूँ इस जगहऐसे चुप-चाप तन्हा खड़े हैं अगर आप कहिए तो हम इक अछूती सी टहनी सेदो फूल बस बस मुझे इस की कोई ज़रूरत नहीं है मैं इकदोस्त का रास्ता देखता हूँ मगर वो चला भी गया है मुझे फिर भीतस्कीन आती नहीं है कि मैं एक सहरा का बाशिंदा मालूम होने लगा हूँ ख़ुदअपनी नज़र में मुझे अब कोई बंद दरवाज़ा खुलता नज़र आए ये बात मुमकिन नहीं हैमैं इक और आँधी का मुश्ताक़ हूँ जो मुझे अपने पर्दे में यकसर छुपा लेमुझे अब ये महसूस होने लगा है सुहाना समाँ जितना बस में था मेरेवो सब एक बहता सा झोंका बना है जिसे हाथ मेरे नहीं रोक सकतेकि मेरी हथेली में अमृत की बूँदें तो बाक़ी नहीं हैं फ़क़त एक फैला हुआख़ुश्क बे-बर्ग बे-रंग सहरा है जिस में ये मुमकिन नहीं मैं कहूँएक आया गया दूसरा आएगा रात मेरी गुज़र जाएगी
तसव्वुरशोख़ियाँ मुज़्तर-निगाह-ए-दीदा-ए-सरशार मेंइशरतें ख़्वाबीदा रंग-ए-ग़ाज़ा-ए-रुख़सार मेंसुर्ख़ होंटों पर तबस्सुम की ज़ियाएँ जिस तरहयासमन के फूल डूबे हों मय-ए-गुलनार मेंसामनाछनती हुई नज़रों से जज़्बात की दुनियाएँबे-ख़्वाबियाँ अफ़्साने महताब तमन्नाएँकुछ उलझी हुई बातें कुछ बहके हुए नग़्मेकुछ अश्क जो आँखों से बे-वज्ह छलक जाएँरुख़्सतफ़सुर्दा रुख़ लबों पर इक नियाज़ आमेज़ ख़ामोशीतबस्सुम मुज़्महिल था मरमरीं हाथों में लर्ज़िश थीवो कैसी बे-कसी थी तेरी पुर-तम्कीं निगाहों मेंवो क्या दुख था तिरी सहमी हुई ख़ामोश आहों में
बहुत ही बड़े एक जंगल में इक बारबहुत ही बड़ा एक ही शेर थाबहुत ही बड़ी उस की मूँछें भी थींबहुत ही बड़ी पूँछ उस शेर की
सीम-गूँ हाथों से ऐ जान ज़राखोल मय-रंग जुनूँ-ख़ेज़ आँखेंउसी मीनार को देखसुब्ह के नूर से शादाब सहीउसी मीनार के साए तले कुछ याद भी हैअपने बेकार ख़ुदा की मानिंदऊँघता है किसी तारीक निहाँ-ख़ाने मेंएक अफ़्लास का मारा हुआ मुल्ला-ए-हज़ींएक इफ़रीत उदासतीन सौ साल की ज़िल्लत का निशाँऐसी ज़िल्लत के नहीं जिस का मुदावा कोई
अल्फ़ाज़ों का एक ख़ज़ाना मेरे पासऔर ख़्वाबों की एक पिटारी तेरे पासमैं तेरे ख़्वाबों का कोई नाम धरूँतुम मेरे लफ़्ज़ों मेंख़्वाब पिरो देनाताकि हम इस लेन-देन मेंभूल सकेंतन्हाई में चुपके चुपके रो देनामैं ने तेरे एक ख़्वाब को बचपन लिखाजिस में तुम ने ख़ुद कोबढ़िया पाया थाऔर कोई तुम से भी इक दोसाल बड़ाचंद बताशे तेरी ख़ातिर लाया थामैं ने एक ख़्वाब को लिखा जवानीजिस में तुम इक तीन साल की बच्ची थीजिस्म ज़ेहन से कच्ची थीसच्ची थीठेठ झूट की जेठ झूट कीशिखर दो-पहरीजिस्म ज़ेहन को दुनिया पुख़्ता करती हैपता है मुझ को नींद में तेरीअब तक मीलोंनन्ही बच्ची ठुमक ठुमक कर चलती हैफिर आता है एक महीना नज़्मों कानाक कान को बेधने वालीरस्मों काऔर बुढ़ापा यहाँ से शुरूअ'नहीं होता
शगुन की बाज़ी लगी पहले यार गंडे कीफिर उस से बढ़ के लगी तीन चार गंडे कीफिरी जो ऐसी तरह बार बार गंडे कीतो आगे लगने लगी फिर हज़ार गंडे कीकमाल निर्ख़ है फिर तो लगा दिवाली का
सब के लिए ना-पसंदीदा उड़ती मक्खीकितनी आज़ादी से मेरे मुँह और मेरे हाथों पर बैठती हैऔर इस रोज़-मर्रा से आज़ाद है जिस में मैं क़ैद हूँमैं तो सुब्ह को घर भर की ख़ाक समेटती जाती हूँऔर मेरा चेहरा ख़ाक पहनता जाता हैदोपहर को धूप और चूल्हे की आगये दोनों मिल कर वार करती हैंगर्दन पे छुरी और अँगारा आँखेंये मेरा शाम का रोज़-मर्रा हैरात भर शौहर की ख़्वाहिश की मशक़्क़तमेरी नींद हैमेरा अंदर तुम्हारा ज़हरहर तीन महीने ब'अद निकाल फेंकता हैतुम बाप नहीं बन सकेमेरा भी जी नहीं करता कि तुम मेरे बच्चे के बाप बनोमिरा बदन मेरी ख़्वाहिश का एहतिराम करता हैमैं अपने नीलो नील बदन से प्यार करती हूँमगर मुझे मक्खी जितनी आज़ादी भी तुम कहाँ दे सकोगेतुम ने औरत को मक्खी बना कर बोतल में बंद करना सीखा है
तीन हमारी बहनें छोटीमिल कर खाएँ आधी रोटीना पतली ना बिल्कुल मोटीमीदू इन में सब से छोटीमीदू ने इक तोता पालाउस तोते का रंग निरालानीचे नीला ऊपर कालाटिड्डे ऐसी आँखों वालाइस तोते की हुई चढ़ाईदिन भर कर के मग़्ज़ खपाईशाम को दी मीदू ने दुहाईइस तोते को लेना भाईलाख पढ़ाएँ ख़ाक न बोलेदुम न हिलाए चोंच न खोलेबहुत कहो तो हौले हौलेफ़र्श पे मारे रह रह ठोलेभाई ने सोचा उस को बुलाएँछेड़ा जो उस को दाएँ बाएँतोता बोला काएँ काएँमीदू बोली हाएँ हाएँमैं ने इस को तोता समझाये तोता तो कव्वा निकलाइस कव्वे की दुम में तागाइस के पीछे छोड़ो कुत्ता
बस्ता फेंक के लो जी भागा रौशन-आरा बाग़ की जानिबचिल्लाता चल गुड्डी चलपक्के जामुन टपकेंगेआँगन की रस्सी से माँ ने कपड़े खोलेऔर तन्नूर पे ला के टीन की चादर डालीसारे दिन के सुखाए पापड़लच्छी ने चादर में लपेटेबच गई रब्बा किया कराया धुल जाना थाख़ैरू ने खेत की सूखी मिट्टीझुर्रियों वाले हाथ में ले करभीगी भीगी आँखों से फिर ऊपर देखाझूम के फिर उठ्ठे हैं बादलटूट के फिर मेंह बरसेगा
झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दियाआकाश को समेट के नीचे गिरा दियाफैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दियाफिर कुछ नहींन खेत, न मैदाँ, न रास्तेबस इक निगाहखिड़की की रंग-जालियाँ(बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)
नन्ही से ये बोलीं नानीमेरी प्यारी गुड़िया रानीआ जा मेरी गोद में आ जासुन ले मुझ से एक कहानीये जो अपनी गोल ज़मीं हैपहले पहल थी पानी पानीसब दुनिया थी एक समुंदरजिस की लहरें थीं तूफ़ानीरफ़्ता रफ़्ता उभरी ख़ुश्कीहौले हौले उतरा पानीपेड़ पहाड़ चट्टानें सहराजंगल का जंगल हैवानीसारी चीज़ें हो गईं पैदातब आई वो सुब्ह सुहानीजब अल्लाह ने हुक्म से अपनेदिखलाने को अपनी निशानीदुनिया में इंसान को भेजाख़ूब बढ़ी नस्ल-ए-इंसानीतुम को सुन कर हैरत होगीमेरी प्यारी गुड़िया रानीहिस्से चार ज़मीं के हों तोएक है ख़ुश्की तीन है पानीलेकिन इस्ति'माल के क़ाबिलज़ियादा पानी नहीं है जानीथोड़ा थोड़ा ख़र्च करें हमशुरूअ' न कर दें नहर बहानी
हम जंग न होने देंविश्व-शांति के हम साधक हैं जंग न होने देंगेकभी न खेतों में फिर ख़ूनी खाद फलेगीखलियानों में नहीं मौत की फ़स्ल खुलेगीआसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगाएटम से नागा-साकी फिर नहीं जलेगायुद्ध-विहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगेजंग न होने देंगेहथियारों के ढेरों पर जिन का है डेरामुँह में शांति बग़ल में बम धोके का फेराकफ़न बेचने वालों से कह दो चिल्ला करदुनिया जान गई है उन का असली चेहराकामयाब हो उन की चालें ढंग न होने देंगेजंग न होने देंगेहमें चाहिए शांति ज़िंदगी हम को प्यारीहमें चाहिए शांति सृजन की है तय्यारीहम ने छेड़ी जंग भूक से बीमारी सेआगे आ कर हाथ बटाए दुनिया सारीहरी-भरी धरती को ख़ूनी रंग न लेने देंगेजंग न होने देंगेभारत पाकिस्तान पड़ोसी साथ साथ रहना हैप्यार करें या वार करें दोनों को ही सहना हैतीन बार लड़ चुके लड़ाई कितना महँगा सौदारूसी बम हो या अमरीकी ख़ून एक बहना हैजो हम पर गुज़री बच्चों के संग न होने देंगेजंग न होने देंगे
दो रस्ते हैंदोनों तेरे घर जाते हैंइस रस्ते से तीन बरस में घर पहुँचेगाउस पर सात बरस लगते हैंजिस पर सात बरस लगते हैं वो रस्ता हमवार भी हैउस रस्ते के दोनों जानिब शहर भी है बाज़ार भी हैतीन बरस वाले रस्ते के बीच में जंगल पड़ता हैजंगल जिस में बरस बरस तकसोने वाले काले अज़दरअपने मक़्नातीसी ज़हर से अपनी जानिब खींचते हैंजंगल जिस के मोहलिक पत्तेपैरों के छालों से लिपट करसारा लहू पी जाते हैंतू मालिक हैजिस रस्ते से जाना चाहे जा सकता है
किसी को क्या दे सकते हो तुम!चाँद किसी को दे सकते हो?तारे?या फिर जगमग जुगनू किसी को दे सकते हो?सूखी शाख़ को हरा सा पत्ताप्यास को शबनम का इक क़तराबुझी बुझी सी आँख को ज्योतिभूक को रोटीदे सकते हो?मुझे बताओ:धूप को साया दे सकते हो?दश्त को दरिया दे सकते हो?तीन सौ पैंसठ दिनों में मुझ कोइक दिन अच्छा दे सकते हो
एक था मुल्ला-नसरुद्दीनकरता था बातें नमकीनकाम था उस का अहमक़ बननासीधी बात को उल्टा करनाखाने पीने का शौक़ीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीनउस से हैं मंसूब लतीफ़ेमज़े मज़े के ढेरों क़िस्सेख़ुशियों की था एक मशीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीनएक गधा था उस के पासएक गधी थी जिस की सासऔर बच्चे थे उस के तीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीन
मास्को, पैरिस और लंदन मेंदेखे मैं ने तीन शराबीसुर्ख़ थीं आँखें रूह गुलाबी
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