aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "utar"
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाजब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दियातुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों मेंनंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों मेंये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों मेंऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियामर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़तामर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ामर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिताऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाजिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार कियाजिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार कियाजिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार कियासंसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती हैचकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती हैमर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती हैऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दियाऔरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी हैअवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी हैये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी हैऔरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
मैं ने माना कि तुम इक पैकर-ए-रानाई होचमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन-आराई होतलअत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई होबिंत-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
मोहब्बतें शौक़ की चटानोंसे घाटियों में उतर गई हैं
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगेये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!तुझे सुब्ह बाज़ार में बूढ़े अत्तार यूसुफ़की दुक्कान पर मैं ने देखातो तेरी निगाहों में वो ताबनाकीथी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँजहां-ज़ाद नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!ये वो दौर था जिस में मैं नेकभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिबपलट कर न देखावो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतलेगिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँवो सर-गोशियों में ये कहतेहसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?वो हम से ख़ुद अपने अमल सेख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़राकि जैसे किसी शहर-ए-मदफ़ून पर वक़्त गुज़रेतग़ारों में मिट्टीकभी जिस की ख़ुश्बू से वारफ़्ता होता था मैंसंग-बस्ता पड़ी थीसुराही-ओ-मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस ओ गुल-दाँमिरी हेच-माया मईशत के इज़हार-ए-फ़न के सहारेशिकस्ता पड़े थेमैं ख़ुद मैं हसन कूज़ा-गर पा-ब-गिल ख़ाक-बर-सर बरहनासर-ए-चाक ज़ोलीदा-मू सर-ब-ज़ानूकिसी ग़म-ज़दा देवता की तरह वाहिमा केगिल-ओ-ला से ख़्वाबों के सय्याल कूज़े बनाता रहा थाजहाँ-ज़ाद नौ साल पहलेतू नादाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थीकि मैं ने हसन कूज़ा-गर नेतिरी क़ाफ़ की सी उफ़ुक़-ताब आँखोंमें देखी है वो ताबनाकीकि जिस से मेरे जिस्म ओ जाँ अब्र ओ महताब कारह-गुज़र बन गए थेजहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब-गूँ रातवो रूद-ए-दजला का साहिलवो कश्ती वो मल्लाह की बंद आँखेंकिसी ख़स्ता-जाँ रंज-बर कूज़ा-गर के लिएएक ही रात वो कुहरबा थीकि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वजूदउस की जाँ उस का पैकरमगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकलाहसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!
उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहमतो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैंतुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भीतो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं
गुलाब चेहरे पे मुस्कुराहटचमकती आँखों में शोख़ जज़्बेवो जब भी कॉलेज की सीढ़ियों सेसहेलियों को लिए उतरतीतो ऐसे लगता था जैसे दिल में उतर रही होकुछ इस तयक़्क़ुन से बात करती थी जैसे दुनियाउसी की आँखों से देखती होवो अपने रस्ते में दिल बिछाती हुई निगाहों से हँस के कहतीतुम्हारे जैसे बहुत से लड़कों से मैं ये बातेंबहुत से बरसों से सुन रही हूँमैं साहिलों की हवा हूँ नीले समुंदरों के लिए बनी हूँवो साहिलों की हवा सी लड़कीजो राह चलती तो ऐसे लगता था जैसे दिल में उतर रही होवो कल मिली तो उसी तरह थीचमकती आँखों में शोख़ जज़्बे गुलाब चेहरे पे मुस्कुराहटकि जैसे चाँदी पिघल रही होमगर जो बोली तो उस के लहजे में वो थकन थीकि जैसे सदियों से दश्त-ए-ज़ुल्मत में चल रही हो
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों सेज़ीना ज़ीना उतर रही है रातयूँ सबा पास से गुज़रती हैजैसे कह दी किसी ने प्यार की बातसेहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जारसर-निगूँ महव हैं बनाने मेंदामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगारशाना-ए-बाम पर दमकता हैमेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमीलख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूमनूर में घुल गया है अर्श का नीलसब्ज़ गोशों में नील-गूँ साएलहलहाते हैं जिस तरह दिल मेंमौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए
आज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम उदासी की छुरी सेअपने दिल को काटेंगेआज हम अपनी पलकों परजलती हुई मोम-बत्ती रख केएक तार पर से गुज़़रेंगेहमें कोई नहीं देखेगामगर हम हर बंद खिड़की की तरफ़देखेंगेहर दरवाज़े के सामने फूल रखेंगेकिसी न किसी बात परहम रोएँगे और अपने रोने परहम हँसेंगेआज मोहब्बत का जन्म-दिन हैआज हम हर दरख़्त के सामने सेगुज़रते हुएटोपी उतार कर उसे सलाम करेंगेहर बादल को देख केहाथ हिलाएँगेहर सितारे का शुक्रिया अदा करेंगेहमारे आँसुओं नेहमारे हथेलियों को छलनी कर दिया हैआज हम अपने दोनों हाथजेबों में डाल कर चलेंगेऔर अगले बरस तक चलते रहेंगे
आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़दुख से भरपूर दिन तमाम हुएऔर कल की ख़बर किसे मालूमदोश-ओ-फ़र्दा की मिट चुकी हैं हुदूदहो न हो अब सहर किसे मालूमज़िंदगी हेच! लेकिन आज की रातएज़दिय्यत है मुमकिन आज की रातआज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़अब न दोहरा फ़साना-हा-ए-अलमअपनी क़िस्मत पे सोगवार न होफ़िक्र-ए-फ़र्दा उतार दे दिल सेउम्र-ए-रफ़्ता पे अश्क-बार न होअहद-ए-ग़म की हिकायतें मत पूछहो चुकीं सब शिकायतें मत पूछआज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़
जो तिरी ज़ात से मंसूब थे उन गीतों कोमुफ़लिसी जिंस बनाने पे उतर आई है
ये शाख़-सार के झूलों में पेंग पड़ते हुएये लाखों पत्तियों का नाचना ये रक़्स-ए-नबातये बे-ख़ुदी-ए-मुसर्रत ये वालिहाना रक़्सये ताल-सम ये छमा-छम कि कान बजते हैंहवा के दोश पे कुछ ऊदी ऊदी शक्लों कीनशे में चूर सी परछाइयाँ थिरकती हुईउफ़ुक़ पे डूबते दिन की झपकती हैं आँखेंख़मोश सोज़-ए-दरूँ से सुलग रही है ये शाम!मिरे मकान के आगे है एक चौड़ा सहन वसीअकभी वो हँसता नज़र आता है कभी वो उदासइसी के बीच में है एक पेड़ पीपल कासुना है मैं ने बुज़ुर्गों से ये कि उम्र उस कीजो कुछ न होगी तो होगी क़रीब छियानवे सालछिड़ी थी हिन्द में जब पहली जंग-ए-आज़ादीजिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगेये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूमवो दार-ओ-गीर वो आज़ादी-ए-वतन की जंगवतन से थी कि ग़नीम-ए-वतन से ग़द्दारीबिफर गए थे हमारे वतन के पीर ओ जवाँदयार-ए-हिन्द में रन पड़ गया था चार तरफ़उसी ज़माने में कहते हैं मेरे दादा नेजब अर्ज़-ए-हिन्द सिंची ख़ून से ''सपूतों'' केमियान-ए-सहन लगाया था ला के इक पौदाजो आब-ओ-आतिश-ओ-ख़ाक-ओ-हवा से पलता हुआख़ुद अपने क़द से ब-जोश-ए-नुमू निकलता हुआफ़ुसून-ए-रूह बनाती रगों में चलता हुआनिगाह-ए-शौक़ के साँचों में रोज़ ढलता हुआसुना है रावियों से दीदनी थी उस की उठानहर इक के देखते ही देखते चढ़ा परवानवही है आज ये छितनार पेड़ पीपल कावो टहनियों के कमंडल लिए जटाधारीज़माना देखे हुए है ये पेड़ बचपन सेरही है इस के लिए दाख़ली कशिश मुझ मेंरहा हूँ देखता चुप-चाप देर तक उस कोमैं खो गया हूँ कई बार इस नज़ारे मेंवो उस की गहरी जड़ें थीं कि ज़िंदगी की जड़ें?पस-ए-सुकून-ए-शजर कोई दिल धड़कता थामैं देखता था उसे हसती-ए-बशर की तरहकभी उदास कभी शादमाँ कभी गम्भीरफ़ज़ा का सुरमई रंग और हो चला गहराघुला घुला सा फ़लक है धुआँ धुआँ सी है शामहै झुटपुटा कि कोई अज़दहा है माइल-ए-ख़्वाबसुकूत-ए-शाम में दरमांदगी का आलम हैरुकी रुकी सी किसी सोच में है मौज-ए-सबा
मुद्दतें बीत गईंतुम नहीं आईं अब तकरोज़ सूरज के बयाबाँ मेंभटकती है हयातचाँद के ग़ार मेंथक-हार के सो जाती है रातफूल कुछ देर महकता हैबिखर जाता हैहर नशालहर बनाने में उतर जाता हैवक़्त!बे-चेहरा हवाओं सा गुज़र जाता हैकिसी आवाज़ के सब्ज़े में लहक जैसी तुमकिसी ख़ामोश तबस्सुम में चमक जैसी तुमकिसी चेहरे में महकती हुई आँखों जैसीकहीं अबरू कहीं गेसू कहीं बाँहों जैसीचाँद सेफूल तलकयूँ तो तुम्हीं तुम हो मगरतुम कोई चेहरा कोई जिस्म कोई नाम नहींतुम जहाँ भी होअधूरी हो हक़ीक़त की तरहतुम कोई ख़्वाब नहीं होजो मुकम्मल होगी
जहाँ-ज़ादइंतिज़ार आज भी मुझे है क्यूँ वही मगरजो नौ बरस के दौर-ए-ना-सज़ा में था?अब इंतिज़ार आँसुओं के दजला कान गुमरही की रात काशब-ए-गुनाह की लज़्ज़तों का इतना ज़िक्र कर चुकावो ख़ुद गुनाह बन गईं!हलब की कारवाँ-सारा के हौज़ का, न मौत कान अपनी इस शिकस्त-खुर्दा ज़ात काइक इंतिज़ार-ए-बे-अमाँ का तार है बंधा हुआ!कभी जो चंद सानिए ज़मान-ए-बे-ज़मान में आ के रुक गएतो वक़्त का ये बार मेरे सर से भी उतर गयातमाम रफ़्ता ओ गुज़िश्ता सूरतों, तमाम हादसोंके सुस्त क़ाफ़िलेमिरे दरूँ में जाग उठेमेरे दरूँ में इक जहान-ए-बाज़-याफ़्ता की रेल-पेल जाग उठीबहिश्त जैसे जाग उठे ख़ुदा के ला-शुऊर में!मैं जाग उठा ग़ुनूदगी की रेत पर पड़ा हुआग़ुनूदगी की रेत पर पड़े हुए वो कूज़े जोमिरे वजूद से बरूँतमाम रेज़ा रेज़ा हो के रह गए थेमेरे अपने-आप से फ़िराक़ मेंवो फिर से एक कुल बने (किसी नवा-ए-साज़-गार की तरह)वो फिर से एक रक़्स-ए-बे-ज़मान बनेवो रूयत-ए-अज़ल बने!
हाथ में हाथ लिए सारा जहाँ साथ लिएतोहफ़ा-ए-दर्द लिए प्यार की सौग़ात लिएरेगज़ारों से अदावत के गुज़र जाएँगेख़ूँ के दरियाओं से हम पार उतर जाएँगे
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
अम्माँ बाजी कहती हैंचाँद में परियाँ रहती हैंरात को पर फैलाती हैंऔर उतर कर आती हैंसब बच्चों को सुलाती हैंऔर फिर ख़्वाब दिखाती हैंअम्माँ बाजी कहती हैंचाँद में परियाँ रहती हैंमैं तो आज न सोऊँगारात गए तक जागूँगाबाहर बाग़ में बैठूँगाचाँद की परियाँ देखूँगाअम्माँ बाजी कहती हैंचाँद में परियाँ रहती हैं
ये अपने नग़्मात-ए-पुर-असर से दिलों को बेदार कर चुकी हैये अपने नारों की फ़ौज से दुश्मनों पे यलग़ार कर चुकी हैसितमगरों की सितमगरी पर हज़ार-हा वार कर चुकी है
तुम्हें प्यार है, तो यक़ीन दो,मुझे न कहो, तुम्हें प्यार है, मुझे देखने की न ज़िद करो,तुम्हें फ़िक्र हो, मिरे हाल की,कोई गुफ़्तुगू हो मलाल की,जो ख़याल हो, न किया करो,न कहा करो मिरी फ़िक्र हैमैं अज़ीज़-तर हूँ जहान सेया ईमान से, न कहा करो,न लिखा करो मुझे वरक़ पर, किसी फ़र्श पर,न उदास हो, न ही ख़ुश रहोमुझे सोच कर, या खरोच कर, मेरी याद को न आवाज़ दो,मुझे ख़त में लिख के ख़ुदाओं का न दो वास्तातुम्हें प्यार में न क़रार है, मुझे इस ज़बाँ का यक़ीन नहींकुछ और हो, जो सुना न हो, जो कहा न हो, जो लिखा न होतो यक़ीन हो!रुको और थोड़ा सा ज़ब्त लो, मुझे सोच लेने को वक़्त दो,चलो यूँ करो मिरे वास्ते कि बुलंद-ओ-बाला इमारतों का लो जाएज़ाजो फ़लक को बोसा लगा रही हों इमारतें,जो तुम्हारे प्यार से ले रही हों मुशाबहतेंजो हो सब से ज़ियादा बुलंद-ओ-बाला अलग-थलगउसे सर करो,उसे छत तलक, हाँ यहीं रुको, ये वो ही है छत,ज़रा साँस लेने को क़याम लो, मिरा नाम लो,तो सफ़र की सारी थकन यहीं पे उतार लो,अब! मिरे तुम्हारे जो दरमियाँ में है फ़ासला, वो ज़रा सा है,वो मिटा सको, तो ग़ुरूर ढाती बुलंदियों को फलाँग दो!तुम्हें प्यार है तो यक़ीन दो!!
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