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हमेशा देर कर देता हूँ

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

मुनीर नियाज़ी

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कभी कभी

कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है

साहिर लुधियानवी

ख़ूब-सूरत मोड़

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

साहिर लुधियानवी

तराना-ए-हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

अल्लामा इक़बाल

तन्हाई

फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दस्तूर

दीप जिस का महल्लात ही में जले

हबीब जालिब

बोल

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदगी से डरते हो

ज़िंदगी से डरते हो!

नून मीम राशिद

ताज-महल

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही

साहिर लुधियानवी

औरत

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

कैफ़ी आज़मी

याद

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आवारा

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

अभी तो मैं जवान हूँ

हवा भी ख़ुश-गवार है

हफ़ीज़ जालंधरी

सुर्ख़ गुलाब और बदर-ए-मुनीर

ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैं

साक़ी फ़ारुक़ी

कोई ये कैसे बताए

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है

कैफ़ी आज़मी

वक़्त

ये वक़्त क्या है

जावेद अख़्तर

किताबें

किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से

गुलज़ार

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हबीब जालिब

ये खेल क्या है

मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है

जावेद अख़्तर

ए'तिराफ़

अब मिरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो

असरार-उल-हक़ मजाज़

इस बस्ती के इक कूचे में

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना

इब्न-ए-इंशा

दुआ

आइए हाथ उठाएँ हम भी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अंदेशा

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

कफ़ील आज़र अमरोहवी

पास रहो

तुम मिरे पास रहो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया

अल्लामा इक़बाल

ये बातें झूटी बातें हैं

ये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं

इब्न-ए-इंशा

तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त

प्यार की आख़िरी पूँजी भी लुटा आया हूँ

राजेन्द्र नाथ रहबर

अब सो जाओ

अब सो जाओ

फ़हमीदा रियाज़

दुश्वारी

मैं भूल जाऊँ तुम्हें

जावेद अख़्तर

विसाल की ख़्वाहिश

कह भी दे अब वो सब बातें

मुनीर नियाज़ी

आदमी बुलबुला है

आदमी बुलबुला है पानी का

गुलज़ार

लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी

इस उम्र के बाद उस को देखा!

परवीन शाकिर

मता-ए-ग़ैर

मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली

साहिर लुधियानवी

वो कमरा याद आता है

मैं जब भी

जावेद अख़्तर

नज़्र-ए-अलीगढ़

सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूँ पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

अलाव

रात-भर सर्द हवा चलती रही

गुलज़ार

नौ-जवान ख़ातून से

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था

असरार-उल-हक़ मजाज़

मुलाक़ात

ये रात उस दर्द का शजर है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हिरास

तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर

साहिर लुधियानवी

ग़ालिब

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ

गुलज़ार

दस्तक

सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा

गुलज़ार

अकेले

किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो

गुलज़ार

किस से मोहब्बत है

बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

मकान

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है

कैफ़ी आज़मी

मजबूरियाँ

मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता

असरार-उल-हक़ मजाज़

बैठा है मेरे सामने वो

बैठा है मेरे सामने वो

फ़हमीदा रियाज़

बारहवाँ खिलाड़ी

ख़ुश-गवार मौसम में

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मेरा सफ़र

हम-चू सब्ज़ा बार-हा रोईदा-एम

अली सरदार जाफ़री

ख़्वाब

खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ

परवीन शाकिर
बोलिए