मम्मी
स्टोरीलाइन
यह औरत की निष्ठा और निस्वार्थता के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हुई कहानी है। मम्मी जो बज़ाहिर एक नायिका थी उसके दिल में मामता और इंसानियत कूट कूट कर भरी हुई थी। 'सईदा काटेज' में फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग रहते थे और उन सब के साथ मम्मी का रवय्या एक माँ का सा था। पुलिस ने जब उसे शहर-बदर कर दिया तो सब ने मिलकर एक बड़ी पार्टी की और उसके जाने के बाद सब उदास रहे।
नाम उसका मिसेज़ स्टेला जैक्सन था मगर सब उसे मम्मी कहते थे। दरम्याने क़द की अधेड़ उम्र की औरत थी। उसका ख़ाविंद जैक्सन पिछली से पिछली जंग-ए-अ’ज़ीम में मारा गया था, उसकी पेंशन स्टेला को क़रीब क़रीब दस बरस से मिल रही थी।
वो पूना में कैसे आई, कब से वहां थी, इसके मुतअ’ल्लिक़ मुझे कुछ मालूम नहीं। दरअसल मैंने उस के महल्ल-ए-वक़ूअ के मुतअ’ल्लिक़ कभी जानने की कोशिश ही नहीं की थी। वो इतनी दिलचस्प औरत थी कि उससे मिल कर सिवाए उसकी ज़ात से और किसी चीज़ से दिलचस्पी नहीं रहती थी। उससे कौन कौन वाबस्ता है। इसके बारे में कुछ जानने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी, इसलिए कि वो पूना के हर ज़र्रे से वाबस्ता थी। हो सकता है ये एक हद तक मुबालग़ा हो, मगर पूना मेरे लिए वही पूना है और उसके वही ज़र्रे, उसके तमाम ज़र्रे हैं जिनके साथ मेरी चंद यादें मुंसलिक हैं और मम्मी की अ’जीब-ओ-ग़रीब शख़्सियत उनमें से हर एक में मौजूद है।
उससे मेरी पहली मुलाक़ात पूने ही में हुई... मैं निहायत सुस्त-उल-वजूद इंसान हूँ। यूं तो सैर-ओ-सियाहत की बड़ी बड़ी उमंगें मेरे दिल में मौजूद हैं। आप मेरी बातें सुनें तो आप समझिएगा कि मैं अनक़रीब कंचन चंगा या हिमाला की इसी क़िस्म के नाम की किसी और चोटी को सर करने के लिए निकल जाने वाला हूँ। ऐसा हो सकता है मगर ये ज़्यादा अग़लब है कि मैं ये चोटी सर कर के वहीं का हो रहूं।
ख़ुदा मालूम कितने बरस से बंबई में था। आप इससे अंदाज़ा कर सकते हैं कि जब पूने गया तो बीवी मेरे साथ थी। एक लड़का हो कर उसको मरे क़रीब क़रीब चार बरस हो चुके थे। इस दौरान में... ठहरिए मैं हिसाब लगा लूं... आप ये समझ लीजिए कि आठ बरस से बंबई में था। मगर इस दौरान में मुझे वहां का विकटोरिया गार्डेंस और म्यूज़ियम देखने की भी तौफ़ीक़ नहीं हुई थी।
ये तो महज़ इत्तफ़ाक़ था कि मैं एक दम पूना जाने के लिए तैयार हो गया। जिस फ़िल्म कंपनी में मुलाज़िम था उसके मालिकों से एक निकम्मी सी बात पर दिल में नाराज़ी पैदा हुई और मैंने सोचा कि ये तकद्दुर दूर करने के लिए पूना हो आऊं। वो भी इसलिए कि पास था और वहां मेरे चंद दोस्त रहते थे।
मुझे प्रभात नगर जाना था। जहां मेरा फिल्मों का एक पुराना साथी रहता था। स्टेशन के बाहर मालूम हुआ कि ये जगह काफ़ी दूर है। मगर उस वक़्त हम तांगा ले चुके थे। सुस्त रो चीज़ों से मेरी तबीयत सख़्त घबराती है। मगर मैं अपने दिल से कदूरत दूर करने के लिए आया था इसलिए मुझे प्रभात नगर पहुंचने में कोई उजलत नहीं थी।
ताँगा बहुत वाहियात क़िस्म का था। अलीगढ़ के यक्कों से भी ज़्यादा वाहियात। हर वक़्त गिरने का ख़तरा रहता है। घोड़ा आगे चलता है और सवारियां पीछे। एक दो गर्द से अटे हुए बाज़ार उफ़्तां-ओ-ख़ीज़ां तय हुए तो मेरी तबीयत घबरा गई। मैंने अपनी बीवी से मशवरा किया और पूछा कि “ऐसी सूरत में क्या करना चाहिए।” उसने कहा कि “धूप तेज़ है।” मैंने जो और तांगे देखे हैं वो भी इसी क़िस्म के हैं। अगर इसे छोड़ दिया तो पैदल चलना होगा, जो ज़ाहिर है कि इस सवारी से ज़्यादा तकलीफ़देह है। मैंने उससे इख़्तिलाफ़ मुनासिब न समझा... धूप वाक़ई तेज़ थी।
घोड़ा एक फर्लांग आगे बढ़ा होगा कि पास से इसी हवन्नक़ टाइप का एक ताँगा गुज़रा। मैंने सरसरी तौर पर देखा। एक दम कोई चीख़ा, “ओए मंटो के घोड़े!”
मैं चौंक पड़ा, चड्डा था। एक घिसी हुई मेम के साथ। दोनों साथ साथ जुड़ के बैठे थे। मेरा पहला रद्द-ए-अ’मल इंतहाई अफ़सोस का था कि चड्डे की जमालियाती हिस्स कहाँ गई जो ऐसी लाल लगामी के साथ बैठा है। उम्र का ठीक अंदाज़ा तो मैंने उस वक़्त नहीं किया था मगर उस औरत की झुर्रियां पाउडर और रुज की तहों में से भी साफ़ नज़र आरही थी। इतना शोख़ मेकअप था कि बसारत को सख़्त कोफ़्त होती थी।
चड्डे को एक अ’र्से के बाद मैंने देखा था। वो मेरा बेतकल्लुफ़ दोस्त था। “ओए मंटो के घोड़े” के जवाब में यक़ीनन मैंने भी कुछ इसी क़िस्म का नारा बुलंद किया था, मगर उस औरत को उसके साथ देख कर मेरी सारी बेतकल्लुफ़ी झुर्रियां झुर्रियां हो गई।
मैंने अपना ताँगा रुकवा लिया। चड्डे ने भी अपने कोचवान से कहा कि ठहर जाये, फिर उसने उस औरत से मुख़ातिब हो कर अंग्रेज़ी में कहा, “मम्मी जस्ट ए मिनट।” तांगे से कूद कर वो मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाते हुए चीख़ा, “तुम? तुम यहां कैसे आए हो?” फिर अपना बढ़ा हुआ हाथ बड़े बेतकल्लुफ़ी से मेरी पुरतकल्लुफ़ बीवी से मिलाते हुए कहा, “भाबी जान, आपने कमाल कर दिया... इस गुल मुहम्मद को आख़िर आप खींच कर यहां ले ही आईं।”
मैंने उससे पूछा, “तुम जा कहाँ रहे हो?”
चड्डे ने ऊंचे सुरों में कहा, “एक काम से जा रहा हूँ... तुम ऐसा करो सीधे...” वो एक दम पलट कर मेरे तांगे वाले से मुख़ातिब हुआ, “देखो, साहब को हमारे घर ले जाओ, किराया विराया मत लेना इन से।” उधर से फ़ौरन ही फ़ारिग़ हो कर उसने निबटने के अंदाज़ में मुझसे कहा, “तुम जाओ। नौकर वहां होगा, बाक़ी तुम देख लेना।”
और वो फ़ुदक कर अपने तांगे में उस बूढ़ी मेम के साथ बैठ गया जिसको उसने मम्मी कहा था। उस से मुझे एक गो ना तस्कीन हुई थी बल्कि यूं कहिए कि वो बोझ जो एक दम दोनों को साथ साथ देख कर मेरे सीने पर आ पड़ा था काफ़ी हद तक हल्का हो गया था।
उसका ताँगा चल पड़ा। मैंने अपने तांगे वाले से कुछ न कहा। तीन या चार फर्लांग चल कर वो एक डाक बंगला नुमा क़िस्म की इमारत के पास रुका और नीचे उतर गया, “चलिए साहब।”
मैंने पूछा “कहाँ?”
उसने जवाब दिया, “चड्डा साहब का मकान यही है।”
“ओह,” मैंने सवालिया नज़रों से अपनी बीवी की तरफ़ देखा। उसके तेवरों ने मुझे बताया कि वो चड्डे के मकान के हक़ में नहीं थी। सच पूछिए तो वो पूना ही के हक़ में नहीं थी। उसको यक़ीन था कि मुझे वहां पीने पिलाने वाले दोस्त मिल जाऐंगे। तकद्दुर दूर करने का बहाना पहले ही से मौजूद था, इसलिए दिन रात उड़ेगी... मैं तांगे से उतर गया। छोटा सा अटैची केस था, वो मैंने उठाया और अपनी बीवी से कहा, “चलो!”
वो ग़ालिबन मेरे तेवरों से पहचान गई थी कि उसे हर हालत में मेरा फ़ैसला क़बूल करना होगा। चुनांचे उसने हील-ओ-हुज्जत न की और ख़ामोश मेरे साथ चल पड़ी।
बहुत मामूली क़िस्म का मकान था। ऐसा मालूम होता था कि मिलिट्री वालों ने आ’रज़ी तौर पर एक छोटा सा बंगला बनाया था। थोड़ी देर उसे इस्तेमाल किया और चलते बने। चूने और गच का काम बड़ा कच्चा था। जगह जगह से पलस्तर उखड़ा हुआ था और घर का अंदरूनी हिस्सा वैसा ही था जैसा कि एक बेपर्वा कुंवारे का हो सकता है, जो फिल्मों का हीरो हो, और ऐसी कंपनी में मुलाज़िम हो जहां माहाना तनख़्वाह हर तीसरे महीने मिलती है और वो भी क़िस्तों में।
मुझे इसका पूरा एहसास था कि वो औरत जो बीवी हो, ऐसे गंदे माहौल में यक़ीनन परेशानी और घुटन महसूस करेगी, मगर मैंने ये सोचा था कि चड्डा आजाए तो उसके साथ ही प्रभात नगर चलेंगे। वहां जो मेरा फिल्मों का पुराना साथी रहता था, उसकी बीवी और बाल बच्चे भी थे। वहां के माहौल में मेरी बीवी क़हर दरवेश बरजान दरवेश दो तीन दिन गुज़ार सकती थी।
नौकर भी अ’जीब ला-उबाली आदमी था। जब हम घर में दाख़िल हुए तो सब दरवाज़े खुले थे, मगर वो मौजूद नहीं था। जब आया तो उसने हमारी मौजूदगी का कोई नोटिस न लिया। जैसे हम सालहा साल से वहीं बैठे थे और इसी तरह बैठे रहने का इरादा रखते थे।
जब वो कमरे में दाख़िल हो कर हमें देखे बग़ैर पास से गुज़र गया तो मैं समझा कि शायद कोई मामूली ऐक्टर है जो चड्डा के साथ रहता है। पर जब मैंने उससे नौकर के बारे में इस्तफ़सार किया तो मालूम हुआ कि वही ज़ात-ए-शरीफ़ चड्डा साहब के चहेते मुलाज़िम थे।
मुझे और मेरी बीवी दोनों को प्यास लग रही थी। उससे पानी लाने को कहा तो वो गिलास ढ़ूढ़ने लगा। बड़ी देर के बाद उसने एक टूटा हुआ मग अलमारी के नीचे से निकाला और बड़बड़ाया, “रात एक दर्जन गिलास साहब ने मंगवाए थे। मालूम नहीं किधर गए।”
मैंने उसके हाथ में पकड़े हुए शिकस्ता मग की तरफ़ इशारा किया, “क्या आप इसमें तेल लेने जा रहे हैं ।”
तेल लेने जाना, बंबई का एक ख़ास मुहावरा है। मेरी बीवी इसका मतलब न समझी, मगर हंस पड़ी। नौकर किसी क़दर बौखला गया, “नहीं साहब, मैं... तपास कर रहा था कि गिलास कहाँ हैं।”
मेरी बीवी ने उसको पानी लाने से मना कर दिया। उसने वो टूटा हुआ मग वापस अलमारी के नीचे इस अंदाज़ से रखा कि जैसे वही उसकी जगह थी। अगर उसे कहीं और रख दिया जाता तो यक़ीनन घर का सारा निज़ाम दरहम बरहम हो जाता। इसके बाद वो यूं कमरे से बाहर निकला जैसे उसको मालूम था कि हमारे मुँह में कितने दाँत हैं।
मैं पलंग पर बैठा था जो ग़ालिबन चड्डे का था। इससे कुछ दूर हट कर दो आराम कुर्सियां थीं। इन में से एक पर मेरी बीवी बैठी पहलू बदल रही थी। काफ़ी देर तक हम दोनों ख़ामोश रहे। इतने में चड्डा आगया। वो अकेला था। उसको इस बात का क़तअ’न एहसास नहीं था कि हम उसके मेहमान हैं और इस लिहाज़ से हमारी ख़ातिरदारी उस पर लाज़िम थी।
कमरे के अंदर दाख़िल होते ही उसने मुझसे कहा, “वेट इज़ वेट... तो तुम आगए ओलड ब्वॉय। चलो ज़रा स्टूडियो तक हो आएं। तुम साथ होगे तो ऐडवान्स मिलने में आसानी हो जाएगी... आज शाम को...” मेरी बीवी पर उसकी नज़र पड़ी तो वो रुक गया और खिलखिला कर हँसने लगा, “भाबी जान, कहीं आपने इसे मौलवी तो नहीं बना दिया।” फिर और ज़ोर से हंसा, “मौलवियों की ऐसी तैसी, उठो मंटो, भाबी जान यहां बैठती हैं। हम अभी आजाऐंगे!”
मेरी बीवी जल कर पहले कोयला थी तो अब बिल्कुल राख हो गई थी। मैं उठा और चड्डा के साथ हो लिया। मुझे मालूम था कि थोड़ी देर पेच-ओ-ताप खा कर वो सो जाएगी, चुनांचे यही हुआ। स्टूडियो पास ही था। अफ़रा-तफ़री में मेहता जी के सर चढ़ के चड्डे ने मुबलिग़ दो सौ रुपये वसूल किए। और हम पौन घंटे में जब वापस आए तो देखा कि वो आराम कुर्सी पर बड़े आराम से सो रही थी। हमने उसे बे आराम करना मुनासिब न समझा और दूसरे कमरे में चले गए जो कबाड़ख़ाने से मिलता जुलता था। उसमें जो चीज़ थी हैरत अंगेज़ तरीक़े पर टूटी हुई थी कि सब मिल कर एक सालिमगी इख़्तियार कर गई थीं।
हर शय गर्द आलूद थी, और इस आलूदगी में एक ज़रूरी पन था। जैसे उसकी मौजूदगी इस कमरे की बोहैमी फ़िज़ा की तकमील के लिए लाज़मी थी। चड्डे ने फ़ौरन ही अपने नौकर को ढूंढ निकाला और उसे सौ रुपये का नोट दे कर कहा, “चीन के शहज़ादे... दो बोतलें थर्ड क्लास रम की ले आओ, मेरा मतलब है थ्री ऐक्स रम की और निस्फ़ दर्जन गिलास।”
मुझे बाद में मालूम हुआ कि उसका नौकर सिर्फ़ चीन ही का नहीं, दुनिया के हर बड़े मुल्क का शहज़ादा था। चड्डे की ज़बान पर जिसका नाम आ जाता, वो उसी का शहज़ादा बन जाता था...इस वक़्त का चीन का शहज़ादा सौ का नोट उंगलियों से खड़खड़ाता चला गया।
चड्डे ने टूटे हुए स्प्रिंगों वाले पलंग पर बैठ कर अपने होंट थ्री ऐक्स रम के इस्तक़बाल में चटख़ारते हुए कहा, “दैट इज़ दैट... तो आफ़टर ऑल तुम इधर आ ही निकले...” लेकिन एक दम मुतफ़क्किर हो गया, “यार, भाभी का क्या हुआ... वो तो घबरा जाएगी।”
चड्डा बग़ैर बीवी के था, मगर उसको दूसरों की बीवियों का बहुत ख़याल रहता था। वो उसका इस क़दर एहतराम करता था कि सारी उम्र कुँवारा रहना चाहता था, वो कहा करता था, “ये एहसास-ए-कमतरी है जिसने मुझे अभी तक इस ने’मत से महरूम रखा है। जब शादी का सवाल आता तो फ़ौरन तैयार हो जाता हूँ लेकिन बाद में ये सोच कर कि मैं बीवी के क़ाबिल नहीं हूँ सारी तैयारी कोल्ड स्टोरेज में डाल देता हूँ।”
रम फ़ौरन ही आ गई और गिलास भी। चड्डे ने छः मंगवाए थे और चीन का शहज़ादा तीन लाया था। बक़ाया तीन रास्ते में टूट गए थे। चड्डे ने उनकी कोई पर्वा न की, और ख़ुदा का शुक्र किया कि बोतलें सलामत रहीं। एक बोतल जल्दी जल्दी खोल कर उसने कुंवारे गिलासों में रम डाली और कहा, “तुम्हारे पूने आने की ख़ुशी में।”
हम दोनों ने लंबे लंबे घूँट भरे और गिलास ख़ाली कर दिए।
दूसरा दौर शुरू कर के चड्डा उठा और दूसरे कमरे में देख कर आया कि मेरी बीवी अभी तक सो रही है। उसको बहुत तरस आया और कहने लगा, “मैं शोर करता हूँ, उनकी नींद खुल जाएगी... फिर ऐसा करेंगे... ठहरो... पहले मैं चाय मंगवाता हूँ।” ये कह कर उसने रम का एक छोटा सा घूँट लिया और नौकर को आवाज़ दी, “जमैका के शहज़ादे।”
जमैका का शहज़ादा फ़ौरन ही आ गया। चड्डे ने उससे कहा, “देखो, मम्मी से कहो, एक दम फस्ट क्लास चाय तैयार करके भेज दे... एक दम!”
नौकर चला गया। चड्डे ने अपना गिलास ख़ाली किया और शरीफ़ाना पैग डाल कर कहा, “मैं फ़िलहाल ज़्यादा नहीं पियूंगा। पहले चार पैग मुझे बहुत जज़्बाती बना देते हैं। मुझे भाभी को छोड़ने तुम्हारे साथ प्रभात नगर जाना है।”
आधे घंटे के बाद चाय आ गई। बहुत साफ़ बर्तन थे और बड़े सलीक़े से ट्रे में चुने हुए थे। चड्डे ने टी कोज़ी उठा कर चाय की ख़ुशबू सूंघी और मसर्रत का इज़हार किया, “मम्मी इज़ ए ज्वेल!” फिर उसने इथोपिया के शहज़ादे पर बरसना शुरू कर दिया। इतना शोर मचाया कि मेरे कान बिलबिला उठे। इस के बाद उसने ट्रे उठाई और मुझसे कहा, “आओ।”
मेरी बीवी जाग रही थी। चड्डे ने ट्रे बड़ी सफ़ाई से शिकस्ता तिपाई पर रखी और मोअद्दबाना कहा, “हाज़िर है बेगम साहब!”
मेरी बीवी को ये मज़ाक पसंद न आया, लेकिन चाय का सामान चूँकि साफ़ सुथरा था इसलिए उसने इनकार न किया और दो प्यालियां पी लीं। इनसे उसको कुछ फ़र्हत पहुंची और उसने हम दोनों से मुख़ातिब हो कर मा’नी ख़ेज़ लहजे में कहा, “आप अपनी चाय तो पहले ही पी चुके हैं!”
मैंने जवाब न दिया मगर चड्डे ने झुक कर बड़े ईमानदाराना तोर पर कहा, “जी हाँ, ये ग़लती हमसे सरज़द हो चुकी है, लेकिन हमें यक़ीन था कि आप ज़रूर माफ़ कर देंगी।”
मेरी बीवी मुस्कुराई तो वो खिलखिला के हंसा, “हम दोनों बहुत ऊंची नस्ल के सुअर हैं... जिन पर हर हराम शय हलाल है! चलिए, अब हम आपको मस्जिद तक छोड़ आएं!”
मेरी बीवी को फिर चड्डे का ये मज़ाक पसंद न आया। दरअसल उसको चड्डे ही से नफ़रत थी, बल्कि यूं कहिए कि मेरे हर दोस्त से नफ़रत थी और चड्डा बिलख़ुसूस उसे बहुत खलता था, इसलिए कि वो बा’ज़ औक़ात बेतकल्लुफ़ी की हदूद भी फांद जाता था, मगर चड्डे को उसकी कोई परवाह नहीं थी। मेरा ख़याल है उसने कभी इसके बारे में सोचा ही नहीं था। वो ऐसी फ़ुज़ूल बातों में दिमाग़ ख़र्च करना एक ऐसी इंडोर गेम समझता था जो लूडो से कई गुना लाया’नी है। उसने मेरी बीवी के जले भुने तेवरों को बड़ी हश्शाश बश्शाश आँखों से देखा और नौकर को आवाज़ दी, “कयाबिस्तान के शहज़ादे... एक अदद तांगा लाओ। रोल्ज़ राईस क़िस्म का।”
कयाबिस्तान का शहज़ादा चला गया और साथ ही चड्डा। वो ग़ालिबन दूसरे कमरे में गया था। तख़लिया मिला तो मैंने अपनी बीवी को समझाया कि कबाब होने की कोई ज़रूरत नहीं। इंसान की ज़िंदगी में ऐसे लम्हात आही जाया करते हैं जो वहम-ओ-गुमान में भी नहीं होते। उनको बसर करने के लिए सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि उनको गुज़र जाने दिया जाये लेकिन हस्ब-ए-मा’मूल उसने मेरी इस कनफ़्युशिसाना नसीहत को पल्ले न बांधा और बड़बड़ाती रही। इतने में कयाबिस्तान का शहज़ादा रोल्ज़ राईस क़िस्म का तांगा लेकर आगया। हम प्रभात नगर रवाना हो गए।
बहुत ही अच्छा हुआ कि मेरा फिल्मों का पुराना साथी घर में मौजूद नहीं था। उसकी बीवी थी, चड्डे ने मेरी बीवी उसके सिपुर्द की और कहा, “ख़रबूज़ा, ख़रबूज़े को देख कर रंग पकड़ता है। बीवी, बीवी को देख कर रंग पकड़ती है, ये हम अभी हाज़िर हो के देखेंगे।” फिर वो मुझसे मुख़ातिब हुआ, “चलो मंटो, स्टूडियो में तुम्हारे दोस्त को पकड़ें।”
चड्डा कुछ ऐसी अफ़रातफ़री मचा दिया करता था कि मुख़ालिफ़ कुव्वतों को समझने सोचने का बहुत कम मौक़ा मिलता था। उसने मेरा बाज़ू पकड़ा और बाहर ले गया और मेरी बीवी सोचती ही रह गई। तांगे में सवार हो कर चड्डे ने अब कुछ सोचने के अंदाज़ में कहा, “ये तो हो गया... अब क्या प्रोग्राम है।” फिर खिलखिला कर हंसा, “मम्मी... ग्रेट मम्मी!”
मैं उससे पूछने ही वाला था, ये मम्मी किस तूतन्ख आमून की औलाद है, कि चड्डे ने बातों का कुछ ऐसा सिलसिला शुरू कर दिया कि मेरा इस्तफ़सार ग़ैर तबई मौत मर गया।
ताँगा वापस उस डाक बंगला नुमा कोठी पर पहुंचा जिसका नाम सईदा काटेज था, मगर चड्डा उसको कबीदा काटेज कहता था। इसलिए कि इसमें रहने वाले सबके सब कबीदा ख़ातिर रहते हैं। हालाँकि ये ग़लत था जैसा कि मुझे बाद में मालूम हुआ।
इस काटेज में काफ़ी आदमी रहते थे हालाँकि बादियुन्नज़र में ये जगह बिल्कुल ग़ैर आबाद मालूम होती थी। सबके सब इसी फ़िल्म कंपनियों में मुलाज़िम जो महीने की तनख़्वाह हर सह माही के बाद देती थी और वो भी कई क़िस्तों में। एक एक करके जब उसके साकिनों से मेरा तआ’रुफ़ हुआ तो पता चला कि सब असिस्टेंट डायरेक्टर थे। कोई चीफ़ असिस्टेंट डायरेक्टर, कोई उसका नायब, कोई नायब दर नायब।
हर दूसरा, किसी पहले का असिस्टेंट था और अपनी ज़ाती फ़िल्म कंपनी की बुनियादें उस्तवार करने के लिए सरमाया फ़राहम कर रहा था। पोशिश और वज़ा क़ता के ए’तबार से हर एक हीरो मालूम होता था, कंट्रोल का ज़माना था मगर किसी के पास राशन कार्ड नहीं था। वो चीज़ें भी जो थोड़ी सी तकलीफ़ के बाद आसानी से कम क़ीमत पर दस्तयाब हो सकती थी, ये लोग ब्लैक मार्कीट से खरीदते थे। पिक्चर ज़रूर देखते थे। रेस का मौसम हो तो रेस खेलते थे वर्ना सट्टा। जीतते शाज़-ओ-नादिर थे, मगर हारते हर रोज़ थे।
सईदा काटेज की आबादी बहुत गुनजान थी। चूँकि जगह कम थी इसलिए मोटर गेराज भी रिहाइश के लिए इस्तेमाल होता था। इसमें एक फ़ैमिली रहती थी। शीरीं नाम की एक औरत थी जिसका ख़ाविंद शायद, महज़ यकसानियत तोड़ने के लिए असिस्टेंट डायरेक्टर नहीं था। वो इसी फ़िल्म कंपनी में मुलाज़िम था मगर मोटर ड्राईवर था। मालूम नहीं, वो कब आता था और कब जाता था, क्योंकि मैंने उस शरीफ़ आदमी को वहां कभी नहीं देखा था। शीरीं के बत्न से एक छोटा सा लड़का था जिसको सईदा काटेज के तमाम साकिन फ़ुर्सत के औक़ात में प्यार करते। शीरीं जो क़बूल सूरत थी अपना बेशतर वक़्त गेराज के अंदर गुज़ारती थी।
काटेज का मुअज़्ज़ज़ हिस्सा चड्डे और उसके दो साथियों के पास था। ये दोनों भी ऐक्टर थे, मगर हीरो नहीं थे। एक सईद था जिसका फ़िल्मी नाम रणजीत कुमार था। चड्डा कहा करता था, “सईदा काटेज इसी ख़र ज़ात के नाम की रिआयत से मशहूर है वर्ना इसका नाम कबीदा काटेज ही था।” ख़ुश शक्ल था और बहुत कमगो। चड्डा कभी कभी उसे कछुवा कहा करता था, इसलिए कि वो हर काम बहुत आहिस्ता आहिस्ता करता था।
दूसरे ऐक्टर का नाम मालूम नहीं क्या था मगर सब उसे ग़रीब नवाज़ कहते थे। हैदराबाद के एक मुतमव्विल घराने से तअ’ल्लुक़ रखता था। ऐक्टिंग के शौक़ में यहां चला आया। तनख़्वाह ढाई सौ रुपये माहवार मुक़र्रर थी। एक बरस हो गया था मुलाज़िम हुए मगर इस दौरान में उसने सिर्फ़ एक दफ़ा ढाई सौ रुपये बतौर ऐडवान्स लिये थे, वो भी चड्डे के लिए, कि उस पर एक बड़े ख़ूँख़्वार पठान के क़र्ज़ की अदायगी लाज़िम हो गई थी। अदब-ए-लतीफ़, क़िस्म की इमारत में फ़िल्मी कहानियां लिखना उसका शग़ल था। कभी कभी शे’र भी मौज़ूं कर लेता था। काटेज का हर शख़्स उसका मक़रूज़ था।
शकील और अक़ील दो भाई थे। दोनों किसी असिस्टेंट डायरेक्टर के असिस्टेंट थे और बरअ’क्स नाम-ए-निहंद नाम-ए-ज़ंगी बा काफ़ूर की ज़र्बुलमिस्ल के इबताल की कोशिश में हमा-तन मसरूफ़ रहते थे।
बड़े तीन, या’नी चड्डा, सईद और ग़रीब नवाज़ शीरीं का बहुत ख़याल रखते थे लेकिन तीनों इकट्ठे गेराज में नहीं जाते थे। मिज़ाजपुर्सी का कोई वक़्त भी मुक़र्रर नहीं था। तीनों जब काटेज के बड़े कमरे में जमा होते तो इनमें से एक उठ कर गेराज में चला जाता और कुछ देर वहां बैठ कर शीरीं से घरेलू मुआ’मलात पर बातचीत करता रहता। बाक़ी दो अपने अश्ग़ाल में मसरूफ़ रहते।
जो असिस्टेंट क़िस्म के लोग थे, वो शीरीं का हाथ बटाया करते थे। कभी बाज़ार से उसको सौदा सुल्फ़ ला दिया, कभी लांड्री में उसके कपड़े धुलने दे आए और कभी उसके रोते बच्चे को बहला दिया।
इनमें से कबीदाख़ातिर कोई भी न था। सबके सब मसरूर थे, शायद अपनी कबीदगी पर, वो अपने हालात की ना-मुसाअत का ज़िक्र भी करते थे तो बड़े शादां-ओ-फ़रहां अंदाज़ में। इस में कोई शक नहीं कि उस की ज़िंदगी बहुत दिलचस्प थी।
हम काटेज के गेट में दाख़िल होने वाले थे कि ग़रीब-नवाज़ साहब बाहर आरहे थे। चड्डे ने उनकी तरफ़ ग़ौर से देखा और अपनी जेब में हाथ डाल कर नोट निकाले। बग़ैर गिने उसने कुछ ग़रीबनवाज़ को दिए और कहा, “चार बोतलें स्काच की चाहिऐं। कमी आप पूरी कर दीजिएगा। बेशी हो तो वो मुझे वापस मिल जाये।”
ग़रीबनवाज़ के हैदराबादी होंटों पर गहरी सांवली मुस्कुराहट नुमूदार हुई। चड्डा खिलखिला कर हंसा और मेरी तरफ़ देख कर उसने ग़रीबनवाज़ से कहा, “ये मिस्टर वन टू हैं... लेकिन इनसे मुफ़स्सल मुलाक़ात की इजाज़त इस वक़्त नहीं मिल सकती। ये रम पिए हैं। शाम को स्काच आ जाए तो... लेकिन आप जाईए।”
ग़रीबनवाज़ चला गया। हम अंदर दाख़िल हुए, चड्डे ने एक ज़ोर की जमाई ली और रम की बोतल उठाई जो निस्फ़ से ज़्यादा ख़ाली थी। उसने रौशनी में मिक़दार का सरसरी अंदाज़ा किया और नौकर को आवाज़ दी, “क़ज़ाक़िस्तान के शहज़ादे।” जब वो नुमूदार न हुआ तो उसने अपने गिलास में एक बड़ा पैग डालते हुए कहा, “ज़्यादा पी गया है कमबख़्त!”
ये गिलास ख़त्म करके वो कुछ फ़िक्रमंद हो गया, “यार, भाभी को तुम ख़्वाहमख़्वाह यहां लाए। ख़ुदा की क़सम मुझे अपने सीने पर एक बोझ सा महसूस हो रहा है।” फिर उसने ख़ुद ही अपने को तस्कीन दी, “लेकिन मेरा ख़याल है कि बोर नहीं होंगी वहां?”
मैंने कहा, “हाँ, वहां रह कर वो मेरे क़त्ल का फ़ौरी इरादा नहीं कर सकती।” और मैंने अपने गिलास में रम डाली जिसका ज़ायक़ा बुसे हुए गुड़ की तरह था।
जिस कबाड़ ख़ाने में हम बैठे थे उसमें सलाख़ों वाली दो खिड़कियां थीं जिससे बाहर का ग़ैर आबाद हिस्सा नज़र आता था। उधर से किसी ने बा-आवाज़-ए-बुलंद चड्डा का नाम लेकर पुकारा। मैं चौंक पड़ा, देखा कि म्यूज़िक डायरेक्टर वन कुतरे है। कुछ समझ में नहीं आता था कि वो किस नस्ल का है। मंगोली है, हब्शी है, आर्या है, या क्या बला है।
कभी कभी उसके किसी ख़द्द-ओ-ख़ाल को देख कर आदमी किसी नतीजे पर पहुंचने ही वाला होता था कि उसके तक़ाबुल में कोई ऐसा नक़्श नज़र आजाता कि फ़ौरन ही नए सिरे से ग़ौर करना पड़ जाता था। वैसे वो मरहटा था, मगर शिवाजी की तीखी नाक की बजाय उसके चेहरे पर बड़े हैरतनाक तरीक़े पर मुड़ी हुई चपटी नाक थी जो उसके ख़याल के मुताबिक़ उन सरों के लिए बहुत ज़रूरी थी जिनका तअ’ल्लुक़ बराह-ए-रास्त नाक से होता है। उसने मुझे देखा तो चिल्लाया, “मंटो... मंटो सेठ?”
चड्डे ने उससे ज़्यादा ऊंची आवाज़ में कहा, “सेठ की ऐसी तैसी... चल अंदर आ।”
वो फ़ौरन अन्दर आगया। अपनी जेब से उसने हंसते हुए रम की एक बोतल निकाली और तिपाई पर रख दी। “मैं साला उधर मम्मी के पास गया, वो बोला, तुम्हारे फ्रैंड आए ला... मैं बोला साला ये फ्रैंड कौन होने को सकता है... साला मालूम न था साला मंटो है।”
चड्डे ने वन कुतरे के कद्दू ऐसे सर पर एक धौल जमाई, “अब चेक कर साले के... तू रम ले आया... बस ठीक है।” वन क़ुतरे ने अपना सर सहलाया और मेरा ख़ाली गिलास उठा कर अपने लिए पैग तैयार किया। “मंटो... ये साला आज मिलते ही कहने लगा। आज पीने को जी चाहता है... मैं एक दम कड़का... सोचा क्या करूं...”
चड्डे ने एक और धप्पा उसके सर पर जमाया, “बैठ बे, जैसे तू ने कुछ सोचा ही होगा।”
“सोचा नहीं तो साला ये इतनी बड़ी बाटली कहाँ से आया... तेरे बाप ने दिया मुझ को।” वन क़ुतरे ने एक ही जुरए’ में रम ख़त्म करदी। चड्डे ने उसकी बात सुनी-अनसुनी कर दी और उससे पूछा, “तू ये तो बता कि मम्मी क्या बोली? बोली थी... मोज़ील कब आएगी?... अरे हाँ... वो प्लेटिनम ब्लोंड!”
वन क़ुतरे ने जवाब में कुछ कहना चाहा मगर चड्डे ने मेरा बाज़ू पकड़ कर कहना शुरू कर दिया, “मंटो, ख़ुदा की क़सम क्या चीज़ है? सुना करते थे कि एक शय प्लेटिनम ब्लोंड भी होती है, मगर देखने का इत्तफ़ाक़ कल हुआ। बाल हैं, जैसे चांदी के महीन महीन तार... ग्रेट... ख़ुदा की क़सम मंटो बहुत ग्रेट... मम्मी ज़िंदाबाद!” फिर उसने क़हर आलूद निगाहों से वन क़ुतरे की तरफ़ देखा और कड़क कर कहा, “वन क़ुतरे के बच्चे... नारा क्यों नहीं लगाता... मम्मी ज़िंदाबाद!”
चड्डे और वन क़ुतरे दोनों ने मिल कर मम्मी ज़िंदाबाद के कई नारे लगाए। इसके बाद वन क़ुतरे ने चड्डे के सवालों का फिर जवाब देना चाहा मगर उसने उसे ख़ामोश कर दिया, “छोड़ो यार, मैं जज़्बाती हो गया हूँ... इस वक़्त ये सोच रहा हूँ कि आम तौर पर मा’शूक़ के बाल स्याह होते हैं, जिन्हें काली घटा से तशबीह दी जाती रही है, मगर यहां कुछ और ही सिलसिला हो गया है।” फिर वो मुझ से मुख़ातिब हुआ, “मंटो... बड़ी गड़बड़ हो गई है। उसके बाल चांदी के तारों जैसे हैं... चांदी का रंग भी नहीं कहा जा सकता, मालूम नहीं प्लेटिनम का रंग कैसा होता है, क्योंकि मैंने अभी तक ये धात नहीं देखी, कुछ अ’जीब ही सा रंग है... फ़ौलाद और चांदी दोनों को मिला दिया जाये...”
वन क़ुतरे ने दूसरा पैग ख़त्म किया, “और उसमें थोड़ी सी थ्री ऐक्स रम मिक्स करदी जाये।”
चड्डे ने भन्ना कर उसको एक फ़रबा अंदाम गाली दी, “बकवास न कर।” फिर उसने बड़ी रहम अंगेज़ नज़रों से मेरी तरफ़ देखा, “यार, मैं वाक़ई जज़्बाती हो गया हूँ... हाँ, वो रंग... ख़ुदा की क़सम लाजवाब रंग है। वो तुमने देखा है, वो जो मछलियों के पेट पर होता है... नहीं, नहीं हर जगह होता है पोमफ्रेट मछली... इसके वो क्या होते हैं? नहीं नहीं, साँपों के... वो नन्हे नन्हे खपरे... हाँ खपरे, बस उनका रंग।
खपरे, ये लफ़्ज़ मुझे एक हिंद सतोड़े ने बताया था। इतनी ख़ूबसूरत चीज़ और ऐसा वाहियात नाम, पंजाबी में हम इन्हें चाने कहते हैं। इस लफ्ज़ में चिनचिनहाहट है... वही... बिल्कुल वही जो उसके बालों में है। लटें नन्ही नन्ही संपोलियां मालूम होती हैं जो लोट लगा रही हैं...” वो एक दम उठा,“संपोलियों की ऐसी तैसी, मैं जज़्बाती हो गया हूँ।”
वन क़ुतरे ने बड़े भोले अंदाज़ में पूछा, “वो क्या होता है?”
चड्डे ने जवाब दिया, “सेंटीमेंटल, लेकिन तू क्या समझेगा, बालाजी बाजी राव और नाना फ़रनवीस की औलाद...”
वन क़ुतरे ने अपने लिए एक और पैग बनाया और मुझसे मुख़ातिब हो कर कहा, “ये साला चड्डा समझता है, मैं इंग्लिश नहीं समझता हूँ। मैट्रिकुलेट हूँ... साला मेरा बाप मुझसे बहुत मोहब्बत करता था... उसने...”
चड्डे ने चिड़ कर कहा, “उसने तुझे तानसेन बना दिया... तेरी नाक मरोड़ दी कि नकोड़े सुर आसानी से तेरे अंदर से निकल सकें, बचपन ही में उसने तुझे धुरपद गाना सिख़ा दिया था और दूध पीने के लिए तू मियां की टोड़ी में रोया करता था और पेशाब करते वक़्त अड़ाना में... और तू ने पहली बात पट दीपकी में की थी। और तेरा बाप... जगत उस्ताद था। बैजूबावरे के भी कान काटता था और तू आज उसके कान काटता है, इसीलिए तेरा नाम कन क़ुतरे!”
इतना कह कर वो मुझसे मुख़ातिब हुआ, “मंटो... ये साला जब भी पीता है, अपने बाप की तारीफ़ें शुरू कर देता है। वो इससे मोहब्बत करता था तो मुझपर उसने क्या एहसान किया और उसने इसे मैट्रिकुलेट बना दिया तो इसका ये मतलब नहीं कि मैं अपनी बी.ए की डिग्री फाड़ के फेंक दूं।”
वन क़ुतरे ने इस बौछार की मुदाफ़अ’त करना चाही मगर चड्डे ने उसको वहीं दबा दिया, “चुप रह... मैं कह चुका हूँ कि सेंटीमेंटल हो गया हूँ... हाँ, वो रंग, पोमफ्रेट मछली... नहीं नहीं, साँप के नन्हे नन्हे खपरे... बस उन्ही का रंग, मम्मी ने ख़ुदा मालूम अपनी बीन पर कौन सा राग बजा कर उस नागिन को बाहर निकाला?”
वन क़ुतरे सोचने लगा, “पेटी मँगाओ, मैं बजाता हूँ।”
चड्डा खिखला कर हँसने लगा, “बैठ बे मैट्रिकुलेट के चाकूलेट...”
उसने रम की बोतल में से रम के बाक़ियात अपने गिलास में उंडेले और मुझसे कहा, “मंटो, अगर ये प्लेटीनम ब्लोंड न पटी तो मिस्टर चड्डा हिमालया पहाड़ की किसी ऊंची चोटी पर धूनी रमा कर बैठ जाएगा...” और उसने गिलास ख़ाली कर दिया।
वन क़ुतरे ने अपनी लाई हुई बोतल खोलनी शुरू करदी, “मंटो, मुल्गी एकदम चांगली है।”
मैंने कहा, “देख लेंगे।”
“आज ही... आज रात मैं एक पार्टी दे रहा हूँ। ये बहुत ही अच्छा हुआ कि तुम आ गए और श्री एक सौ आठ मेहता जी ने तुम्हारी वजह से वो एडवांस दे दिया, वर्ना बड़ी मुश्किल हो जाती। आज की रात, आज की रात...”
चड्डे ने बड़े भोंडे सुरों में गाना शुरू कर दिया,“आज की रात साज़-ए-दर्द न छेड़!”
वन क़ुतरे बेचारा उसकी इस ज़्यादती पर सदा-ए-एहतिजाज बुलंद करने ही वाला था कि ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार आगए। दोनों के पास स्काच की दो दो बोतलें थीं। ये उन्होंने मेज़ पर रखीं। रनजीत कुमार से मेरे अच्छे ख़ासे मरासिम थे, मगर बेतकल्लुफ़ नहीं। इसलिए हम दोनों ने थोड़ी सी, आप कब आए, आज ही आया, ऐसी रस्मी गुफ़्तुगू की और गिलास टकरा कर पीने में मशग़ूल हो गए।
चड्डा वाक़ई बहुत जज़्बाती हो गया था। हर बात में उस प्लेटिनम ब्लोंड का ज़िक्र ले आता था। रनजीत कुमार दूसरी बोतल का चौथाई हिस्सा चढ़ा गया था। ग़रीबनवाज़ ने स्काच के तीन पैग पिए थे। नशे के मुआ’मले में इन सब की सतह अब एक ऐसी थी। मैं चूँकि ज़्यादा पीने का आदी हूँ, इस लिए मेरे जज़्बात मो’तदिल थे। मैंने उनकी गुफ़्तुगू से अंदाज़ा लगाया कि वो चारों उस नई लड़की पर बहुत बुरी तरह फ़रेफ़्ता थे, जो मम्मी ने कहीं से पैदा की थी।
उस नायाब दाने का नाम फ़ीलस था। पूने में कोई हेयर ड्रेसिंग सैलून था जहां वो मुलाज़िम थी। उस के साथ आम तौर पर एक हीजड़ा नुमा लड़का रहता था। लड़की की उम्र चौदह-पंद्रह बरस के क़रीब थी। ग़रीबनवाज़ तो यहां तक उस पर गर्म था कि वो हैदराबाद में अपने हिस्से की जायदाद बेच कर भी इस दांव पर लगाने के लिए तैयार था।
चड्डे के पास तुरुप का सिर्फ़ एक पत्ता था, अपना क़बूल सूरत होना। वन क़ुतरे का बज़ात-ए-ख़ुद ये ख़याल था कि उसकी पेटी सुन कर वो परी ज़रूर शीशे में उतर आएगी और रनजीत कुमार जारहाना अक़दाम ही को कारगर समझता था, लेकिन सब आख़िर में यही सोचते थे कि देखिए मम्मी किस पर क़ुर्बान होती है। इससे मालूम होता था कि इस प्लेटिनम ब्लोंड फ़ीलस को वो औरत जिसे मैंने चड्डे के साथ तांगे में देखा था, किसी के भी हवाले कर सकती थी।
फ़ीलस की बातें करते करते चड्डे ने अचानक अपनी घड़ी देखी और मुझसे कहा, “जहन्नुम में जाये ये लौंडिया, चलो यार... भाबी वहां कबाब हो रही होगी, लेकिन मुसीबत ये है कि मैं कहीं वहां भी सेंटीमेंटल न हो जाऊं, ख़ैर... तुम मुझे सँभाल लेना।” अपने गिलास के चंद आख़िरी क़तरे हलक़ में टपका कर उसने नौकर को आवाज़ दी, “ममियों के मुल्क मिस्र के शहज़ादे।”
ममियों के मुल्क मिस्र का शहज़ादा आँखें मलता नुमूदार हुआ, जैसे किसी ने उसको सदियों के बाद खोद खाद के बाहर निकाला है। चड्डे ने उसके चेहरे पर रम के छींटे मारे और कहा, “दो अदद तांगे लाओ... जो मिस्री रथ मालूम हों।”
तांगे आ गए। हम सब उन पर लद कर प्रभात नगर रवाना हुए। मेरा पुराना, फिल्मों का साथी हरीश घर पर मौजूद था। इस दूर दराज़ जगह पर भी उसने मेरी बीवी की ख़ातिर मदारात में कोई दक़ीक़ा फ़रोगुज़ाश्त नहीं किया था। चड्डे ने आँख के इशारे से उसको सारा मुआ’मला समझा दिया था, चुनांचे ये बहुत कारआमद साबित हुआ। मेरी बीवी ने ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब का इज़हार न किया। उसका वक़्त वहां कुछ अच्छा ही कटा था। हरीश ने जो औरतों के नफ़्सियात का माहिर था। बड़ी पुरलुत्फ़ बातें कीं, और आख़िर में मेरी बीवी से दरख़्वास्त की कि वो उसकी शूटिंग देखने चले जो उस रोज़ होने वाली थी। मेरी बीवी ने पूछा, “कोई गाना फिलमा रहे हैं आप?”
हरीश ने जवाब दिया, “जी नहीं... वो कल का प्रोग्राम है। मेरा ख़याल है आप कल चलिएगा।”
हरीश की बीवी शूटिंग देख देख कर और दिखा दिखा कर आ’जिज़ आई हुई थी। उसने फ़ौरन ही मेरी बीवी से कहा, “हाँ, कल ठीक रहेगा... आज तो इन्हें सफ़र की थकन भी है।”
हम सब ने इत्मिनान का सांस लिया। हरीश ने फिर कुछ देर पुरलुत्फ़ बातें कीं। आख़िर में मुझसे कहा, “चलो यार, तुम चलो मेरे साथ।” और मेरे तीन साथियों की तरफ़ देखा, “इनको छोड़ो... सेठ साहब तुम्हारी कहानी सुनना चाहते हैं।”
मैंने अपनी बीवी की तरफ़ देखा और हरीश से कहा, “इन से इजाज़त ले लो।”
मेरी सादा लौह बीवी जाल में फंस चुकी थी। उसने हरीश से कहा, “मैंने बम्बई से चलते वक़्त इनसे कहा भी था कि अपना डॉक्यूमेंट केस साथ ले चलिए, पर इन्होंने कहा कोई ज़रूरत नहीं, अब ये कहानी क्या सुनाएंगे?”
हरीश ने कहा, “ज़बानी सुना देगा।” फिर उसने मेरी तरफ़ यूं देखा जैसे कह रहा है कि हाँ कहो जल्दी।
मैंने इत्मिनान से कहा, “हाँ, ऐसा हो सकता है!”
चड्डे ने इस ड्रामे में तकमीली टच दिया, “तो भई हम चलते हैं।” और वो तीनों उठ कर सलाम नमस्ते करके चले गए। थोड़ी देर के बाद मैं और हरीश निकले, प्रभात नगर के बाहर तांगे खड़े थे। चड्डे ने हमें देखा तो ज़ोर का नारा बुलंद किया, “राजा हरीशचंद्र ज़िंदाबाद...”
हरीश के सिवा हम सब मम्मी के घर रवाना हो गए। उसको अपनी एक सहेली से मिलने जाना था।
ये भी एक काटेज थी। शक्ल-ओ-सूरत और साख़्त के ए’तबार से सईदा काटेज जैसी मगर बहुत साफ़ सुथरी जिससे मम्मी के सलीक़े और क़रीने का पता चलता था। फ़र्नीचर मामूली था मगर जो चीज़ जहां थी सजी हुई थी। प्रभात नगर से चलते वक़्त मैंने सोचा था कोई क़हबाख़ाना होगा, मगर इस घर की किसी चीज़ से भी बसारत को ऐसा शक नहीं होता था। वो वैसा ही शरीफ़ाना था जैसा कि एक औसत दर्जे के ईसाई का होता है। लेकिन मम्मी की उम्र के मुक़ाबले में वो जवान जवान दिखाई देता था। उस पर वो मेकअप नहीं था जो मैंने मम्मी के झुर्रियों वाले चेहरे पर देखा था। जब मम्मी ड्राइंगरूम में आई, तो मैंने सोचा कि गर्द-ओ-पेश की जितनी चीज़ें हैं, वो आज की नहीं बहुत बरसों की हैं, सिर्फ़ मम्मी आगे निकल कर बूढी हो गई है और वो वैसी की वैसी पड़ी रही हैं... उनकी जो उम्र थी, वो वहीँ की वहीँ रही हैं... लेकिन जब मैंने उसके गहरे और शोख़ मेकअप की तरफ़ देखा तो मेरे दिल में न जाने क्यों ये ख़्वाहिश पैदा हुई कि वो भी अपने गर्द-ओ-पेश के माहौल की तरह संजीदा-ओ-मतीन तौरपर जवान बन जाए।
चड्डे ने उससे मेरा तआ’रुफ़ कराया, जो बहुत मुख़्तसर था और इख़्तसार ही के साथ उसने मम्मी के मुतअ’ल्लिक़ मुझसे ये कहा, “ये मम्मी है...द ग्रेट मम्मी...”
मम्मी अपनी तारीफ़ सुनकर मुस्कुरा दी और मेरी तरफ़ देखकर उसने चड्डे से अंग्रेज़ी में कहा, “तुमने चाय मंगवाई थी। हस्ब-ए-मा’मूल निहायत अफ़रा तफ़री में... मालूम नहीं उन्हें पसंद भी आई होगी या नहीं।” फिर वो मुझसे मुख़ातिब हुई, “मिस्टर मंटो, मैं बहुत शर्मिंदा हूं...अस्ल में सारा क़सूर तुम्हारे दोस्त चड्डे का है, जो मेरा नाक़ाबिल-ए-इस्लाह लड़का है।”
मैंने मुनासिब-ओ-मौज़ूं अलफ़ाज़ में चाय की तारीफ़ की और उसका शुक्रिया अदा किया। मम्मी ने मुझे फ़ज़ूल की तारीफ़ से मना किया और चड्डे से कहा, “रात का खाना तैयार है, ये मैंने इसलिए किया कि तुम ऐ’न वक़्त के वक़्त मेरे सर पर सवार हो जाओगे।”
चड्डे ने मम्मी को गले से लगाया, “यू आर ज्वेल मम्मी... ये खाना अब हम खाएंगे।”
मम्मी ने चौंक कर पूछा, “क्या? नहीं, हर्गिज़ नहीं।”
चड्डे ने उसे बताया, “मिसेज़ मंटो को हम प्रभातनगर छोड़ आए हैं।”
मम्मी चिल्लाई, “ ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे... ये तुमने क्या किया?”
चड्डा खिलखिला कर हंसा, “आज पार्टी जो होने वाली थी।”
“वो तो मैंने मिसेज़ मंटो को देकते ही अपने दिल में कैंसिल कर दी थी।” मम्मी ने अपना सिगरेट सुलगाया।
चड्डे का दिल डूब गया, “ख़ुदा अब तुम्हें ग़ारत करे... और ये सब प्लेन हमने सिर्फ़ उस पार्टी के लिए बनाया था।” वो कुर्सी पर यासज़दा होकर बैठ गया और कमरे के हर ज़र्रे से मुख़ातिब होकर कहने लगा, “लो सारे ख़्वाब मलियामेट हो गए... प्लेटिनम ब्लोंड...औंधे सांप के नन्हे नन्हे खपरों जैसे रंग वाले बाल...” एकदम उसने उठकर मम्मी को बाज़ुओं से पकड़ लिया, “कैंसिल की थी... अपने दिल में कैंसिल की थी ना... लो इस पर साद बना देता हूं।” और उसने मम्मी के दिल के मक़ाम पर अंगुली से बहुत बड़ा साद बना दिया और बआवाज़-ए-बलंद पुकारा, “हरे...”
मम्मी मुतअ,ल्लिक़ा लोगों को इत्तला पहुंचा चुकी थी कि पार्टी मंसूख़ हो चुकी है लेकिन मैंने महसूस किया कि वो चड्डे को दिगर करना नहीं चाहती थी। चुनांचे उसने बड़े शफ़क़त से उसके गाल थपथपाए और कहा, “तुम फ़िक्र न करो, मैं अभी इंतिज़ाम करती हूँ।”
वो इंतिज़ाम करने बाहर चली गई। चड्डे ने ख़ुशी का एक और नारा बुलंद किया और वन क़ुतरे से कहा, “जनरल वन क़ुतरे, जाओ हेड क्वाटर्रज़ से सारी तोपें ले आओ।”
वन क़ुतरे ने सैलूट किया और हुक्म की ता’मील के लिए चला गया। सईदा काटेज बिल्कुल पास था, दस मिनट के अंदर अंदर वो बोतलें लेकर वापस आगया। साथ उसके चड्डे का नौकर था। चड्डे ने उसको देखा तो उसका इस्तक़बाल किया, “आओ, आओ... मेरे कोह-ए-क़ाफ़ के शहज़ादे, वो... वो साँप के खपड़ों जैसे रंग के बालों वाली लौंडिया आ रही है, तुम भी क़िसमत आज़माई कर लेना।”
रनजीत कुमार और ग़रीबनवाज़ दोनों को चड्डे की ये सलाये आम है याराने-नुक्तादां के लिए, वाली बात बहुत नागवार मालूम हुई। दोनों ने मुझसे कहा कि ये चड्डे की बहुत बेहूदगी है। इस बेहूदगी को उन्होंने बहुत महसूस किया था। चड्डा हस्ब-ए-आदत अपनी हाँकता रहा और वो ख़ामोश एक कोने में बैठे आहिस्ता आहिस्ता रम पी कर एक दूसरे से अपने दुख का इज़हार करते रहे।
मैं मम्मी के मुतअ’ल्लिक़ सोचता रहा। ड्राइंगरूम में, ग़रीबनवाज़, रनजीत कुमार और चड्डे बैठे थे। ऐसा लगता था कि ये छोटे छोटे बच्चे हैं। उनकी माँ बाहर खिलौने लेने गई है, ये सब मुंतज़िर हैं। चड्डा मुतमइन है कि सब से बढ़िया और अच्छा खिलौना उसे मिलेगा, इसलिए कि वो अपनी माँ का चहेता है। बाक़ी दो का ग़म चूँकि एक जैसा था इसलिए वो एक दूसरे के मूनिस बन गए थे। शराब इस माहौल में दूध मालूम होती थी और वो प्लेटिनम ब्लोंड... उसका तसव्वुर एक छोटी सी गुड़िया के मानिंद दिमाग़ में आता था।
हर फ़िज़ा, हर माहौल की अपनी मौसीक़ी होती है, इस वक़्त जो मौसीक़ी मेरे दल के कानों तक पहुंच रही थी, इसमें कोई सुर इश्तआ’ल अंगेज़ नहीं था। हर शय, माँ और उसके बच्चे और उनके बाहमी रिश्ते की तरह क़ाबिल-ए-फ़ह्म और यक़ीनी थी।
मैंने जब उसको तांगे में चड्डे के साथ देखा था तो मेरी जमालियाती हिस्स को सदमा पहुंचा था। मुझे अफ़सोस हुआ कि मेरे दिल में उन दोनों के मुतअ’ल्लिक़ वाहियात ख़याल पैदा हुए। लेकिन ये चीज़ मुझे बार बार सता रही थी कि वो इतना शोख़ मेकअप क्यों करती है जो उसकी झुर्रियों की तौहीन है। उस ममता की तज़हीक है जो उसके दिल में चड्डे, ग़रीबनवाज़ और वन क़ुतरे के लिए मौजूद है और ख़ुदा मालूम और किस किस के लिए...
बातों बातों में चड्डे से मैंने पूछा, “यार ये तो बताओ, तुम्हारी मम्मी इतना शोख़ मेकअप क्यों करती है?”
“इसलिए कि दुनिया हर शोख़ चीज़ को पसंद करती है... तुम्हारे और मेरे जैसे उल्लू इस दुनिया में बहुत कम बस्ते हैं जो मद्धम सुर और मद्धम रंग पसंद करते हैं, जो जवानी को बचपन के रूप में नहीं देखना चाहते और... और जो बुढ़ापे पर जवानी का मुलम्मा पसंद नहीं करते। हम जो ख़ुद को आर्टिस्ट कहते हैं, उल्लू के पट्ठे हैं।
मैं तुम्हें एक दिलचस्प वाक़िया सुनाता हूँ... बैसाखी का मेला था, तुम्हारे अमृतसर में। एक सेहतमंद नौजवान ने... ख़ालिस दूध और मक्खन पर पले हुए जवान ने, जिसकी नई जूती उसकी लाठी पर बाज़ीगरी कर रही थी, ऊपर एक कोठे की तरफ़ देखा और निहायत वाहियात रंगों में लिपी पुती एक स्याह फ़ाम टखियाई की तरफ़ देखा, जिसकी तेल में चुपड़ी हुई बबरियां, उसके माथे पर बड़े बदनुमा तरीक़े पर जमी हुई थीं और अपने साथी की पस्लियों में टहोका दे कर कहा, ओए लहना सय्यां... वेख़ ओए ऊपर वेख़... असी ते पिंड विच मझां ई...”
आख़िरी लफ़्ज़ वो ख़ुदा मालूम क्यों गोल कर गया, हालाँकि वो शाइस्तगी का बिल्कुल क़ाएल नहीं था। खिलखिला कर हँसने लगा और मेरे गिलास में रम डाल कर बोला, “उस जाट के लिए वो चुड़ैल ही उस वक़्त कोह-ए-क़ाफ़ की परी थी और उसके गांव की हसीन-ओ-जमील मुटियारें, बेडौल भैंसें... हम सब चुग़द हैं, दरमियाने दर्जे के, इसलिए कि इस दुनिया में कोई चीज़ अव्वल दर्जे की नहीं... तीसरे दर्जे की है या दरमियाने दर्जे की, लेकिन... लेकिन फ़ीलस, ख़ासुलख़ास दर्जे की चीज़ है। वो साँप के खपरों...”
वन क़ुतरे ने अपना गिलास उठा कर चड्डे के सर पर उंडेल दिया, “खपरे... खपरे, तुम्हारा मस्तक फिर गया है।”
चड्डे ने माथे पर से रम के टपकते हुए क़तरे ज़बान से चाटने शुरू कर दिए और वन क़ुतरे से कहा, “ले अब सुना... तेरा बाप साला तुझसे कितनी मोहब्बत करता था, मेरा दिमाग़ अब काफ़ी ठंडा हो गया है!”
वन कुतरे बहुत संजीदा हो कर मुझसे मुख़ातिब हुआ, “बाई गॉड, वो मुझसे बहुत मोहब्बत करता था, मैं फ़िफ़टीन इयर्ज़ का था कि उसने मेरी शादी बना दी।”
चड्डा ज़ोर से हंसा, “तुम्हें कार्टून बना दिया उस साले ने, भगवान उसे स्वर्ग में केबरील की पेटी दे कि वहां भी उसे बजा बजा कर तुम्हारी शादी के लिए कोई ख़ूबसूरत हूर ढूंढता रहे।”
वन क़ुतरे और भी संजीदा हो गया, “मंटो, मैं झूट नहीं कहता... मेरी वाइफ़ एक दम ब्यूटीफुल है, हमारी फ़ैमिली में...”
“तुम्हारी फ़ैमिली की ऐसी तैसी, फ़ीलस की बात करो... उससे ज़्यादा और कोई ख़ूबसूरत नहीं हो सकता।” चड्डे ने ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार की तरफ़ देखा जो कोने में बैठे फ़ीलस के हुस्न के मुतअ’ल्लिक़ अपनी अपनी राय का इज़हार एक दूसरे से करने वाले थे, “गन पाउडर प्लोट के बानियो, सुन लो तुम्हारी कोई साज़िश कामयाब नहीं होगी, मैदान चड्डे के हाथ रहेगा... क्यों वेल्ज़ के शहज़ादे?”
वेल्ज़ का शहज़ादा रम की ख़ाली होती हुई बोतल की तरफ़ हसरत भरी नज़रों से देख रहा था। चड्डे ने क़हक़हा लगाया और उसको आधा गिलास भर के दे दिया।
ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार एक दूसरे से फ़ीलस के बारे में घुल मिल के बातें तो कर रहे थे मगर अपने दिमाग़ में वो उसे हासिल करने की मुख़्तलिफ़ स्कीमें अ’लाहिदा तौर पर बना रहे थे। ये उनके तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू से साफ़ अ’याँ था।
ड्राइंगरूम में अब बिजली के बल्ब रौशन थे, क्योंकि शाम गहरी हो चली थी। चड्डा मुझसे बमबई की फ़िल्म इंडस्ट्री के ताज़ा हालात सुन रहा था कि बाहर बरामदे में मम्मी की तेज़ तेज़ आवाज़ सुनाई दी। चड्डे ने नारा बलंद किया और बाहर चला गया। ग़रीबनवाज़ ने रनजीत कुमार की तरफ़ और रनजीत कुमार ने ग़रीबनवाज़ की तरफ़ मा’नी ख़ेज़ नज़रों से देखा, फिर दोनों दरवाज़े की जानिब देखने लगे।
मम्मी चहकती हुई अंदर दाख़िल हुई। उसके साथ चार-पाँच ऐंगलो इंडियन लड़कियां थीं। मुख़्तलिफ़ क़द-ओ-क़ामत और ख़ुतूत व अलवान की। पोली, डोली, किट्टी, एलमा और थेलमा और वो हिजड़ा नुमा लड़का, उसको चड्डा ससी कह कर पुकारता था। फ़ीलस सबसे आख़िर में नुमूदार हुई और वो भी चड्डे के साथ। उसका एक बाज़ू उस प्लेटिनम ब्लोंड की पतली कमर में हमायल था। मैंने ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार का रद्द-ए-अ’मल नोट किया। उनको चड्डे की ये नुमाइशी फ़तहमनदाना हरकत पसंद नहीं आई थी।
लड़कियों के नाज़िल होते ही एक शोर बरपा हो गया। एक दम इतनी अंग्रेज़ी बरसी कि वन क़ुतरे मैट्रिकुलेशन इम्तहान में कई बार फ़ेल हुआ। मगर उसने कोई पर्वा न की और बराबर बोलता रहा। जब उससे किसी ने इल्तिफ़ात न बरता तो वो एलमा की बड़ी बहन थेलमा के साथ एक सोफे पर अलग बैठ गया और पूछने लगा कि उसने हिंदुस्तानी डांस के और कितने नए तोड़े सीखे हैं।
वो इधर धानी नाकत और नाथई थई कि वन, टू, थ्री बना बना कर उसको तोड़े बता रहा था, इधर चड्डा बाक़ी लड़कियों के झुरमुट में अंग्रेज़ी के नंगे नंगे लिरिक सुना रहा था जो उसको हज़ारों की तादाद में ज़बानी याद थे। मम्मी सोडे की बोतलें और गज़क का सामान मंगवा रही थी। रनजीत कुमार सिगरेट के कश लगा कर टकटकी बांधे फ़ीलस की तरफ़ देख रहा था और ग़रीबनवाज़ मम्मी से बार बार कहता था कि रुपये कम हों तो वो उससे ले ले।
स्काच खुली और पहला दौर शुरू हुआ। फ़ीलस को जब शामिल होने के लिए कहा गया तो उसने अपने प्लेटीमनी बालों को एक ख़फ़ीफ़ सा झटका दे कर इनकार कर दिया कि वो विस्की नहीं पिया करती। सबने इसरार किया मगर वो न मानी। चड्डे ने बददिली का इज़हार किया तो मम्मी ने फ़ीलस के लिए हल्का सा मशरूब तैयार किया और गिलास उसके होंटों के साथ लगा कर बड़े प्यार से कहा, “बहादुर लड़की बनो और पी जाओ।”
फ़ीलस इनकार न कर सकी। चड्डा ख़ुश हो गया और उसने इसी ख़ुशी में बीस-पच्चीस और लिरिक सुनाए। सब मज़े लेते रहे... मैंने सोचा, उ’रियानी से तंग आकर इंसान ने सतरपोशी इख़्तियार की होगी, यही वजह है कि अब वो सतरपोशी से उकता कर कभी कभी उ’रियानी की तरफ़ दौड़ने लगता है। शाइस्तगी का रद्द-ए-अ’मल यक़ीनन नाशाइस्तगी है। इस फ़रार का क़तई तौर पर एक दिलकुशा पहलू भी है। आदमी को इससे एक मुसलसल एक आहंगी की कोफ़्त से चंद घड़ियों के लिए नजात मिल जाती है।
मैंने मम्मी की तरफ़ देखा जो बहुत हश्शाश बश्शाश जवान लड़कियों में घुली मिली चड्डे के नंगे नंगे लिरिक सुन कर हंस रही थी और क़हक़हे लगा रही थी। उसके चेहरे पर वही वाहियात मेकअप था। उसके नीचे उसकी झुर्रियां साफ़ नज़र आ रही थीं मगर वो भी मसरूर थीं। मैंने सोचा, आख़िर लोग क्यों फ़रार को बुरा समझते हैं, वो फ़रार जो मेरी आँखों के सामने थे, इसका ज़ाहिर गो बदनुमा था, लेकिन बातिन उसका बेहद ख़ूबसूरत था। उस पर कोई बनाओ सिंघार, कोई ग़ाज़ा, कोई उबटन नहीं था।
पोली थी, वो एक कोने में रनजीत कुमार के साथ खड़ी, अपने नए फ़राक़ के बारे में बातचीत कर रही थी और उसे बता रही थी कि सिर्फ़ अपनी होशियारी से उसने बड़े सस्ते दामों पर ऐसी उम्दा चीज़ तैयार करा ली है। दो टुकड़े थे जो बज़ाहिर बिल्कुल बेकार मालूम होते थे, मगर अब वो एक ख़ूबसूरत पोशाक में तबदील हो गए थे और रनजीत कुमार बड़े ख़ुलूस के साथ उसको दो नए ड्रेस बनवा देने का वा’दा कर रहा था। हालाँकि उसे फ़िल्म कंपनी से इतने रुपये यकमुशत मिलने की हर्गिज़ हर्गिज़ उम्मीद नहीं थी।
डॉली थी वो ग़रीबनवाज़ से कुछ क़र्ज़ मांगने की कोशिश कर रही थी और उसको यक़ीन दिला रही थी कि दफ़्तर से तनख़्वाह मिलने पर वो ये क़र्ज़ ज़रूर अदा कर देगी। ग़रीबनवाज़ को क़तई तौर पर मालूम था कि वो ये रुपया हस्ब-ए-मा’मूल कभी वापस नहीं देगी मगर वो उसके वा’दे पर ए’तबार किए जा रहा था।
थेलमा, वन क़ुतरे से तानडव नाच के बड़े मुश्किल तोड़े सीखने की कोशिश कर रही थी। वन क़ुतरे को मालूम था कि सारी उम्र उसके पैर कभी उनके बोल अदा नहीं कर सकेंगे, मगर वो उसको बताए जा रहा था और थेलमा भी अच्छी तरह जानती थी कि वो बेकार अपना और वन क़ुतरे का वक़्त ज़ाए कर रही है, मगर बड़े शौक़ और इन्हिमाक से सबक़ याद कर रही थी।
एलमा और किट्टी दोनों पिए जा रही थीं और आपस में किसी आईवी की बात कर रही थीं जिसने पिछली रेस में उन दोनों से ख़ुदा मालूम कब का बदला लेने की ख़ातिर ग़लत टिप दी थी। वो चड्डा फ़ीलस के साँप के खपरे ऐसे रंग के बालों को पिघले हुए सोने की रंग की स्काच में मिला मिला कर पी रहा था।
फ़ीलस का हिजड़ा नुमा दोस्त बार बार जेब से कंघी निकालता था और अपने बाल संवारता था। मम्मी कभी उससे बात करती थी, कभी इससे, कभी सोडा खुलवाती थी। कभी टूटे हुए गिलास के टुकड़े उठवाती थी, उसकी निगाह सब पर थी। उस बिल्ली की तरह, जो बज़ाहिर आँखें बंद किए सुस्ताती है, मगर उसको मालूम होता है कि उसके पांचों बच्चे कहाँ कहाँ हैं और क्या क्या शरारत कर रहे हैं?
इस दिलचस्प तस्वीर में कौन सा रंग, कौन सा ख़त ग़लत था? मम्मी का वो भड़कीला और शोख़ मेकअप भी ऐसा मालूम होता था कि इस तस्वीर का एक ज़रूरी जुज़्व है।
ग़ालिब कहता है; कैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं। मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यों? कैद-ए-हयात और बंद-ए-ग़म जब अस्लन एक हैं तो ये क्या ग़रज़ है कि आदमी मौत से पहले थोड़ी देर के लिए नजात हासिल करने की कोशिश न करे। इस नजात के लिए कौन मलकुलमौत का इंतिज़ार करे... क्यों आदमी चंद लम्हात के लिए ख़ुद फ़रेबी के दिलचस्प खेल में हिस्सा न ले।
मम्मी सबकी तारीफ़ में रतबुल्लिसान थी। उसके पहलू में ऐसा दिल था जिसमें उन सब के लिए ममता थी। मैंने सोचा, शायद इसलिए उसने अपने चेहरे पर रंग मल लिया है कि लोगों को उसकी असलियत मालूम न हो। उसमें शायद इतनी जिस्मानी क़ुव्वत नहीं थी कि वो हर एक की माँ बन सकती... उसने अपनी शफ़क़त और मोहब्बत के लिए चंद आदमी चुन लिए थे और बाक़ी सारी दुनिया को छोड़ दिया था।
मम्मी को मालूम नहीं था। चड्डा एक तगड़ा पैग फ़ीलस को पिला चुका था। चोरी छुपे नहीं सब के सामने, मगर मम्मी उस वक़्त अंदर बावर्चीख़ाने में पोटैटो चिप्स तल रही थी, फ़ीलस नशे में थी, हल्के हल्के सुरूर में। जिस तरह उसके पालिश किए हुए फ़ौलाद के रंग के बाल आहिस्ता आहिस्ता लहराते थे, उसी तरह वो ख़ुद भी लहराती थी।
रात के बारह बज चुके थे। वन क़ुतरे, थेलमा को तोड़े सिखा सिखा कर अब उसे बता रहा था कि उस का बाप साला उससे बहुत मोहब्बत करता था। चाइल्डहुड में उसने उसकी शादी बना दी थी। उसकी वाइफ़ बहुत ब्यूटीफुल है और ग़रीबनवाज़, डॉली को क़र्ज़ दे कर भूल भी चुका था। रनजीत कुमार, पोली को अपने साथ कहीं बाहर ले गया था। एलमा और किट्टी दोनों जहान भर की बातें करके अब थक गई थीं और आराम करना चाहती थीं। तिपाई के इर्द गिर्द फ़ीलस उसका हिजड़ा नुमा साथी और मम्मी बैठे थे। चड्डा अब जज़्बाती नहीं था। फ़ीलस उसके पहलू में बैठी थी जिसने पहली दफ़ा शराब का सुरूर चखा था, उसको हासिल करने का अ’ज़्म उसकी आँखों में साफ़ मौजूद था। मम्मी उससे ग़ाफ़िल नहीं थी।
थोड़ी देर के बाद फ़ीलस का हिजड़ा नुमा दोस्त उठ कर सोफे पर दराज़ हो गया और अपने बालों में कंघी करते करते सो गया। ग़रीबनवाज़ और एलमा उठ कर कहीं चले गए। एलमा और किट्टी ने आपस में किसी मारग्रेट के मुतअ’ल्लिक़ बातें करते हुए मम्मी से रुख़सत ली और चली गईं। वन क़ुतरे ने आख़िरी बार अपनी बीवी की ख़ूबसूरती की तारीफ़ की और फ़ीलस की तरफ़ हसरत भरी नज़रों से देखा, फिर थेलमा की तरफ़ जो उसके पास बैठी थी और उसको बाज़ू से पकड़ कर चांद दिखाने के लिए बाहर मैदान में ले गया।
एक दम जाने क्या हुआ कि चड्डे और मम्मी में गर्म-गर्म बातें शुरू हो गईं। चड्डे की ज़बान लड़खड़ा रही थी। वो एक ना-ख़ल्फ़ बच्चे की तरह मम्मी से बदज़बानी करने लगा। फ़ीलस ने दोनों में मुसालहत की महीन महीन कोशिश की, मगर चड्डा हवा के घोड़े पर सवार था। वो फ़ीलस को अपने साथ सईदा काटेज में ले जाना चाहता था। मम्मी इसके ख़िलाफ़ थी। वो उसको बहुत देर तक समझाती रही कि वो इस इरादे से बाज़ आए, मगर वो इसके लिए तैयार नहीं था। वो बार बार मम्मी से कह रहा था, “तुम दीवानी हो गई हो, बूढ़ी दलाला... फ़ीलस मेरी है, पूछ लो इससे।”
मम्मी ने बहुत देर तक उसकी गालियां सुनीं, आख़िर में बड़े समझाने वाले अंदाज़ में उससे कहा, “चड्डा, माई सन, तुम क्यों नहीं समझते... शी इज़ यंग, शी इज़ वेरी यंग!”
उसकी आवाज़ में कपकपाहट थी। एक इल्तिजा थी, एक सरज़निश थी, एक बड़ी भयानक तस्वीर थी, मगर चड्डा बिल्कुल न समझा। उस वक़्त उसके पेश-ए-नज़र सिर्फ़ फ़ीलस और उसका हुसूल था। मैंने फ़ीलस की तरफ़ देखा और मैंने पहली दफ़ा बड़ी शिद्दत से महसूस किया कि वो बहुत छोटी उम्र की थी, बमुश्किल पंद्रह बरस की। उसका सफ़ेद चेहरा नुक़रई बादलों में घिरा हुआ बारिश के पहले क़तरे की तरह लरज़ रहा था।
चड्डे ने उस को बाज़ू से पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचा और फिल्मों के हीरो के अंदाज़ में उसे अपने सीने के साथ भींच लिया, मम्मी ने एहतिजाज की चीख़ बलंद की, “चड्डा... छोड़ दो, फ़ॉर गॉड सेक, छोड़ दो उसे।”
जब चड्डे ने फ़ीलस को अपने सीने से जुदा न किया तो मम्मी ने उसके मुँह पर एक चांटा मारा, “गेट आउट... गेट आउट!”
चड्डा भौंचक्का रह गया। फ़ीलस को जुदा कर के उसने धक्का दिया और मम्मी की तरफ़ क़हर आलूद निगाहों से देखता बाहर चला गया। मैंने उठ कर रुख़सत ली और चड्डे के पीछे चला गया।
सईदा काटेज पहुंच कर मैंने देखा कि वो पतलून, क़मीज़ और बूट समेत पलंग पर औंधे मुँह लेटा था। मैंने उससे कोई बात न की और दूसरे कमरे में जा कर बड़े मेज़ पर सो गया।
सुबह देर से उठा। घड़ी में दस बजे रहे थे। चड्डा सुबह ही सुबह उठ कर बाहर निकल रहा था तो मैंने उसकी आवाज़ सुनी जो गेराज से बाहर आ रही थी। मैं रुक गया। वो किसी से कह रहा था, “वो लाजवाब औरत है... ख़ुदा की क़सम वो लाजवाब औरत है। दुआ करो कि उसकी उम्र को पहुंच कर तुम भी वैसी ही ग्रेट हो जाओ।”
उसके लहजे में एक अ’जीब-ओ-ग़रीब तल्ख़ी थी। मालूम नहीं उसका रुख़ उसकी अपनी ज़ात की जानिब था या उस शख़्स की तरफ़ जिससे वो मुख़ातिब था। मैंने ज़्यादा देर वहां रुके रहना मुनासिब न समझा और अंदर चला गया। निस्फ़ घंटे के क़रीब मैंने उसका इंतिज़ार किया। जब वो न आया तो में प्रभातनगर रवाना हो गया।
मेरी बीवी का मिज़ाज मो’तदिल था, हरीश घर में नहीं था। उसकी बीवी ने उसके मुतअ’ल्लिक़ इस्तफ़्सार किया तो मैंने कह दिया कि वो अभी तक सो रहा है। पूने में काफ़ी तफ़्रीह हो गई थी। इस लिए मैंने हरीश की बीवी से कहा कि हमें इजाज़त दी जाये। रसमन उसने हमें रोकना चाहा, मगर मैं सईदा काटेज ही से फ़ैसला करके चला था कि रात का वाक़िया मेरे लिए ज़ेहनी जुगाली के वास्ते बहुत काफ़ी है।
हम चल दिए... रास्ते में मम्मी की बातें हुईं, जो कुछ हुआ था। मैंने उसको मिन-ओ-इन सुना दिया। उसका रद्द-ए-अ’मल ये था कि फ़ीलस उसकी कोई रिश्तेदार होगी या वो उसे किसी अच्छी आसामी को पेश करना चाहती थी जभी उसने चड्डे से लड़ाई की, मैं ख़ामोश रहा। उसकी तरदीद की न ताईद।
कई दिन गुज़रने पर चड्डे का ख़त आया, जिसमें उस रात के वाक़ये का सरसरी ज़िक्र था और उसने अपने मुतअ’ल्लिक़ ये कहा था, “मैं उस रोज़ हैवान बन गया था... ला’नत हो मुझ पर!”
तीन महीने के बाद मुझे एक ज़रूरी काम से पूने जाना पड़ा। सीधा सईदा काटेज पहुंचा। चड्डा मौजूद नहीं था। ग़रीबनवाज़ से उस वक़्त मुलाक़ात हुई, जब वो गेराज से बाहर निकल कर शीरीं के ख़ुर्द साल बच्चे को प्यार कर रहा था। वो बड़े तपाक से मिला। थोड़ी देर के बाद रनजीत कुमार आगया, कछुवे की चाल चलता और ख़ामोश बैठ गया।
मैं अगर इस से कुछ पूछता तो वो बड़े इख़्तिसार से जवाब देता। उससे बातों बातों में मालूम हुआ कि चड्डा उस रात के बाद मम्मी के पास नहीं गया और न वो कभी यहां आई है। फ़ीलस को उसने दूसरे रोज़ ही अपने माँ-बाप के पास भिजवा दिया था। वो उस हिजड़ा नुमा लड़के के साथ घर से भाग कर आई हुई थी। रनजीत कुमार को यक़ीन था कि अगर वो कुछ दिन और पूने में रहती तो वो ज़रूर उसे ले उड़ता। ग़रीबनवाज़ को ऐसा कोई ज़ो’म नहीं था। उसे सिर्फ़ ये अफ़सोस था कि वो चली गई।
चड्डे के मुतअ’ल्लिक़ ये पता चला कि दो-तीन रोज़ से उसकी तबीयत नासाज़ है, बुख़ार रहता है, मगर वो किसी डाक्टर से मशवरा नहीं लेता... सारा दिन इधर उधर घूमता रहता है। ग़रीबनवाज़ ने जब मुझे ये बातें बताना शुरू करीं तो रनजीत कुमार उठ कर चला गया। मैंने सलाख़ों वाली खिड़की में से देखा, उसका रुख़ गेराज की तरफ़ था।
मैं ग़रीबनवाज़ से गेराज वाली शीरीं के मुतअ’ल्लिक़ कुछ पूछने के लिए ख़ुद को तैयार ही कर रहा था कि वन क़ुतरे सख़्त घबराया हुआ कमरे में दाख़िल हुआ, उससे मालूम हुआ कि चड्डे को सख़्त बुख़ार था, वो उसे तांगे में यहां लारहा था कि रास्ते में बेहोश हो गया। मैं और ग़रीबनवाज़ बाहर दौड़े। तांगे वाले ने बेहोश चड्डे को सँभाला हुआ था। हम सब ने मिल कर उसे उठाया और कमरे में पहुंचा कर बिस्तर पर लिटा दिया। मैंने उसके माथे पर हाथ रख कर देखा, वाक़ई बहुत तेज़ बुख़ार था। एक सौ छ डिग्री से क़तअ’न कम न होगा।
मैंने ग़रीबनवाज़ से कहा कि फ़ौरन डाक्टर को बुलाना चाहिए। उसने वन क़ुतरे से मशवरा किया। वो “अभी आता हूँ” कह कर चला गया। जब वापस आया तो उसके साथ मम्मी थी जो हांप रही थी। अंदर दाख़िल होते ही उसने चड्डे की तरफ़ देखा और क़रीब क़रीब चीख़ कर पूछा, “क्या हुआ मेरे बेटे को?”
वन क़ुतरे ने जब उसे बताया कि चड्डा कई दिन से बीमार था तो मम्मी ने बड़े रंज और ग़ुस्से के साथ कहा, “तुम कैसे लोग हो, मुझे इत्तिला क्यों न दी।” फिर उसने ग़रीबनवाज़, मुझे और वन क़ुतरे को मुख़्तलिफ़ हिदायात दीं। एक को चड्डे के पास सहलाने की, दूसरे को बर्फ़ लाने की और तीसरे को पंखा करने की। चड्डे की हालत देख कर उसकी अपनी हालत बहुत ग़ैर हो गई थी। लेकिन उसने तहम्मुल से काम लिया और डाक्टर बुलाने चली गई।
मालूम नहीं रनजीत कुमार को गेराज में कैसे पता चला। मम्मी के जाने के बाद फ़ौरन वो घबराया हुआ आया। जब उसने इस्तफ़सार किया तो वन क़ुतरे ने उसके बेहोश होने का वाक़िया बयान कर दिया और ये भी बता दिया कि मम्मी डाक्टर के पास गई है। ये सुन कर रनजीत कुमार का इज़्तराब किसी हद तक दूर हो गया।
मैंने देखा कि वो तीनों बहुत मुतमइन थे, जैसे चड्डे की सेहत की सारी ज़िम्मेदारी मम्मी ने अपने सर ले ली है।
उसकी हिदायात के मुताबिक़ चड्डे के पांव सहलाए जा रहे थे। सर पर बर्फ़ की पट्टियां रखी जा रही थीं। जब मम्मी डाक्टर लेकर आई तो वो किसी क़दर होश में आ रहा था। डाक्टर ने मुआइने में काफ़ी देर लगाई। उसके चेहरे से मालूम होता था कि चड्डे की ज़िंदगी ख़तरे में है। मुआइने के बाद डाक्टर ने मम्मी को इशारा किया और वो कमरे से बाहर चले गए। मैंने सलाख़ों वाली खिड़की में से देखा गेराज के टाट का पर्दा हिल रहा था।
थोड़ी देर के बाद मम्मी आई। ग़रीबनवाज़, वन क़ुतरे और रनजीत कुमार से उसने फ़र्दन फ़र्दन कहा कि घबराने की कोई बात नहीं। चड्डा अब आँखें खोल कर सुन रहा था। मम्मी को उसने हैरत की निगाहों से नहीं देखा था लेकिन वो उलझन सी महसूस कर रहा था। चंद लम्हात के बाद जब वो समझ गया कि मम्मी क्यों और कैसे आई है तो उसने मम्मी का हाथ अपने हाथ में लिया और दबा कर कहा, “मम्मी, यू आर ग्रेट!”
मम्मी उसके पास पलंग पर बैठ गई। वो शफ़क़त का मुजस्समा थी। चड्डे के तपते हुए माथे पर हाथ फेर कर उसने मुस्कुरते हुए सिर्फ़ इतना कहा, “मेरे बेटे... मेरे ग़रीब बेटे!”
चड्डे की आँखों में आँसू आगए, लेकिन फ़ौरन ही उसने उनको जज़्ब करने की कोशिश की और कहा, “नहीं, तुम्हारा बेटा अव्वल दर्जे का स्काउन्डरल है, जाओ अपने मरहूम ख़ाविंद का पिस्तौल लाओ और इसके सीने पर दाग़ दो!”
मम्मी ने चड्डे के गाल पर हौले से तमांचा मारा, “फ़ज़ूल बकवास न करो।” फिर वो चुस्त-ओ-चालाक नर्स की तरह उठी और हम सबसे मुख़ातिब हो कर कहा, “लड़को, चड्डा बीमार है, और मुझे हस्पताल ले जाना है इसे... समझे?”
सब समझ गए। ग़रीबनवाज़ ने फ़ौरन टैक्सी का बंदोबस्त कर दिया। चड्डे को उठा कर उसमें डाला गया। वो बहुत कहता रहा कि इतनी कौन सी आफ़त आगई है जो उस को हस्पताल के सिपुर्द किया जा रहा है। मगर मम्मी यही कहती रही कि बात कुछ भी नहीं। हस्पताल में ज़रा आराम रहता है। चड्डा बहुत ज़िद्दी था। मगर नफ़्सियाती तौर पर वो उस वक़्त मम्मी की किसी बात से इनकार नहीं कर सकता था।
चड्डा हस्पताल में दाख़िल हो गया। मम्मी ने अकेले में मुझे बताया कि मर्ज़ बहुत ख़तरनाक है, या’नी प्लेग। ये सुन कर मेरे औसान ख़ता हो गए। ख़ुद मम्मी बहुत परेशान थी लेकिन उसको उम्मीद थी कि ये बला टल जाएगी और चड्डा बहुत जल्द तंदुरुस्त हो जाएगा।
ईलाज होता रहा। प्राईवेट हस्पताल था। डाक्टरों ने चड्डे का ईलाज बहुत तवज्जो से किया मगर कई पेचीदगियां पैदा हो गईं। उसकी जिल्द जगह जगह से फटने लगी और बुख़ार बढ़ता गया। डाक्टरों ने बिलआख़िर ये राय दी कि उसे बंबई ले जाओ, मगर मम्मी न मानी। उसने चड्डे को उसी हालत में उठवाया और अपने घर ले गई।
मैं ज़यादा देर पूने में नहीं ठहर सकता था। वापस बंबई आया तो मैंने टेलीफ़ोन के ज़रिये से कई मर्तबा उसका हाल दरयाफ़्त किया। मेरा ख़याल था कि वो प्लेग के हमले से जांबर न हो सकेगा। मगर मुझे मालूम हुआ कि आहिस्ता आहिस्ता उसकी हालत सँभल रही है। एक मुक़द्दमे के सिलसिले में मुझे लाहौर जाना पड़ा। वहां से पंद्रह रोज़ के बाद लौटा तो मेरी बीवी ने चड्डे का एक ख़त दिया जिसमें सिर्फ़ ये लिखा था, “अ’ज़ीमुलमरतबत मम्मी ने अपने नाख़ल्फ़ बेटे को मौत के मुँह से बचा लिया है।”
इन चंद लफ़्ज़ों में बहुत कुछ था। जज़्बात का एक पूरा समुंदर था। मैंने अपनी बीवी से इसका ज़िक्र खिलाफ़-ए-मा’मूल बड़े जज़्बाती अंदाज़ में किया तो उसने मुतास्सिर हो कर सिर्फ़ इतना कहा, “ऐसी औरतें उमूमन ख़िदमतगुज़ार हुआ करती हैं।”
मैंने चड्डे को दो तीन ख़त लिखे, जिनका जवाब न आया। बाद में मालूम हुआ कि मम्मी ने उसको तबदीली आब-ओ-हवा की ख़ातिर अपनी एक सहेली के हाँ लोनावला भिजवा दिया था। चड्डा वहां बमुश्किल एक महीना रहा और उकता कर चला आया। जिस रोज़ वो पूने पहुंचा इत्तफ़ाक़ से मैं वहीं था।
प्लेग के ज़बरदस्त हमले के बाइ’स वो बहुत कमज़ोर हो गया था। मगर उसकी गोगा पसंद तबीयत उसी तरह ज़ोरों पर थी। अपनी बीमारी का उसने इस अंदाज़ में ज़िक्र किया कि जिस तरह आदमी साईकल के मामूली हादिसे का ज़िक्र करता है। अब कि वो जांबर हो गया था, अपनी ख़तरनाक अ’लालत के मुतअ’ल्लिक़ तफ़सीली गुफ़्तगू उसे बेकार मालूम होती थी।
सईदा काटेज में चड्डे की ग़ैर हाज़िरी के दौरान में छोटी छोटी तबदीलियां हुई थीं। एल बिरादरान या’नी अक़ील और शकील कहीं और उठ गए थे, क्योंकि उन्हें अपनी ज़ाती फ़िल्म कंपनी क़ायम करने के लिए सईदा काटेज की फ़िज़ा मुनासिब-ओ-मौज़ूं मालूम नहीं होती थी। उसकी जगह एक बंगाली म्यूज़िक डायरेक्टर आ गया था। उसका नाम सेन था। उसके साथ लाहौर से भागा हुआ एक लड़का राम सिंह रहता था। सईदा काटेज वाले सब उससे काम लेते थे। तबीयत का बहुत शरीफ़ और ख़िदमतगुज़ार था। चड्डे के पास उस वक़्त आया था जब वो मम्मी के कहने पर लोनावला जा रहा था। उसने ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार से कह दिया था कि उसे सईदा काटेज में रख लिया जाए। सेन के कमरे में चूँकि जगह ख़ाली थी, इसलिए उसने वहीं अपना डेरा जमा दिया था।
रनजीत कुमार को कंपनी के नए फ़िल्म में हीरो मुंतख़ब कर लिया गया और उसके साथ वा’दा किया गया था कि अगर फ़िल्म कामयाब हुआ तो उसको दूसरा फ़िल्म डाइरेक्ट करने का मौक़ा दिया जाएगा। चड्डा अपनी दो बरस की जमाशुदा तनख़्वाह में से डेढ़ हज़ार रुपया यकमुश्त हासिल करने में कामयाब हो चुका था। उसने रनजीत कुमार से कहा था, “मेरी जान, अगर कुछ वसूल करना है तो प्लेग में मुब्तला हो जाओ, हीरो और डायरेक्टर बनने से मेरा तो ख़याल है यही बेहतर है।”
ग़रीबनवाज़ ताज़ा ताज़ा हैदराबाद से वापस आया था। इसलिए सईदा काटेज किसी क़दर मरफ़उलहाल थी। मैंने देखा कि गेराज के बाहर अलगनी से ऐसी क़मीज़ और शलवारें लटक रही थीं जिनका कपड़ा अच्छा और क़ीमती था। शीरीं के ख़ुर्द साल बच्चे के पास नए खिलौने थे।
मुझे पूने में पंद्रह रोज़ रहना पड़ा। मेरा पुराना फिल्मों का साथी अब नए फ़िल्म की हीरोइन की मोहब्बत में गिरफ़्तार होने की कोशिश में मसरूफ़ था मगर डरता था, क्योंकि ये हीरोइन पंजाबी थी और उसका ख़ाविंद बड़ी बड़ी मूंछों वाला हट्टा कट्टा मुश्टंडा था। चड्डे ने उसको हौसला दिया था, “कुछ पर्वा न करो उस साले की, जिस पंजाबी ऐक्ट्रस का ख़ाविंद बड़ी बड़ी मूंछों वाला पहलवान हो, वो इश्क़ के मैदान में ज़रूर चारों शाने चित गिरा करता है। बस इतना करो कि सौ रुपये फ़ी गाली के हिसाब से मुझसे पंजाबी की दस-बीस बड़ी हेवी वेट क़िस्म की गालियां सीख लो। ये तुम्हारी ख़ास मुश्किलों में बहुत काम आया करेंगी।”
हरीश एक बोतल फ़ी गिलास के हिसाब से छः गालियां पंजाब के मख़सूस लब-ओ-लहजे में याद कर चुका था। मगर अभी तक उसे अपने इश्क़ के रास्ते में कोई ऐसी ख़ास मुश्किल दरपेश नहीं आई थी जो वो उनकी तासीर का इम्तहान ले सकता।
मम्मी के घर हस्ब-ए-मा’मूल महफ़िलें जमती थीं। पोली, डोली, किट्टी, एलमा, थेलमा वग़ैरा सब आई थीं। वन क़ुतरे बदस्तूर थेलमा को कथा कली और तानडव नाच की ताथई और धानी नाकत की वन टू थ्री बना बना कर बताता था और वो उसे सीखने की पुरख़ुलूस कोशिश करती थी।
ग़रीबनवाज़ हस्ब-ए-तौफ़ीक़ क़र्ज़ दे रहा था और रनजीत कुमार जिसको अब कंपनी के नए फ़िल्म में हीरो का चांस मिल रहा था। इनमें से किसी एक को बाहर खुली हवा में ले जाता था। चड्डे के नंगे नंगे लिरिक सुन कर इसी तरह क़हक़हे बरपा होते थे, एक सिर्फ़ वो नहीं थी... वो जिसके बालों के रंग के लिए सही तशबीहा ढ़ूढ़ने में चड्डे ने काफ़ी वक़्त सर्फ़ किया था। मगर इन महफ़िलों में चड्डे की निगाहें उसे ढूंढती नहीं थी।
फिर भी कभी कभी चड्डे की नज़रें मम्मी की नज़रों से टकरा कर झुक जाती थीं तो मैं महसूस करता था कि उसको अपनी उस रात की दीवानगी का अफ़सोस है। ऐसा अफ़सोस जिसकी याद से उसको तकलीफ़ होती है। चुनांचे चौथे पैग के बाद किसी वक़्त इस क़िस्म का जुमला उसकी ज़बान से बेइख़्तियार निकल जाता, “चड्डा... यू आर ए डीम्ड ब्रूट!”
ये सुन कर मम्मी ज़ेर-ए-लब मुस्कुरा देती थी, जैसे वो इस मुस्कुराहट की शीरीनी में लपेट लपेट कर ये कह रही है, “डोंट टोक रूट।”
वन क़ुतरे से बदस्तूर उसकी चख़ चलती थी। सुरूर में आकर जब भी वो अपने बाप की तारीफ़ में या अपनी बीवी की ख़ूबसूरती के मुतअ’ल्लिक़ कुछ कहने लगता तो वो उसकी बात बहुत बड़े गंडासे से काट डालता। वो ग़रीब चुप हो जाता और अपना मैट्रिकुलेशन सर्टीफ़िकेट तह कर के जेब में डाल लेता।
मम्मी, वही मम्मी थी... पोली की मम्मी, डॉली की मम्मी, चड्डे की मम्मी, रनजीत कुमार की मम्मी... सोडे की बोतलों, गज़क चीज़ों और महफ़िल जमाने के दूसरे साज़-ओ-सामान के इंतिज़ाम में वो उसी पुर शफ़क़त इन्हिमाक से हिस्सा लेती थी। उसके चेहरे का मेकअप वैसा ही वाहियात होता था। उस के कपड़े उसी तरह के शोख़-ओ-शंग थे।
ग़ाज़े और सुर्ख़ी की तहों से उसकी झुर्रियां उसी तरह झाँकती थीं। मगर अब मुझे ये मुक़द्दस दिखाई देती थीं। इतनी मुक़द्दस कि प्लेग के कीड़े उन तक नहीं पहुंच सके थे। डर कर, सिमट कर, वो डर गए थे... चड्डे के जिस्म से भी निकल भागे थे कि उस पर इन झुर्रियों का साया था। उन मुक़द्दस झुर्रियों का जो हर वक़्त निहायत वाहियात रंगों में लिथड़ी रहती थीं।
वन क़ुतरे की ख़ूबसूरत बीवी के जब इस्क़ात हुआ था तो मम्मी ही की बर वक़्त इमदाद से उसकी जान बची थी। थेलमा जब हिंदुस्तानी रक़्स सीखने के शौक़ में मारवाड़ के एक कत्थक के हत्थे चढ़ गई थी और उस सौदे में एक रोज़ जब उसको अचानक मालूम हुआ था कि उसने एक मर्ज़ ख़रीद लिया है तो मम्मी ने उसको बहुत डाँटा था और उसको जहन्नम सपुर्द कर के हमेशा हमेशा के लिए उससे क़ता तअ’ल्लुक़ करने का तहय्या कर लिया था मगर उसकी आँखों में आँसू देख कर उसका दिल पसीज गया था। उसने उसी रोज़ शाम को अपने बेटों को सारी बात सुना दी थी और उससे दरख़ास्त की थी कि वो थेलमा का ईलाज कराएं।
किट्टी को एक मुअ’म्मा हल करने के सिलसिले में पाँच सौ रुपये का इनाम मिला था, तो उसने मजबूर किया था कि वो कम अज़ कम उसके आधे रुपये ग़रीबनवाज़ को दे दे, क्योंकि उस ग़रीब का हाथ तंग है। उसने किट्टी से कहा था तुम इस वक़्त उसे दे दो, बाद में लेती रहना और मुझसे उसने पंद्रह रोज़ के क़ियाम के दौरान में कई मर्तबा मेरी मिसेज़ के बारे में पूछा था और तशवीश का इज़हार किया था कि पहले बच्चे की मौत को इतने बरस हो गए हैं, दूसरा बच्चा क्यों नहीं हुआ।
रनजीत कुमार से ज़्यादा रग़बत के साथ बात नहीं करती थी। ऐसा मालूम होता था कि उसकी नुमाइश पसंद तबीयत उसको अच्छी नहीं लगती। मेरे सामने इसका इज़हार वो एक दो मर्तबा लफ़्ज़ों में भी कर चुकी थी। म्यूज़िक डायरेक्टर सेन से वो नफ़रत करती थी। चड्डा उसको अपने साथ लाता था तो वो उससे कहती थी, “ऐसे ज़लील आदमी को यहां मत लाया करो।” चड्डा उससे वजह पूछता तो वो बड़ी संजीदगी से ये जवाब देती थी कि “मुझे ये आदमी उपर उपर सा मालूम होता है... फ़िट नहीं बैठता मेरी नज़रों में।” ये सुन कर चड्डा हंस देता था।
मम्मी के घर की महफ़िलों की पुर-ख़ुलूस गर्मी लिए मैं वापस बम्बई चला गया। इन महफ़िलों में रिंदी थी, बलानोशी थी, जिन्सियाती रंग था, मगर कोई उलझाओ नहीं था। हर चीज़ हामिला औरत के पेट की तरह क़ाबिल-ए-फ़हम थी, उसी तरह उभरी हुई। बज़ाहिर उसी तरह कुढब, हैंडी और देखने वाले को गो मगो की हालत में डालने वाली। मगर असल में बड़ी सही, बासलीक़ा और अपनी जगह पर क़ायम।
दूसरे रोज़ सुबह के अख़बारों में ये पढ़ा कि सईदा काटेज में बंगाली म्यूज़िक डायरेक्टर सेन मारा गया है। उसको क़त्ल करने वाला कोई राम सिंह है जिसकी उम्र चौदह-पंद्रह बरस के क़रीब बताई जाती है। मैंने फ़ौरन पूने टेलीफ़ोन किया मगर कोई न मिल सका।
एक हफ़्ते के बाद चड्डे का ख़त आया जिसमें हादसा-ए-क़त्ल की पूरी तफ़सील थी। रात को सब सोए थे कि चड्डे के पलंग पर अचानक कोई गिरा। वो हड़बड़ा कर उठा, रौशनी की तो देखा कि सेन है, ख़ून में लतपत्। चड्डा अच्छी तरह अपने होश-ओ-हवास सँभालने भी न पाया था कि दरवाज़े में राम सिंह नुमूदार हुआ। उसके हाथ में छुरी थी, फ़ौरन ही ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार भी आगए। सारी सईदा काटेज बेदार हो गई। रनजीत कुमार और ग़रीबनवाज़ ने राम सिंह को पकड़ लिया और छुरी उस के हाथ से छीन ली। चड्डे ने सेन को अपने पलंग पर लिटाया और उससे ज़ख़्मों के मुतअ’ल्लिक़ कुछ पूछने ही वाला था कि उसने आख़री हिचकी ली और ठंडा हो गया।
राम सिंह, ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार की गिरफ़्त में था, मगर वो दोनों काँप रहे थे। सेन मर गया तो राम सिंह ने चड्डे से पूछा, “भापा जी, मर गया?”
चड्डे ने इस्बात में जवाब दिया तो राम सिंह ने रनजीत कुमार और ग़रीबनवाज़ से कहा, “मुझे छोड़ दीजिए, मैं भागूंगा नहीं।”
चड्डे की समझ में नहीं आता था कि वो क्या करे। उसने फ़ौरन नौकर को भेज कर मम्मी को बुलवाया। मम्मी आई तो सब मुतमइन हो गए कि मुआ’मला सुलझ जाएगा। उसने राम सिंह को आज़ाद कर दिया और थोड़ी देर के बाद अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गई जहां उसका बयान दर्ज करा दिया गया।
इसके बाद चड्डा और उसके साथी कई दिन तक सख़्त परेशान रहे। पुलिस की पूछगछ, बयानात, फिर अदालत में मुक़द्दमे की पैरवी। मम्मी इस दौरान में बहुत दौड़ धूप करती रही थी। चड्डा को यक़ीन था कि राम सिंह बरी हो जाएगा। चुनांचे ऐसा ही हुआ। मातहत अदालत ही ने उसे साफ़ बरी कर दिया। अदालत में उसका वही बयान था जो उसने थाने में दिया था।
मम्मी ने उससे कहा था, “बेटा घबराओ नहीं, जो कुछ हुआ है सच सच बता दो...” और उसने तमाम वाक़िआ’त मिन-ओ-इन बयान कर दिए थे कि सेन ने उसको प्ले बैक सिंगर बना देने का लालच दिया था। उसको ख़ुद भी मोसीक़ी से बड़ा लगाओ था और सेन बहुत अच्छा गाने वाला था। वो इस चक्कर में आ कर उसकी शहवानी ख़्वाहिशात को पूरी करता रहा। मगर उसको उससे सख़्त नफ़रत थी। उसका दिल बार बार उसे ला’नत-मलामत करता था। आख़िर में वो इस कदर तंग आगया था कि उसने सेन से कह भी दिया था कि अगर उस ने फिर उसे मजबूर किया तो वो उसे जान से मार डालेगा। चुनांचे वारदात की रात को यही हुआ।
अदालत में उसने यही बयान दिया। मम्मी मौजूद थी। आँखों ही आँखों में वो राम सिंह को दिलासा देती रही कि घबराओ नहीं, जो सच है कह दो। सच की हमेशा फ़तह होती। इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारे हाथों ने ख़ून किया है मगर एक बड़ी नजिस चीज़ का, एक ख़बासत का, एक ग़ैर फ़ित्री सौदे का।
राम सिंह ने बड़ी सादगी, बड़े भोलेपन और बड़े मासूमाना अंदाज़ में सारे वाक़ियात बयान किए। मजिस्ट्रेट इस क़दर मुतास्सिर हुआ कि उसने राम सिंह को बरी कर दिया। चड्डे ने कहा, “इस झूटे ज़माने में ये सदाक़त की हैरतअंगेज़ फ़तह है... और इसका सहरा मेरी बुढ्ढी मम्मी के सर है!”
चड्डे ने मुझे उस जलसे में बुलाया था जो राम सिंह की रिहाई की ख़ुशी में सईदा काटेज वालों ने किया था, मगर मैं मसरूफ़ियत के बाइ’स उसमें शरीक न हो सका। एल बरादर्ज़ शकील और अक़ील दोनों वापस सईदा काटेज आगए थे। बाहर की फ़िज़ा भी उनकी ज़ाती फ़िल्म कंपनी की तासीस-ओ-ता’मीर के लिए रास न आई थी। अब वो फिर अपनी पुरानी फ़िल्म कंपनी में किसी असिस्टेंट के असिस्टेंट हो गए थे। उन दोनों के पास इस सरमाए में से चंद सौ बाक़ी बचे हुए थे जो उन्होंने अपनी फ़िल्म कंपनी की बुनियादों के लिए फ़राहम किया था।
चड्डे के मशवरे पर उन्होंने ये सब रूपये जलसे को कामयाब बनाने के लिए दिया। चड्डे ने उनसे कहा था, “अब मैं चार पैग पी कर दुआ करूंगा कि वो तुम्हारी ज़ाती फ़िल्म कंपनी फ़ौरन खड़ी कर दे।”
चड्डे का बयान था कि उस जलसे में वन क़ुतरे ने शराब पी कर खिलाफ़-ए-मा’मूल अपने साले बाप की तारीफ़ न की और न अपनी ख़ूबसूरत बीवी का ज़िक्र किया। ग़रीबनवाज़ ने किट्टी की फ़ौरी ज़रूरियात के पेशे नज़र उसको दो सौ रुपये क़र्ज़ दिए और रनजीत कुमार से उसने कहा था, “तुम इन बेचारी लड़कियों को यूंही झांसे न दिया करो, हो सकता है कि तुम्हारी नीयत साफ़ हो, मगर लेने के मुआ’मले में उनकी नीयत इतनी साफ़ नहीं होती, कुछ न कुछ दे दिया करो!”
मम्मी ने इस जलसे में राम सिंह को बहुत प्यार किया, और सबको ये मशवरा दिया कि उसे घर वापस जाने के लिए कहा जाये। चुनांचे वहीं फ़ैसला हुआ और दूसरे रोज़ ग़रीबनवाज़ ने उसके टिकट का बंदोबस्त कर दिया। शीरीं ने सफ़र के लिए उसको खाना पका कर दिया। स्टेशन पर सब उसको छोड़ने गए। ट्रेन चली तो वो देर तक हाथ हिलाते रहे।
ये छोटी छोटी बातें मुझे उस जलसे के दस रोज़ बाद मालूम हुईं, जब मुझ एक ज़रूरी काम से पूने जाना पड़ा। सईदा काटेज में कोई तबदीली वाक़ा नहीं हुई थी। ऐसा मालूम होता था कि वो ऐसा पड़ाव है जिसकी शक्ल-ओ-सूरत हज़ारहा क़ाफ़िलों के ठहरने से भी तबदील नहीं होती। वो कुछ ऐसी जगह थी जो अपना ख़ला ख़ुद ही पुर कर देती थी।
मैं जिस रोज़ वहां पहुंचा, शीरीनी बट रही थी। शीरीं के घर एक और लड़का हुआ था। वन क़ुतरे के हाथ में ग्लैक्सो का डिब्बा था। उन दिनों ये बड़ी मुश्किल से दस्तयाब होता था। उसने अपने बच्चे के लिए कहीं से दो पैदा किए थे। उनमें से एक वो शीरीं के नौज़ाईदा लड़के के लिए ले आया था।
चड्डे ने आख़िरी दो लड्डू उसके मुँह में ठूंसे और कहा, “तू ये ग्लैक्सो का डिब्बा ले आया है, बड़ा कमाल किया है तू ने। अपने साले बाप और अपनी साली बीवी को देखना, हर्गिज़ कोई बात न करना।”
वन क़ुतरे ने बड़े भोलपन के साथ कहा, “साले, मैं अब कोई पिएला हूं, वो तो दारू बोला करती है, वैसे बाई गॉड, मेरी बीवी बड़ी हैंडसम है।”
चड्डे ने इस क़दर बेतहाशा क़हक़हा लगाया कि वन क़ुतरे को और कुछ कहने का मौक़ा न मिला। इसके बाद चड्डा, ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार मुझसे मुतवज्जा हुए और उस कहानी की बातें शुरू हो गईं जो मैं अपने पुराने फिल्मों के साथी के ज़रिये से वहां के एक प्रोडयूसर के लिए लिख रहा था। फिर कुछ देर शीरीं के नौज़ाईदा लड़के का नाम मुक़र्रर होता रहा। सैकड़ों नाम पेश हुए मगर चड्डे को पसंद न आए। आख़िर मैंने कहा कि जाये पैदाइश या’नी सईदा काटेज की रिआयत से लड़का मौलूद-ए-मसऊद है। इसलिए मसऊद नाम बेहतर रहेगा। चड्डे को पसंद नहीं था लेकिन उसने आ’रज़ी तौर पर क़बूल कर लिया।
इस दौरान में मैंने महसूस किया कि चड्डा, ग़रीबनवाज़ और रनजीत कुमार तीनों की तबीयत किसी क़दर बुझी बुझी सी थी। मैंने सोचा, शायद ख़िज़ां के मौसम की वजह है। जब आदमी ख़्वाह मख़्वाह थकावट महसूस करता है। शीरीं का नया बच्चा भी इस ख़फ़ीफ़ इज़मिहलाल का बाइ’स हो सकता था। लेकिन ये शुबहा इस्तिदलाल पर पूरा नहीं उतरता था। सेन के क़त्ल की ट्रेजडी? मालूम नहीं। क्या वजह थी, लेकिन मैंने ये क़तई तौर पर महसूस किया था कि वो सब अफ़सुरदा थे। बज़ाहिर हंसते थे, बोलते थे मगर अंदरूनी तौर पर मुज़्तरिब थे।
मैं प्रभातनगर में अपने पुराने फिल्मों के साथी के घर में कहानी लिखता रहा। ये मस्रूफ़ियत पूरे सात दिन जारी रही। मुझे बार बार ख़याल आता था कि इस दौरान में चड्डे ने ख़लल-अंदाज़ी क्यों नहीं की। वन क़ुतरे भी कहीं ग़ायब था। रनजीत कुमार से मेरे कोई इतने मरासिम नहीं थे कि वो मेरे पास इतनी दूर आता। ग़रीबनवाज़ के मुतअ’ल्लिक़ मैंने सोचा था कि शायद हैदराबाद चला गया हो और मेरा पुराना फिल्मों का साथी अपने नए फ़िल्म की हीरोइन से उसके घर में उसके बड़ी बड़ी मूंछों वाले ख़ाविंद की मौजूदगी में इश्क़ लड़ाने का मुसम्मम इरादा कर रहा था।
मैं अपनी कहानी के एक बड़े दिलचस्प बाब का मंज़रनामा तैयार कर रहा था कि चड्डा बला-ए-नागहानी की तरह नाज़िल हुआ। कमरे में दाख़िल होते ही उसने मुझ से पूछा, “इस बकवास का तुम ने कुछ वसूल किया है।”
उसका इशारा मेरी कहानी की तरफ़ था जिसके मुआ’वज़े की दूसरी क़िस्त मैंने दो रोज़ हुए वसूल की थी। “हाँ, दूसरा हज़ार परसों लिया है।”
“कहाँ है ये हज़ार?” ये कहता चड्डा मेरे कोट की तरफ़ बढ़ा।
“मेरी जेब में!”
चड्डे ने मेरी जेब में हाथ डाला। सौ-सौ के चार नोट निकाले और मुझसे कहा, “आज शाम को मम्मी के हाँ पहुंच जाना, एक पार्टी है!”
मैं उस पार्टी के मुतअ’ल्लिक़ उससे कुछ दरयाफ़्त ही करने वाला था कि वो चला गया। वो अफ़सुरदगी जो मैंने चंद रोज़ पहले उसमें महसूस की थी बदस्तूर मौजूद थी। वो कुछ मुज़्तरिब भी था। मैंने उसके मुतअ’ल्लिक़ सोचना चाहा मगर दिमाग़ माइल न हुआ, कहानी के दिलचस्प बाब का मंज़रनामा उसमें बुरी तरह फंसा था।
अपने पुराने फिल्मों के साथी की बीवी से अपनी बीवी की बातें करके शाम को साढ़े पाँच बजे के क़रीब मैं वहां से रवाना हो कर सात बजे सईदा काटेज पहुंचा। गेराज के बाहर अलगनी पर गीले गीले पोतड़े लटक रहे थे और नल के पास एल बिरादरान शीरीं के बड़े लड़के के साथ खेल रहे थे। गेराज के टाट का पर्दा हटा हुआ था और शीरीं उनसे ग़ालिबन मम्मी की बातें कर रही थी। मुझे देख कर वो चुप हो गए। मैंने चड्डे के मुतअ’ल्लिक़ पूछा तो अक़ील ने कहा कि “वो मम्मी के घर मिल जाएगा।”
मैं वहां पहुंचा तो एक शोर बरपा था, सब नाच रहे थे। ग़रीबनवाज़ पोली के साथ, रनजीत कुमार किट्टी और एलमा के साथ और वन क़ुतरे थेलमा के साथ। वो उसको कथाकली के मुदरे बता रहा था। चड्डा मम्मी को गोद में उठाए इधर उधर कूद रहा था, सब नशे में थे। एक तूफ़ान मचा हुआ था।
मैं अंदर दाख़िल हुआ तो सबसे पहले चड्डे ने नारा लगाया। इसके बाद देसी और नीम बिदेशी आवाज़ों का एक गोला सा फटा जिसकी गूंज देर तक कानों में सरसराती रही। मम्मी बड़े तपाक से मिली, ऐसे तपाक से जो बेतकल्लुफ़ी की हद तक बढ़ा हुआ था। मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर उसने कहा, “किस मी डियर!”
लेकिन उस ने ख़ुद ही मेरा एक गाल चूम लिया और घसीट कर नाचने वालों के झुरमुट में ले गई। चड्डा एक दम पुकारा, “बंद करो, अब शराब का दौर चलेगा।”
फिर उसने नौकर को आवाज़ दी, “स्काटलैंड के शहज़ादे... विस्की की नई बोतल लाओ।” स्काटलैंड का शहज़ादा नई बोतल ले आया, नशे में धुत था। बोतल खोलने लगा तो हाथ से गिरी और चकनाचूर हो गई। मम्मी ने उसको डाँटना चाहा तो चड्डे ने रोक दिया और कहा, “एक बोतल टूटी है मम्मी, जाने दो, यहां दिल टूटे हुए हैं।”
महफ़िल एक दम सूनी हो गई, लेकिन फ़ौरन ही चड्डे ने इस लम्हाती अफ़सुरदगी को अपने क़हक़हों से दरहम बरहम कर दिया। नई बोतल आई, हर गिलास में ग्रांडील पैग डाला गया। चड्डे की बेरब्त सी तक़रीर शुरू हुई, “लेडीज़ ऐंड जैंटलमैन, आप सब जहन्नम में जाएं। मंटो हमारे दरमियान मौजूद है। बज़ो’म-ए-ख़ुद बहुत बड़ा अफ़साना-निगार बनता है। इंसानी नफ़्सियात की... वो क्या कहते हैं अमीक़ तरीन गहराईयों में उतर जाता है। मैं कहता हूँ कि बकवास है, कुँवें में उतरने वाले... कुवें में उतरने वाले...”
उसने इधर उधर देखा, “अफ़सोस कि यहां कोई हिन्दसतोड़ नहीं। एक हैदराबादी है जो क़ाफ़ को खाफ़ कहता है और जिससे दस बरस पीछे मुलाक़ात हुई तो कहेगा, परसों आपसे मिला था, ला’नत हो उस के निज़ाम-ए-हैदराबाद पर जिसके पास कई लाख टन सोना है। करोड़ों जवाहरात हैं, लेकिन एक मम्मी नहीं, हाँ, वो कुवें में उतरने वाले... मैंने क्या कहा था कि सब बकवास है। पंजाबी में जिन्हें टोबहे कहते हैं, वो ग़ोता लगाने वाले, वो इसके मुक़ाबले में इंसानी नफ़्सियात को बदरजहा बेहतर समझते हैं, इसलिए मैं कहता हूँ...”
सब ने ज़िंदाबाद का नार लगाया। चड्डा चीख़ा, “ये सब साज़िश है, इस मंटो की साज़िश है। वर्ना मैंने हिटलर की तरह तुम लोगों को मुर्दाबाद के नारे का इशारा किया था। तुम सब मुर्दाबाद, लेकिन पहले मैं, मैं...”
वो जज़्बाती हो गया, “मैं... जिसने उस रात उस... साँप के पेट के खपरों ऐसे रंग वाले बालों की एक लड़की के लिए अपनी मम्मी को नाराज़ कर दिया। मैं ख़ुद को ख़ुदा मालूम कहाँ का डोन जो आन समझता था, लेकिन नहीं... उसको हासिल करना कोई मुश्किल काम नहीं था। मुझे अपनी जवानी की क़सम। एक ही बोसे में उस प्लेटिनम ब्लोंड के कंवारपने का सारा अ’र्क़ मैं अपने इन मोटे मोटे होंटों से चूस सकता था। लेकिन ये एक... ये एक नामुनासिब हरकत थी, वो कम-उम्र थी, इतनी कम-उम्र, इतनी कमज़ोर, इतनी कैरेक्टरलेस... इतनी...”
उसने मेरी तरफ़ सवालिया नज़रों से देखा, “बताओ यार, उसे उर्दू, फ़ारसी या अरबी में क्या कहेंगे... कैरेक्टर लेस.... लेडीज़ ऐंड जैंटलमैन, वो इतनी छोटी, इतनी कमज़ोर और इतनी लाकिरदार थी कि उस रात गुनाह में शरीक हो कर या तो वो सारी उम्र पछताती रहती, या उसे क़तअ’न भूल जाती। उन चंद घड़ियों की लज़्ज़त की याद के सहारे जीने का सलीक़ा उसको क़तई तौर पर न आता, मुझे इस का दुख होता। अच्छा हुआ कि मम्मी ने उसी वक़्त मेरा हुक़्क़ा-पानी बंद कर दिया। मैं अब अपनी बकवास बंद करता हूँ। मैंने असल में एक बहुत लंबी चौड़ी तक़रीर करने का इरादा किया था, मगर मुझसे कुछ बोला नहीं जाता... मैं एक पैग और पीता हूँ।”
उसने एक पैग और पिया। तक़रीर के दौरान में सब ख़ामोश थे। इसके बाद भी ख़ामोश रहे। मम्मी न मालूम क्या सोच रही थी। ग़ाज़े और सुर्ख़ी की तहों के नीचे उसकी झुर्रियां भी ऐसा दिखाई देता था कि ग़ौर-ओ-फ़िक्र में डूबी हुई हैं। बोलने के बाद चड्डा जैसे ख़ाली सा हो गया था। इधर उधर घूम रहा था। जैसे कोई चीज़ खोने के लिए ऐसा कोना ढूंढ रहा है जो उसके ज़ेहन में अच्छी तरह महफ़ूज़ है।
मैंने उससे एक बार पूछा, “क्या बात है चड्डे?”
उसने क़हक़हा लगा कर जवाब दिया, “कुछ नहीं, बात ये है कि आज विस्की मेरे दिमाग़ के चूतड़ों पर जमा के लात नहीं मार रही।”
उसका क़हक़हा खोखला था।
वन क़ुतरे ने थेलमा को उठा कर मुझे अपने पास बिठा लिया और इधर उधर की बातें करने के बाद अपने बाप की तारीफ़ शुरू कर दी कि वो बड़ा गुनी आदमी था। ऐसा हारमोनियम बजाता था कि लोग दमबख़ुद हो जाते थे। फिर उसने अपनी बीवी की ख़ूबसूरती का ज़िक्र किया और बताया कि बचपन ही में उसके बाप ने ये लड़की चुन कर उससे ब्याह दी थी। बंगाली म्यूज़िक डायरेक्टर सेन की बात निकली तो उसने कहा, “मिस्टर मंटो, वो एक दम हलकट आदमी था, कहता था मैं ख़ां साहब अब्दुल करीम ख़ां का शागिर्द हूँ... झूट, बिल्कुल झूट। वो तो बंगाल के किसी भड़वे का शागिर्द था।”
घड़ी ने दो बजाये। चड्डे ने जस्टरबग बंद किया। किट्टी को धक्का दे कर एक तरफ़ गिराया और बढ़ कर वन क़ुतरे के कद्दू ऐसे सर पर धप्पा मार कर, “बकवास बंद कर बे, उठ... और कुछ गा, लेकिन ख़बरदार अगर तू ने कोई पक्का राग गाया।”
वन क़ुतरे ने फ़ौरन गाना शुरू कर दिया। आवाज़ अच्छी नहीं थी। मुरकियों की नोक-पलक वाज़ेह तौर पर उसके गले से नहीं निकलती थी लेकिन जो कुछ गाता था, पूरे ख़ुलूस से गाता था। माल्कोस में उसने ऊपर तले दो तीन फ़िल्मी गाने सुनाए जिनसे फ़िज़ा बहुत उदास हो गई। मम्मी और चड्डा एक दूसरे की तरफ़ देखते थे और नज़रें किसी और सिम्त हटा लेते थे। ग़रीबनवाज़ इस क़दर मुतास्सिर हुआ कि उसकी आँखों में आँसू आगए। चड्डे ने ज़ोर का क़हक़हा बलंद किया और कहा, “हैदराबाद वालों की आँख का मसाना बहुत कमज़ोर होता है, मौक़ा बेमौक़ा टपकने लगता है।”
ग़रीबनवाज़ ने अपने आँसू पोंछे और एलमा के साथ नाचना शुरू कर दिया। वन क़ुतरे ने ग्रामोफोन के तवे पर रिकॉर्ड रख कर सुइ लगा दी। घिसी हुई ट्यून बजने लगी। चड्डे ने मम्मी को फिर गोद में उठा लिया और कूद कूद कर शोर मचाने लगा। उसका गला बैठ गया था। उन मीरासियों की तरह जो शादी ब्याह के मौक़ों पर ऊंचे सुरों में गा-गा कर अपनी आवाज़ का नास मार लेती हैं।
इस उछल कूद और चीख़म धाड़ में चार बज गए। मम्मी एक दम ख़ामोश हो गई, फिर उसने चड्डे से मुख़ातिब हो कर कहा, “बस, अब ख़त्म!”
चड्डे ने बोतल से मुँह लगाया, उसे ख़ाली करके एक तरफ़ फेंक दिया और मुझसे कहा, “चलो मंटो, चलें!”
मैंने उठ कर मम्मी से इजाज़त लेनी चाही कि चड्डे ने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया, “आज कोई अलविदा नहीं कहेगा!”
हम दोनों बाहर निकल रहे थे कि मैंने वन क़ुतरे के रोने की आवाज़ सुनी। मैंने चड्डे से कहा, “ठहरो, देखें क्या बात है,” मगर वो मुझे धकेल कर आगे ले गया। “इस साले की आँखों का मसाना भी ख़राब है।”
मम्मी के घर से सईदा काटेज बिल्कुल नज़दीक थी। रास्ते में चड्डे ने कोई बात न की। सोने से पहले मैंने उससे इस अ’जीब-ओ-ग़रीब पार्टी के मुतअ’ल्लिक़ इस्तफ़सार करना चाहा तो उसने कहा, “मुझे सख़्त नींद आ रही है।” और बिस्तर पर लेट गया।
सुबह उठ कर मैं ग़ुस्लख़ाने में गया। बाहर निकला तो देखा कि ग़रीबनवाज़ गेराज के टाट के साथ लग कर खड़ा है और रो रहा है। मुझे देख कर वो आँसू पोंछता वहां से हट गया। मैंने पास जा कर उससे रोने की वजह दरयाफ़्त की तो उसने कहा, “मम्मी चली गई!”
“कहाँ!”
“मालूम नहीं।” ये कह कर ग़रीबनवाज़ ने सड़क का रुख़ किया।
चड्डा बिस्तर पर लेटा था। ऐसा मालूम होता था कि वो एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया था। मैंने उससे मम्मी के बारे में पूछा तो उसने मुस्कुरा कर कहा, “चली गई... सुबह की गाड़ी से उसे पूना छोड़ना था।”
मैंने पूछा, “मगर क्यों?”
चड्डे के लहजे में तल्ख़ी आगई, “हुकूमत को उसकी अदाऐं पसंद नहीं थीं। उसकी वज़ा-क़ता पसंद नहीं थी। उसके घर की महफ़िलें उसकी नज़र में क़ाबिल-ए-एतराज़ थीं। इसलिए कि पुलिस उसकी शफ़क़त और मोहब्बत बतौर यरग़माल के लेना चाहती थी। वो उसे माँ कह कर एक दलाला का काम लेना चाहते थे, एक अ’र्से से उसका एक केस ज़ेरे तफ़तीश था। आख़िर हुकूमत पुलिस की तहक़ीक़ात से मुतमइन हो गई और उसको तड़िपार कर दिया, शहर बदर कर दिया।
वो अगर क़हबा थी, दलाला थी, उसका वजूद सोसाइटी के लिए मोहलिक था तो उसका ख़ातमा कर देना चाहिए था। पूने की ग़लाज़त से ये क्यों कहा गया कि तुम यहां से चली जाओ और जहां चाहो ढेर हो सकती हो।”
चड्डे ने बड़े ज़ोर का क़हक़हा लगाया और थोड़ी देर ख़ामोश रहा। फिर उसने बड़े जज़्बात भरे लहजे में कहा, “मुझे अफ़सोस है मंटो कि इस ग़लाज़त के साथ एक ऐसी पाकीज़गी चली गई है जिसने उस रात मेरी एक बड़ी ग़लत और नजिस तरंग को मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से धो डाला, लेकिन मुझे अफ़सोस नहीं होना चाहिए, वो पूने से चली गई है। मुझ ऐसे जवानों में ऐसी नजिस और ग़लत तरंगें वहां भी पैदा होंगी जहां वो अपना घर बनाएगी। मैं अपनी मम्मी उनके सपुर्द करता हूँ... ज़िंदाबाद मम्मी, ज़िंदाबाद! चलो ग़रीबनवाज़ को ढूंढें, रो रो कर उसने अपनी जान हलकान कर ली होगी। इन हैदराबादियों की आँखों का मसाना बहुत कमज़ोर होता है, वक़्त बे-वक़्त टपकने लगता है।”
मैंने देखा, चड्डे की आँखों में आँसू इस तरह तैर रहे थे जिस तरह मक़्तूलों की लाशें।
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