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सांस्कृतिक और भावनात्मक नुक़सान पर कहानियाँ

औरत ज़ात

सआदत हसन मंटो

यह कहानी औरत के मनोविज्ञान पर आधारित है। अशोक अपने दोस्त महाराजा के पास ब्लू फ़िल्में देखने के बाद ख़ुद को और महाराजा को कुछ देर लानत मलामत करने के बाद अपनी बीवी को दिखाने की ग़रज़ से प्रोजेक्टर घर ले आता है। दो चार सीन देखने के बाद ही उसकी बीवी नापसंदीदगी का इज़हार करती है और रोने लगती है, जिस पर अशोक शर्मिंदा होता है। दफ़्तर में उसका दिल नहीं लगता, घर में बीवी का सामना करने की हिम्मत नहीं होती, लेकिन जब वह दफ़्तर से घर आता है तो देखता है कि बंद कमरे में उसकी बीवी अपनी सहेलियों के साथ वही फ़िल्में देख रही है।

आम

सआदत हसन मंटो

यह एक बूढ़े मुंशी की कहानी है जो पेंशन के बूते अपने परिवार को पाल रहा है। अपने अच्छे अख़्लाक़ के चलते उसकी अमीर लोगों से जान-पहचान है। लेकिन इन अमीरों में दो लोग ऐसे हैं जो उसे बहुत अज़ीज़ होते हैं। इनके लिए वह हर साल आम के मौसम में अपने परिवार वालों की इच्छाओं का गला घोंट कर आम के टोकरे भिजवाता है। मगर इस बार की गर्मी इतनी भयानक थी कि वह बर्दाश्त नहीं कर सका और मर गया। उसके मरने की इत्तिला जब उन दोनों अमीरज़ादों को दी गई तो दोनों ने ज़रूरी काम का बहाना कर के आने से इंकार कर दिया।

बुर्क़े

सआदत हसन मंटो

कहानी में बुर्क़े की वजह से पैदा होने वाली मज़हका-खेज़ सूरत-ए-हाल को बयान किया गया है। ज़हीर नामक नौजवान को अपने पड़ोस में रहने वाली लड़की से इश्क़ हो जाता है। उस घर में तीन लड़कियाँ हैं और तीनों बुर्क़े का इस्तेमाल करती हैं। ज़हीर ख़त किसी और लड़की को लिखता है और हाथ किसी का पकड़ता है। उसी चक्कर में एक दिन उसकी पिटाई हो जाती है और पिटाई के तुरंत बाद उसे एक रुक़्क़ा मिलता है कि तुम अपनी माँ को मेरे घर क्यों नहीं भेजते, आज तीन बजे सिनेमा में मिलना।

इंक़िलाब-पसंद

सआदत हसन मंटो

"इस कहानी का मुख्य पात्र सलीम एक नैसर्गिक क्रांतिकारी है। वो ब्रह्माण्ड की हर वस्तु यहाँ तक कि अपने कमरे की रख-रखाव में भी इन्क़लाब देखना पसंद करता है। वो दुनिया से ग़रीबी, बेरोज़गारी, अन्याय और शोषण को ख़त्म करना चाहता है और इसके लिए वो बाज़ारों में भाषण करता है लेकिन उसे पागल समझ कर पागलख़ाने में डाल दिया जाता है।"

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शारदा

सआदत हसन मंटो

यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो तवायफ़़ को तवायफ़़ की तरह ही रखना चाहता है। जब कोई तवायफ़ उसकी बीवी बनने की कोशिश करती तो वह उसे छोड़ देता। पहले तो वह शारदा की छोटी बहन से मिला था, पर जब उसकी शारदा से मुलाक़ात हुई तो वह उसे भूल गया। शारदा एक बच्चे की माँ है और देखने में ठीक-ठाक लगती है। बिस्तर में उसे शारदा में ऐसी लज्ज़त महसूस होती है कि वह उसे कभी भूल नहीं पाता। शारदा अपने घर लौट जाती है, तो वह उसे दोबारा बुला लेता है। इस बार घर आकर जब शारदा बीवी की तरह उसकी देखभाल करने लगती है तो वो उससे उक्ता जाता है और उसे वापस भेज देता है।

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चोरी

सआदत हसन मंटो

यह एक बूढ़े बाबा की कहानी है जो अलाव के गिर्द बैठे बच्चों को अपनी ज़िंदगी से जुड़ी एक कहानी सुनाता है। कहानी उस वक़्त की है जब उसे जासूसी नॉवेल पढ़ने का दीवानगी की हद तक शौक़़ था और इसी शौक़़ के चलते उसने किताबों की एक दुकान से अपनी पसंद की किताब चुरा ली थी। मगर इस चोरी ने उसकी ज़िंदगी को कुछ इस तरह बदला कि वह उम्र भर के लिए चोर बन गया।

हारता चला गया

सआदत हसन मंटो

एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे जीतने से ज़्यादा हारने में मज़ा आता है। बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद फ़िल्मी दुनिया में उसने बे-हिसाब दौलत कमाई थी। यहाँ उसने इतनी दौलत कमाई कि वह जितना ख़र्च करता उससे ज़्यादा कमा लेता। एक रोज़ वह जुआ खेलने जा रहा था कि उसे इमारत के नीचे ग्राहकों को इंतज़ार करती एक वेश्या मिली। उसने उसे दस रूपये रोज़ देने का वादा किया, ताकि वह अपना धंधा बंद कर सके। कुछ दिनों बाद उसने देखा कि वह वेश्या फिर खिड़की पर बैठी ग्राहक का इंतेज़ार कर रही। पूछने पर उसने ऐसा जवाब दिया कि वे व्यक्ति ला-जवाब हो कर ख़ामोश हो गया।

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फुंदने

सआदत हसन मंटो

कहानी का मौज़ू सेक्स और हिंसा है। कहानी में एक साथ इंसान और जानवर दोनों को पात्र के रूप में पेश किया गया है। जिन्सी अमल से पैदा होने वाले नतीजों को स्वीकार न कर पाने की स्थिति में बिल्ली के बच्चे, कुत्ते के बच्चे, ढलती उम्र की औरतें जिनमें जिन्सी कशिश बाक़ी नहीं, वे सब के सब मौत का शिकार होते नज़र आते हैं।

पाली हिल की एक रात

कुर्रतुलऐन हैदर

ड्रामे के शक्ल में लिखी गई एक ऐसी कहानी है जिसके सभी किरदार फ़र्ज़ी हैं। परिवार जब इबादत की तैयारी कर रहा था तभी बारिश में भीगता हुआ एक विदेशी जोड़ा दरवाज़ा खटखटाता है और अंदर चला आता है। बातचीत के दौरान पता चलता है कि उनका ताल्लुक ईरान से है। इसके बाद घटनाओं का एक ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो सबकुछ बदल कर रख देता है।

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मिस्टर मोईनुद्दीन

सआदत हसन मंटो

सामाजिक रसूख़ और साख के गिर्द घूमती यह कहानी मोईन-नामी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन पर आधारित है। मोईन ने ज़ोहरा से उसके माँ-बाप के ख़िलाफ़ जाकर शादी की थी और फिर कराची में आ बसा था। कराची में उसकी बीवी का एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ सम्बंध हो जाता है। मोईन इस बारे में जानता है लेकिन अपनी मोहब्बत और सामाजिक साख के कारण वह बीवी को तलाक नहीं देता और उसे प्रेमी के साथ रहने की अनुमति दे देता है। कुछ अरसे बाद जब प्रेमी की मौत हो जाती है तो मोईन भी उसे तलाक दे देता है।

वक़्फ़ा

नैयर मसूद

अतीत की यादों के सहारे बे-रंग ज़िंदगी में ताज़गी पैदा करने की कोशिश की गई है। कहानी का प्रथम वाचक अपने स्वर्गीय बाप के साथ गुज़ारे हुए वक़्त को याद कर के अपनी बिखरी ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की जद-ओ-जहद कर रहा है जिस तरह उसका बाप अपने घर बनाने के हुनर से पुरानी और उजाड़ इमारतों की मरम्मत करके क़ाबिल-ए-क़बूल बना देता था। नय्यर मसऊद की दूसरी कहानियों की तरह इसमें भी ख़ानदानी निशान और ऐसी विशेष चीज़ों का ज़िक्र है जो किसी की शनाख़्त बरक़रार रखती हैं।

खुद फ़रेब

सआदत हसन मंटो

यह दो दोस्तों की कहानी है, जो हर वक़्त ख़ूबसूरत औरतों और लड़कियों के बारे में बातें करते रहते हैं। वे उनसे अपने संबंधों की डींग हाँकते हैं। मगर दोनों में कोई भी अपनी पसंद की औरत से एक-दूसरे को मिलवाता नहीं है। हाँ, उन औरतों के साथ अपने संबंधों को सच्चा साबित करने के लिए ख़ुद फ़रेब करते रहते हैं।

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मिस माला

सआदत हसन मंटो

यह एक ऐसी औरत की कहानी है जो फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल के लिए लड़कियाँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनकी दलाली भी करती है। अज़ीम ने अपने दोस्त भटसावे को एक फ़िल्म में काम दिलवाया तो भटसावे ने उसकी दावत करनी चाही। इसके लिए उसने माला की मदद ली, जिसने उस फ़िल्म के लिए गाने वाली लड़कियों का इंतेज़ाम किया था। फिर भटसावे के कहने पर उसने अज़ीम को एक कमसिन लड़की भी उपलब्ध करा दी थी। जब भटसावे ने माला को अपने साथ सोने के लिए कहा तो उसने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि वह तो उसे अपना भाई समझती है।

जिला-वतन

कुर्रतुलऐन हैदर

यह साझा संस्कृति की त्रासदी की कहानी है। उस साझा संस्कृति की जिसे इस महाद्वीप में रहने-बसने वालों के सदियों के मेलजोल और एकता का प्रसाद माना जाता है। इस कहानी में रिश्तों के टूटने, खानदानों के बिखरने और अतीत के उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों के चूर-चूर हो जाने की त्रासदी प्रस्तुत की गई है।

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मज़दूर

अहमद अली

हमारा सभ्य समाज मज़दूरों को इंसान नहीं समझता। एक ग़रीब मज़दूर तबियत ठीक न होने के बावजूद मजबूरी में बिजली के खंबे पर चढ़कर लाइट ठीक कर रहा है कि अचानक उसका संतुलन बिगड़ जाता है और वह खम्बे से गिर जाता है और लहू-लुहान हो जाता है। किसी तरह उसे अस्पताल पहुँचाया जाता है। अभी उसकी साँसें चल रही हैं फिर भी अलसाया डॉक्टर उसे मृत घोषित कर देता है।

मलफ़ूज़ात-ए-गुल बाबा बेक्ताशी

कुर्रतुलऐन हैदर

यह एक प्रयोगात्मक कहानी है। इसमें सेंट्रल एशिया की परम्पराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक विचारों को केंद्र बिंदू बनाया गया है। यह कहानी एक ही वक़्त में वर्तमान से अतीत और अतीत से वर्तमान में चलती है। यह उस्मानिया हुकूमत के दौर की कई अनजानी घटनाओं का ज़िक्र करती है, जिनमें मुर्शिद हैं और उनके मुरीद है। फ़क़ीर हैं और उनका खु़दा और रसूल से रुहानी रिश्ता है। मुख्य किरदार एक ऐसे ही बाबा से मिलती है। वह उनके पास एक औरत का ख़त लेकर जाती, जिसका शौहर खो गया है और वह उसकी तलाश में दर-दर भटक रही है। वह बाबा की उस रुहानी दुनिया के कई अनछुए पहलुओं से वाक़िफ़ होती हैं जिन्हें आम इंसानी आसानी से नज़र-अंदाज़ करके निकल जाता है।