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साहिब-ए-ज़ौक़ क़ारी पर स्कॉलर

क्या 'साहिब-ए-ज़ौक़' पाठक का कोई वुजूद है?

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़ 'साहिब-ए-ज़ौक़ पाठक' एक फ़र्ज़ी ख़याल है जिसे आलोचक अपनी नासमझी छिपाने और मुश्किल शायरी को ख़ारिज करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

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