मेरा नाम राधा है
"ये कहानी औरत की इच्छा शक्ति को पेश करती है। राज किशोर के रवय्ये और बनावटी व्यक्तित्व से नीलम परिचित है, इसीलिए फ़िल्म स्टूडियो के हर फ़र्द की ज़बान से तारीफ़ सुनने के बावजूद वो उससे प्रभावित नहीं होती। एक रोज़ सख़्त लहजे में बहन कहने से भी मना कर देती है और फिर आख़िरकार रक्षा बंधन के दिन आक्रोशित हो कर उसे बिल्लियों की तरह नोच डालती है।"
सआदत हसन मंटो
मेरा नाम राधा है
"ये कहानी औरत की इच्छा शक्ति को पेश करती है। राज किशोर के रवय्ये और बनावटी व्यक्तित्व से नीलम परिचित है, इसीलिए फ़िल्म स्टूडियो के हर फ़र्द की ज़बान से तारीफ़ सुनने के बावजूद वो उससे प्रभावित नहीं होती। एक रोज़ सख़्त लहजे में बहन कहने से भी मना कर देती है और फिर आख़िरकार रक्षा बंधन के दिन आक्रोशित हो कर उसे बिल्लियों की तरह नोच डालती है।"
सआदत हसन मंटो
नन्ही की नानी
‘मर्द भयानक होते हैं, बच्चे बदज़ात और औरत डरपोक।’ नानी अपनी नवासी नन्ही के साथ मौहल्ले में रहती है। वह मौहल्ले के लोगों की बेगार कर के किसी तरह अपना पेट पालती है। नन्ही कुछ बड़ी होती है तो उसे डिप्टी साहब के यहाँ रखवा देती है। लेकिन एक रोज़ वह डिप्टी साहब की हवस का शिकार हो जाती है और अपनी जवानी तक मौहल्ले के न जाने कितने लोग उसे अपना शिकार बनाते हैं। एक रोज़ वह भाग जाती है और नानी अकेली रह जाती है। अकेली नानी अपनी मौत तक मौहल्ले में डटी रहती है, लेकिन इस दौरान मौहल्ले वाले जिस तरह का सुलूक नानी के साथ करते हैं वह बहुत दर्दनाक है।
इस्मत चुग़ताई
नन्ही की नानी
‘मर्द भयानक होते हैं, बच्चे बदज़ात और औरत डरपोक।’ नानी अपनी नवासी नन्ही के साथ मौहल्ले में रहती है। वह मौहल्ले के लोगों की बेगार कर के किसी तरह अपना पेट पालती है। नन्ही कुछ बड़ी होती है तो उसे डिप्टी साहब के यहाँ रखवा देती है। लेकिन एक रोज़ वह डिप्टी साहब की हवस का शिकार हो जाती है और अपनी जवानी तक मौहल्ले के न जाने कितने लोग उसे अपना शिकार बनाते हैं। एक रोज़ वह भाग जाती है और नानी अकेली रह जाती है। अकेली नानी अपनी मौत तक मौहल्ले में डटी रहती है, लेकिन इस दौरान मौहल्ले वाले जिस तरह का सुलूक नानी के साथ करते हैं वह बहुत दर्दनाक है।
इस्मत चुग़ताई
एक शौहर की ख़ातिर
दुनिया चाहे कितनी ही आधुनिक क्यों न हो जाए। हमारे समाज में एक औरत की पहचान उसके शौहर से ही होती है। ट्रेन के सफ़र करने के दौरान उसे तीन हमसफ़र मिलीं। तीनों औरतें और उन तीनों ने उस से एक ही क़िस्म के सवाल करने शुरू कर दिए। वह न चाहते हुए भी उनके अनचाहे जवाब देती रही। मगर जब आख़िरी स्टेशन पर क्लर्क ने उसे सामान की रसीद देते हुए शौहर का नाम पूछा तो उसे एहसास हुआ कि हमारे समाज में एक औरत की पहचान के लिए शौहर का होना कितना ज़रूरी है।
इस्मत चुग़ताई
एक शौहर की ख़ातिर
दुनिया चाहे कितनी ही आधुनिक क्यों न हो जाए। हमारे समाज में एक औरत की पहचान उसके शौहर से ही होती है। ट्रेन के सफ़र करने के दौरान उसे तीन हमसफ़र मिलीं। तीनों औरतें और उन तीनों ने उस से एक ही क़िस्म के सवाल करने शुरू कर दिए। वह न चाहते हुए भी उनके अनचाहे जवाब देती रही। मगर जब आख़िरी स्टेशन पर क्लर्क ने उसे सामान की रसीद देते हुए शौहर का नाम पूछा तो उसे एहसास हुआ कि हमारे समाज में एक औरत की पहचान के लिए शौहर का होना कितना ज़रूरी है।
इस्मत चुग़ताई
निक्की
यह अफ़साना एक ऐसी औरत की दास्तान को बयान करता है जिसका मर्द हर वक़्त उसे मारा-पीटा करता था। फिर उसने एक तवायफ़ के कहने पर उसे तलाक़ दे दी। मर्द की पिटाई के बाद उस औरत में जो ग़ुस्सा और नफ़रत जमा हो गई थी वह नए मोहल्ले में आकर निकलने लगी। वह बात-बात पर पड़ोसियों से उलझने लगी, उनसे लड़ने लगी और फिर आगे चलकर उसने इस हुनर को अपना पेश बना लिया, अपने लड़ने की फ़ीस तय कर दी। लड़ना-झगड़ना उसके ख़ून में ऐसा रच-बस गया कि उसे दौरे पड़ने लगे और पड़ोसियों को गाली बकते हुए ही उसकी मौत हो गई।
सआदत हसन मंटो
निक्की
यह अफ़साना एक ऐसी औरत की दास्तान को बयान करता है जिसका मर्द हर वक़्त उसे मारा-पीटा करता था। फिर उसने एक तवायफ़ के कहने पर उसे तलाक़ दे दी। मर्द की पिटाई के बाद उस औरत में जो ग़ुस्सा और नफ़रत जमा हो गई थी वह नए मोहल्ले में आकर निकलने लगी। वह बात-बात पर पड़ोसियों से उलझने लगी, उनसे लड़ने लगी और फिर आगे चलकर उसने इस हुनर को अपना पेश बना लिया, अपने लड़ने की फ़ीस तय कर दी। लड़ना-झगड़ना उसके ख़ून में ऐसा रच-बस गया कि उसे दौरे पड़ने लगे और पड़ोसियों को गाली बकते हुए ही उसकी मौत हो गई।