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मायूसी पर ग़ज़लें

मायूसी ज़िंदगी में एक

मनफ़ी क़दर के तौर पर देखी जाती है लेकिन ज़िंदगी की सफ़्फ़ाकियाँ मायूसी के एहसास से निकलने ही नहीं देतीं। इस सब के बावजूद ज़िंदगी मुसलसल मायूसी से पैकार किए जाने का नाम ही है। हम मायूस होते हैं लेकिन फिर एक नए हौसले के साथ एक नए सफ़र पर गामज़न हो जाते हैं। मायूसी की मुख़्तलिफ़ सूरतों और जहतों को मौज़ू बनाने वाला हमारा ये इन्तिख़ाब ज़िंदगी को ख़ुश-गवार बनाने की एक सूरत है।

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बात जब दोस्तों की आती है

ख़ुमार बाराबंकवी
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पिला साक़ी बहार आए न आए

जलील मानिकपूरी

उदासी का समुंदर देख लेना

कफ़ील आज़र अमरोहवी
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