महबूब शायरी

महबूब के बारे मे कौन सुनना या कुछ सुनाना नहीं चाहता। एक आशिक़ के लिए यही सब कुछ है कि महबूब की बातें होती रहें और उस का तज़किरा चलता रहे। महबूब के तज़किरे की इस रिवायत में हम भी अपनी हिस्से दारी बना रहे हैं। हमारा ये छोटा सा इन्तिख़ाब पढ़िए जो महबूब की मुख़्तलिफ़ जहतों को मौज़ू बनाता है।

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो

तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

मुनव्वर राना

सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

हम से कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर तो है उसे

वो यार बा-वफ़ा सही बेवफ़ा तो है

जमील मलिक

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो

तुम को देखें कि तुम से बात करें

close to me you are there

should I speak or should I stare/see

close to me you are there

should I speak or should I stare/see

फ़िराक़ गोरखपुरी

इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी

लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

बशीर बद्र

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

T'was a full moon out last night, all evening there was talk of you

Some people said it was the moon,and some said that it was you

T'was a full moon out last night, all evening there was talk of you

Some people said it was the moon,and some said that it was you

इब्न-ए-इंशा

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

फिर वही ज़िंदगी हमारी है

dying for that faithless one again

my life, the same, does then remain

dying for that faithless one again

my life, the same, does then remain

मिर्ज़ा ग़ालिब

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम

मुझे पता चला वो कितनी ख़ूबसूरत है

बशीर बद्र

तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं

महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर जाता है

साहिर लुधियानवी

जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम

उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा

अहमद नदीम क़ासमी

चाँद सा मिस्रा अकेला है मिरे काग़ज़ पर

छत पे जाओ मिरा शेर मुकम्मल कर दो

बशीर बद्र

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल

वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है

अज्ञात

मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर

फिर भी तिरा शबाब तिरा ही शबाब है

जिगर मुरादाबादी

हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही थे

उन को देखा तो ख़ुदा याद आया

towards the creator, I was not inclined

but then I saw her, and he came to mind

towards the creator, I was not inclined

but then I saw her, and he came to mind

अज्ञात

ग़रज़ किसी से वास्ता मुझे काम अपने ही काम से

तिरे ज़िक्र से तिरी फ़िक्र से तिरी याद से तिरे नाम से

जिगर मुरादाबादी

क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से

जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता

I wonder to what misgivings she is prone

that even in my dreams she's not alone

I wonder to what misgivings she is prone

that even in my dreams she's not alone

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

माशूक़ हो या कोई अमानत हो किसी की

दाग़ देहलवी

साँस लेती है वो ज़मीन 'फ़िराक़'

जिस पे वो नाज़ से गुज़रते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा

कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बअ'द

ख़ुमार बाराबंकवी

चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा

चाँद सी जिस ने वो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं

वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं

जलील मानिकपूरी

जब मैं चलूँ तो साया भी अपना साथ दे

जब तुम चलो ज़मीन चले आसमाँ चले

जलील मानिकपूरी

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका

सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा

बशीर बद्र

कि मैं देख लूँ खोया हुआ चेहरा अपना

मुझ से छुप कर मिरी तस्वीर बनाने वाले

अख़्तर सईद ख़ान

जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रें

ईद के चाँद का दीदार बहाना ही सही

अमजद इस्लाम अमजद

क्या सितम है कि वो ज़ालिम भी है महबूब भी है

याद करते बने और भुलाए बने

कलीम आजिज़

इक तुझ को देखने के लिए बज़्म में मुझे

औरों की सम्त मस्लहतन देखना पड़ा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

वो चाँदनी में फिरते हैं घर घर ये शोर है

निकला है आफ़्ताब शब-ए-माहताब में

जलील मानिकपूरी

तश्बीह तिरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से

होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

दुनिया से कहो जो उसे करना है वो कर ले

अब दिल में मिरे वो अलल-एलान रहेगा

फ़रहत एहसास

उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं

मेरा हो सका वो किसी का तो हो गया

हफ़ीज़ बनारसी

चराग़ चाँद शफ़क़ शाम फूल झील सबा

चुराईं सब ने ही कुछ कुछ शबाहतें तेरी

अंजुम इरफ़ानी

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम

दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम

हसरत मोहानी

जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

चाँद जैसे 'क़मर' तारों भरी महफ़िल में है

क़मर जलालवी

मुझ को दिल पसंद वो बेवफ़ा पसंद

दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद

बेख़ुद देहलवी

फूल महकेंगे यूँही चाँद यूँही चमकेगा

तेरे होते हुए मंज़र को हसीं रहना है

अशफ़ाक़ हुसैन

तेरे क़ुर्बान 'क़मर' मुँह सर-ए-गुलज़ार खोल

सदक़े उस चाँद सी सूरत पे हो जाए बहार

क़मर जलालवी

चाँद मशरिक़ से निकलता नहीं देखा मैं ने

तुझ को देखा है तो तुझ सा नहीं देखा मैं ने

सईद क़ैस

पाँव साकित हो गए 'सरवत' किसी को देख कर

इक कशिश महताब जैसी चेहरा-ए-दिलबर में थी

सरवत हुसैन

ज़िंदगी कहते हैं किस को मौत किस का नाम है

मेहरबानी आप की न-मेहरबानी आप की

what is labeled living, how is death defined

Finding your favour, when you are unkind

what is labeled living, how is death defined

Finding your favour, when you are unkind

रशीद लखनवी

आसमाँ झाँक रहा है 'ख़ालिद'

चाँद कमरे में मिरे उतरा है

ख़ालिद शरीफ़

ज़ालिम की तो आदत है सताता ही रहेगा

अपनी भी तबीअत है बहलती ही रहेगी

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

अदा-ओ-नाज़ करिश्मा जफ़ा-ओ-जौर-ओ-सितम

उधर ये सब हैं इधर एक मेरी जाँ तन्हा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मेरा माशूक़ है मज़ों में भरा

कभू मीठा कभू सलोना है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हम को अक्सर ये ख़याल आता है उस को देख कर

ये सितारा कैसे ग़लती से ज़मीं पर रह गया

इम्तियाज़ ख़ान