मिज़ाह पर हास्य

मिज़ाहिया शायरी बयकवक़्त

कई डाइमेंशन रखती है, इस में हंसने हंसाने और ज़िंदगी की तल्ख़ियों को क़हक़हे में उड़ाने की सकत भी होती है और मज़ाह के पहलू में ज़िंदगी की ना-हमवारियों और इन्सानों के ग़लत रवय्यों पर तंज़ करने का मौक़ा भी। तंज़ और मिज़ाह के पैराए में एक तख़्लीक़-कार वो सब कह जाता है जिसके इज़हार की आम ज़िंदगी में तवक़्क़ो भी नहीं की जा सकती। ये शायरी पढ़िए और ज़िंदगी के इन दिल-चस्प इलाक़ों की सैर कीजिए।

इश्क़ का परचा

दिलावर फ़िगार

पैरोडी

अहमद अल्वी

शाइ'र की बीवी

खालिद इरफ़ान

मैं तिरा शहर

अहमद अल्वी

सदा-ए-दरवेश

इनायत अली ख़ाँ
बोलिए