aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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धार्मिक सदभावना पर नज़्में

एक अच्छा तख़्लीक़-कार

एक अच्छा इंसान भी होता है। उस की ज़हनी, जज़्बाताी और फ़िकरी कुशादगी उसे किसी ख़ाने में बंद नहीं होने देती। वो मज़हब, तहज़ीब, रस्म-ओ-रिवाज, रंग-ओ-नस्ल की बुनियाद पर इंसानों में तफ़रीक़ पैदा करता है। मज़हबी यक-जहती के उनवान के तहत हम ने जिन शेरों का इन्तिख़ाब किया है उन के मुताले से ये एहसास और गहरा हो जाता है कि किस तरह से मज़हबी अलाहदगी के बावजूद तमाम इंसान इंसानियत की बुनियाद पर एक है और इन की अलाहदगी की तमाम बुनियादें जिंदगी की रंगा-रंगी और इस की ख़ूब-सूरती की अलामत हैं।

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